लेख

आत्मनिर्भर ग्राम पंचायतों का सपना कितना व्यावहारिक? सबसे बड़ी चुनौती…

सरकार ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। इसके लिए हाल में जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। सरकार का मानना है कि देश में बदलाव की असली शुरुआत गांवों से ही संभव है। इसी सोच के तहत अब ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर बल दिया जा रहा है। इसके पीछे तर्क है कि यदि पंचायतें अपने स्रोतों से आय अर्जित करेंगी, तो वे अपने क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार सड़क, पेयजल, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर खर्च कर सकेंगी।

इससे विकास कार्यों में तेजी आएगी, सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा और सरकारी अनुदानों पर निर्भरता कम होगी। सरकार का यह भी मानना है कि मजबूत और आत्मनिर्भर पंचायतें ही विकसित भारत के सपने को साकार कर सकती हैं, लेकिन क्या पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाना वास्तव में इतना आसान है?

यह सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि आजादी के बाद से गांवों के विकास की जो व्यवस्था बनी, उसमें पंचायतों की भूमिका तो बढ़ती गई, लेकिन उनकी आर्थिक ताकत उतनी नहीं बढ़ पाई। पंचायतों के कामकाज का बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले अनुदानों पर निर्भर रहा है। आज भी अधिकांश पंचायतें स्वयं की आय के बजाय सरकारी योजनाओं और अनुदानों पर अधिक निर्भर हैं। ऐसे में पंचायतों से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने की अपेक्षा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सरकार का कहना है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का मतलब केवल पैसा जुटाना नहीं है। सरकारी दस्तावेजों में आर्थिक आत्मनिर्भरता को केवल राजस्व जुटाने तक सीमित नहीं माना गया है। इसके पीछे सोच यह है कि पंचायतों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्राथमिकताएं तय करने और फैसले लेने की अधिक स्वतंत्रता मिले। यदि पंचायतों की अपनी आय होगी, तो वे यह तय कर पाएंगी कि गांव में सबसे जरूरी काम टूटी सड़क बनवाना है या पेयजल व्यवस्था सुधारना, सार्वजनिक भवनों की मरम्मत कराना अथवा सफाई व्यवस्था को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है।

केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि पिछले कुछ वर्षों में ग्राम पंचायतों की भूमिका बदली है। वे अब केवल योजनाओं को लागू करने वाली संस्थाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि ग्रामीण विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार हैं। इसके बावजूद पंचायतों की वित्तीय निर्भरता की समस्या यथावत बनी हुई है।

पंचायतों की आत्मनिर्भरता की वास्तविक स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हाल में दिल्ली में दिए गए राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कारों में देश भर की केवल चार पंचायतों को ही ‘आत्मनिर्भर आधारभूत संरचना’ श्रेणी में सम्मानित किया गया है। सर्वविदित है कि देश की अधिकांश ग्राम पंचायतों की आय का बड़ा हिस्सा राज्य और केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदानों से आता है। अपने स्तर पर राजस्व जुटाने का अधिकार होने के बावजूद पंचायतों ने इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं की है।

सवाल है कि पंचायतें आय बढ़ाएंगी कैसे? कानूनी रूप से पंचायतों के पास कई अधिकार हैं। वे भवन कर लगा सकती हैं, सफाई कर और पथ-प्रकाश कर वसूल सकती हैं। यहां तक कि जल उपयोग शुल्क ले सकती हैं। गांवों में लगने वाले हाट-बाजार, मेले, सामुदायिक भवनों, दुकानों के किराए और अन्य स्थानीय संसाधनों से भी आय अर्जित कर सकती हैं। लेकिन कागजों पर दिखाई देने वाले ये स्रोत यथार्थ के धरातल पर उतने प्रभावी नहीं होते। गांवों में कर वसूली का विषय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है। सरपंच और वार्ड पंच उन्हीं लोगों के बीच रहते हैं, जिनसे उन्हें कर वसूलना होता है। ऐसे में कर लगाने या वसूली करने पर प्रायः विरोध का सामना करना पड़ता है।

भौगोलिक दृष्टि से बड़े राज्य राजस्थान पर नजर डालें, तो चुनौती और स्पष्ट दिखाई देती है। यहां की अधिकांश पंचायतों के पास न तो बड़े बाजार हैं, न औद्योगिक इकाइयां और न ही पर्यटन से जुड़ी आय। ज्यादातर जिलों की पंचायतें आज भी मुख्य रूप से कृषि और सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं। राज्य की अधिकांश ग्राम पंचायतों के पास ऐसे संसाधन नहीं हैं, जिनसे पर्याप्त राजस्व प्राप्त हो सके। कुछ पंचायतों के पास बाजार, व्यावसायिक गतिविधियां, पर्यटन स्थल या आय के अन्य स्रोत मौजूद हैं, लेकिन अधिकांश पंचायतें कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं। वहां स्थानीय आय बढ़ाने की संभावनाएं सीमित हैं।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या सभी पंचायतों को एक ही पैमाने से मापा जा सकता है? क्या सीमावर्ती रेगिस्तानी क्षेत्र की पंचायत और किसी विकसित कस्बे से सटी पंचायत की स्थिति एक समान है? क्या आर्थिक रूप से कमजोर गांवों से भी वही अपेक्षा जायज है, जो अपेक्षाकृत संपन्न क्षेत्रों से की जाती है? इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है, क्योंकि केवल लक्ष्य तय कर देने से उपलब्धियां हासिल कर पाना संभव नहीं होता।

तमाम समस्याओं के बावजूद पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है, क्योंकि पंचायतों की आर्थिक मजबूती के बिना वास्तविक विकेंद्रीकरण संभव नहीं है। यदि पंचायतों के पास खुद के संसाधन होंगे, तो उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए हर बार सरकार की ओर नहीं देखना पड़ेगा। आत्मनिर्भर होने की स्थिति में स्थानीय समस्याओं का समाधान अधिक तेजी से हो सकेगा और पंचायतें लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप विकास कार्य कर सकेंगी। लेकिन इसके लिए केवल राजस्व वसूली के लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले पंचायतों के संसाधनों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना होगा। यह समझना होगा कि किस पंचायत के पास आय के कौन-कौन से संभावित स्रोत मौजूद हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय करों की परंपरा कमजोर रही है, इसलिए नई कर व्यवस्था को स्वीकार करवाना आसान नहीं होगा।

आत्मनिर्भर पंचायत का अर्थ यह नहीं है कि वे अपने खर्च का पैसा खुद जुटाएं। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि पंचायत अपने गांव के विकास की दिशा तय करने में सक्षम हो, लोगों की भागीदारी के साथ फैसले ले सके और स्थानीय जरूरतों के अनुसार काम कर सके। हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें गांवों में हैं। यदि पंचायतें आर्थिक रूप से मजबूत होंगी, तो इसका लाभ केवल गांवों को नहीं, बल्कि पूरे देश को मिलेगा। मगर इसके लिए समय, तैयारी, क्षमता निर्माण और स्थानीय परिस्थितियों को समझने वाली नीतियों की जरूरत होगी।

आत्मनिर्भर पंचायतों का विचार निश्चित रूप से सही है। अगर यह मूर्त रूप ले लेता है, तो इससे गांवों की सूरत बदल सकती है। मगर इस विचार को धरातल पर उतारने के लिए गांव की हकीकत को समझना आवश्यक है।

गांवों की वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर ही पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सार्थक कदम उठाए जा सकते हैं। असली चुनौती कर वसूली नहीं है, बल्कि पंचायतों में ऐसी क्षमता विकसित करना बड़ी चुनौती होगी, जिससे वे अपने संसाधनों की पहचान कर सकें, उनका बेहतर उपयोग कर सकें और गांव के लोगों का भरोसा जीत सकें। यदि यह काम हो गया, तो आत्मनिर्भर पंचायत केवल सरकारी लक्ष्य नहीं, बल्कि गांवों की बदलती तस्वीर की वास्तविक कहानी बन सकती है।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button