सोते ही अलग हो जाते थे बाबा के सिर-पैर! रहस्यमयी है MP का ये धाम, कंगालदास बाबा के रोचक किस्से

सतना. क्या आपने कभी किसी ऐसे संत के बारे में सुना है, जिसके सोते ही सिर और पैर शरीर से अलग होकर हवा में तैरने लगते थे या किसी ऐसे सिद्ध पुरुष के बारे में, जिसने अपने तेज बुखार को एक कमंडल या पेड़ पर टंगी गुदड़ी में ट्रांसफर कर दिया हो. सुनने में यह किसी तिलिस्म या लोककथा जैसा लग सकता है लेकिन मध्य प्रदेश के सतना जिले में एक ऐसी जगह है, जहां आज भी इन चमत्कारों को पूरी शिद्दत के साथ माना और पूजा जाता है. सतना से 32 किलोमीटर दूर जनार्दनपुर गांव में स्थित कंगालदास बाबा धाम आज भी आस्था, सनातनी रहस्य और कौतूहल का एक ऐसा अनोखा केंद्र है, जहां की मिट्टी में चमत्कारों की खुशबू रची-बसी है. आइए जानते हैं बघेलखंड के इस बेहद रहस्यमयी और जागृत धाम की पूरी कहानी.
सतना जिले का यह छोटा सा गांव जनार्दनपुर आज देश-दुनिया में अगर पहचाना जाता है, तो उसकी एकमात्र वजह कालान्तर में जन्मे संत कंगालदास बाबा हैं. स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा कोई साधारण संत नहीं थे बल्कि उनके पास अद्भुत यौगिक शक्तियां थीं. धाम के स्थानीय पुजारी रामप्रसाद शुक्ला लोकल 18 को बताते हैं कि बाबा कंगालदास आज से करीब 250 साल पहले इस क्षेत्र में निवास करते थे. उनके समय की सबसे हैरान कर देने वाली बात यह थी कि जब बाबा विश्राम करते या सोते थे, तो उनके शरीर के हिस्से यानी सिर और पैर धड़ से अलग होकर अलग-अलग विश्राम करते दिखते थे. इस अलौकिक दृश्य को जिसने भी देखा, वह बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गया. आज भी बाबा की समाधि के दर्शन के लिए दूर-दूर से भारी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.
जब कमंडल और गुदड़ी में समा गया बाबा का तेज बुखार
बाबा कंगालदास के चमत्कारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. रीवा से यहां भंडारा कराने पहुंचे श्रद्धालु राकेश तिवारी ने लोकल 18 से बाबा से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा साझा किया. बात उस समय की है, जब रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह माधवगढ़ जा रहे थे. उन्होंने सोचा कि रास्ते में जनार्दनपुर रुककर बाबा कंगालदास के दर्शन कर लिए जाएं. राजा जब बाबा के आवास पर पहुंचे, तो उस समय बाबा तेज बुखार या तब की भाषा में कहे तो ज्वर से पीड़ित थे और कमजोरी के कारण खड़े होने की स्थिति में भी नहीं थे लेकिन राजा का मान रखने के लिए बाबा ने एक अनोखा कौतुक किया. बाबा ने अपने पास रखे कमंडल से कहा कि कुछ देर के लिए यह बुखार तुम अपने भीतर समा लो ताकि मैं महाराज से मिल सकूं. देखते ही देखते वह कमंडल अपने आप कांपने लगा और बाबा का बुखार गायब हो गया. राजा से मुलाकात और उन्हें आशीर्वाद देने के बाद जब बाबा वापस लौटे, तो वह बुखार वापस कमंडल से निकलकर बाबा के शरीर में आ गया. इसी किस्से में थोड़ा सा ट्विस्ट जोड़ते हुए स्थानीय पुजारी बताते हैं कि बाबा ने अपना बुखार कमंडल में नहीं बल्कि पास के एक पेड़ पर लटकी अपनी गुदड़ी में भेज दिया था. तरीका जो भी रहा हो, पर यह बाबा की परम शक्ति का प्रमाण था.



