संपादकीय

अब ट्रंप की हत्या का युद्ध

राष्ट्रपति ट्रंप ने 36 घंटे में पांच बार धमकियां दी हैं कि यदि ईरान ने उनकी हत्या कराने की कोशिश की, तो अमरीका उसे तबाह कर देगा, मिट्टी मलबा कर देगा। इसके लिए उन्होंने अमरीकी सेना को आदेश भी दे दिए हैं। पेंटागन एक लंबे साल तक ईरान पर हमले करने और बमबारी करने की तैयारी में जुट गया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी खुलासा किया है कि 1000 मिसाइल ‘लॉक’ और ‘लोडेड’ कर दी गई हैं। अर्थात उनके निशाने तय कर दिए गए हैं। यदि राष्ट्रपति ट्रंप की हत्या की गई, तो ईरान पर मिसाइलों और ताकतवर बमों की बारिश कर दी जाएगी। ईरान को लगभग नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। दूसरी ओर, ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से कसम खाई है कि उनके पिता और ईरान के सुप्रीम लीडर रहे अली खामेनेई और जंग में मारे गए लोगों का इंतकाम जरूर लिया जाएगा। यह ईरानी अवाम की मांग और भावनाएं भी हैं। मुज्तबा ने ट्रंप और नेतनयाहू को ‘दुश्मन’ करार दिया है। सुप्रीम लीडर के फरमान से साफ है कि दोनों की हत्या की जाए। सुप्रीम लीडर ने, अंतत:, यहां तक कहा, ‘हम रहें या न रहें, लेकिन बदला हर हाल में लिया जाएगा।’ ट्रंप और मुज्तबा के बयान बेहद भयानक और खौफनाक हैं। यदि राष्ट्रपति ट्रंप की हत्या की जाती है अथवा ईरान की साजिश वाली रणनीति कामयाब हो जाती है, तो अमरीका और ईरान ही नहीं, दुनिया के एक बड़े भूभाग में प्रलय मच जाएगी। विश्लेषकों के आकलन हैं कि ईरान युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था 2.2 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान झेल चुकी है। ऊर्जा, गैस, खाद्य, मशीनरी, उर्वरक की आपूर्ति बाधित है, तो विश्व में ऐसे संकटों का भी तनाव बना रहेगा। अभी तक देशों ने अपने रिजर्व तेल भंडारों का इस्तेमाल किया है और युद्ध समाप्त होने की प्रार्थनाएं कर रहे हैं। यदि देशों के तेल भंडार भी खत्म होने लगेंगे, तो कच्चे तेल की कीमतें कौनसे आसमान तक जाएंगी, उनका अनुमान अभी संभव नहीं है।

भारतीय अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि यदि युद्ध 3-4 सप्ताह और खिंच गया, तो कच्चा तेल 120-140 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत को भी आर्थिक-ऊर्जा संबंधी चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी। अभी तक गोदाम भरे थे, लिहाजा कोई चिंता नहीं थी, लेकिन गोदाम खाली होने के बाद कुल नुकसान 950 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। यह भारत की कुल जीडीपी से दोगुना से भी अधिक है। दरअसल बुनियादी सवाल यह है कि क्या ईरान ने राष्ट्रपति ट्रंप को मारने का रोडमैप तक तैयार कर लिया है अथवा इजरायल की खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ की रपट के आधार पर ही हत्या की धमकियां दी जा रही हैं? किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष की जिंदगी पर मौत के भयावह साए मंडराते ही रहते हैं लेकिन ट्रंप पर राष्ट्राध्यक्ष बनने से पहले और बाद में जानलेवा हमले किए गए हैं। यहां तक खबरें हैं कि ईरान ने अमरीका में ही अपने ‘स्लीपर सेल्स’ सक्रिय कर दिए हैं। मेक्सिको के ड्रग्स तस्करों से भी बातचीत की खबरें सामने आई हैं, क्योंकि वे भी राष्ट्रपति ट्रंप के धुर विरोधी हैं और उनके गिरोह बेहद ताकतवर और हत्यारे माने जाते हैं। बहरहाल हम ऐसी खबरों की पुष्टि नहीं कर सकते। फिर भी सवाल है कि क्या ऐसी साजिशें भी अमरीकी राष्ट्रपति की हत्या कर सकती हैं? अमरीका ने अब्राहम लिंकन, जेम्स ए गैरीफील्ड, विलियम मैकिनले, जॉन एफ कैनेडी सरीखे चार राष्ट्रपतियों के हत्याकांड देखे और झेले हैं, लिहाजा ट्रंप की सुरक्षा में अतिरिक्त, कड़े, बहु लेयर बंदोबस्त किए जा रहे हैं। व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप ने खुफिया एजेंसियों की आपातकालीन बैठक बुलाई थी। अमरीका का भी इस युद्ध में 100 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हो चुका है। उसके एमक्यू-9 ड्रोन तबाह हुए हैं। उसके लड़ाकू विमान ध्वस्त किए गए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि अमरीका को ईरान में जमीनी लड़ाई लडऩे की नौबत देखनी पडी, तो कमोबेश 10 लाख सैनिक चाहिए। और इतने सैनिक अमरीका बलिदान नहीं दे सकता। जमीनी लड़ाई के बिना अमरीका युद्ध नहीं जीत सकता। यदि ट्रंप की हत्या का बयान भी खोखला नारा साबित हुआ और ट्रंप का कार्यकाल भी समाप्त हो गया, तो एक मलाल शेष रह जाएगा। ईरान का वजूद फिर भी बरकरार रहेगा।

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