संपादकीय

और कितने ‘लाक्षागृह’

यह अग्निकांड नहीं, हत्याकांड है। यह हादसा या दुर्घटना नहीं, कत्लेआम का बंदोबस्त है। यह आधुनिक दौर का ‘लाक्षागृह कांड’ है। ऐसी हत्याएं यहीं नहीं रुकेंगी, क्योंकि यह हमारी व्यवस्था की निरंतर नाकामी है। नगर निगम आंख मूंद कर सोया है, निर्लिप्त है, कोई चिंता-सरोकार नहीं है। बिजली विभाग को करंट दो, क्योंकि वह सन्नाटे में बेसुध है। फायर ब्रिगेड के भीतर जान बचाने का जज्बा बुझ चुका है। ये विभाग और बड़े अधिकारी सिर्फ ‘चाय-पानी’ की प्रतीक्षा में हैं। उनकी औलादें विदेश में या बेहतर व्यवस्था के संस्थानों में कम्प्यूटर पर खेल रही हैं। आग विदेश में भडक़ती है, धुआं वहां भी काला और दमघोंटू होता है। ‘लाक्षागृह’ स्तरीय संस्थानों में भी बनाए जा सकते हैं। एक बार किसी मंत्री, मुख्यमंत्री, मेयर, सचिव, निदेशक का बच्चा ऐसे ‘लाक्षागृह’ में फंसना चाहिए, लेकिन उसके दम घुटने अथवा जिंदा जल जाने की कल्पना भी हम नहीं करेंगे। ‘लाक्षागृह’ लखनऊ में ही नहीं हैं। इसी महीने की शुरुआत में राजधानी दिल्ली के एक ‘गेस्ट हाउस’ में अग्निकांड हो गया था। 21-22 निर्दोष, अतिथि मारे गए। राजधानी दिल्ली के विवेक विहार, पालम, द्वारिका आदि में भी कई लोग जिंदा जल कर खाक हो गए। उनकी क्षतिपूर्ति 5-10 लाख रुपए आंकी गई और अध्याय खत्म..! फिर एक और ‘लाक्षागृह’ का इंतजार…! देश के आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों में ‘लाक्षागृह’ धू-धू कर जले हैं। कितना होश आया, व्यवस्था बदली या बुलडोजर चलाए गए? देश में और कितने ऐसे ‘लाक्षागृह’ हैं, कोई नहीं बता सकता। ईश्वर भी असहाय साबित होंगे। जांच के नाम पर कुछ ढोंग किए जाते हैं, कुछ इमारतें सील की जाती हैं, छोटे कर्मचारी निलंबित कर दिए जाते हैं, बस…हो गया न्याय! सरकारें मुआवजे बांटने को लालायित रहती हैं। शायद उनसे भी वोट मिलते होंगे! सरकारें अवैध, अतिक्रमण वाले, असुरक्षित, बिन अग्निशमन सिस्टम के, बड़े-बड़े निर्माणों, इमारतों, होटलों, मॉल, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखतीं, क्योंकि ‘चाय-पानी’ मिल चुका होता है।

हमारी संपूर्ण व्यवस्था ही बेईमान, भ्रष्ट, नालायक और सुप्तावस्था में है। नतीजतन ‘लाक्षागृह’ बनते जा रहे हैं। लखनऊ में भी कुछ अधिकारियों को निलंबित करने से कुछ नहीं होगा। जिनके कार्यकाल में ये ‘लाक्षागृह’ बनाए गए हैं, उन्हें सरकारी सेवाओं से, तुरंत प्रभाव से, बर्खास्त कर देना चाहिए। सरकारें अदालती चुनौतियों को भी झेलें और उन्हें यथार्थ से अवगत कराएं। सरकारों को ऐसा दंडात्मक रुख अख्तियार करना पड़ेगा। ‘लाक्षागृह’ में आग लगने से 2005-15 में सालाना 17,700 से अधिक मौतें हुई हैं। 2015-24 के दौरान 10,909 मौतें…! अर्थात 25-30 ‘लाक्षागृह मौतें’ हररोज…! कितना खौफनाक, त्रासद आंकड़ा है यह? 2024 की रपट भी सामने है, जिसके मुताबिक उस साल 5971 ‘लाक्षागृह कांड’ हुए, जिनमें 5888 मौतें हुईं। क्या ऐसा देश ‘विश्व-गुरु’ होने की खुशफहमी भी पालने लायक है? ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की परियोजना ही बंद कर देनी चाहिए, क्योंकि हम ऐसा ढांचा बनाने में अक्षम हैं। हम चेतना-सोच के स्तर पर ‘स्मार्ट’ होने से बहुत दूर हैं। क्यों करदाताओं के करोड़ों रुपए ‘स्मार्टफहमी’ के नाम पर फूंके जा रहे हैं? जिन्हें ‘चाय-पानी’ की लार परेशान कर रही है, उन्हें सत्ता और प्राधिकरण के दफ्तरों से बाहर कर देना चाहिए। यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री यह काम नहीं कर सकते, तो यह काम भी देश की आक्रोशित जनता कर सकती है। यह लापरवाही, अनदेखी और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है कि 70 फीसदी से अधिक दिल्ली ‘लाक्षागृह’ की आशंका, अंदेशों के साथ जी रही है। जरा दिल्ली के सदर बाजार, चांदनी चौक, करोल बाग, पहाडग़ंज सरीखे बाजारों में घूम कर अनुभव लें। दिल्ली की बड़ी-बड़ी इमारतों के परिसर में जाकर उनकी पुरानी, संकरी व्यवस्था को देख लें, नंगी तारों के झुंड भी जरूर देखना, तो आप एकबारगी सिहर उठेंगे। डर जाएंगे और वहां से एकदम भागना चाहेंगे, क्योंकि वे तमाम ‘लाक्षागृह’ ही हैं। यह देश की राजधानी का यथार्थ है। हमारी विडंबना और दुर्भाग्य है कि कानून में ‘लाक्षागृह कांड’ को अपराध अथवा हत्या नहीं, बल्कि दुर्घटना-हादसा माना गया है, नतीजतन अधिकतर आरोपित सालों से जमानत पर घूम रहे हैं। क्या वाकई ये अग्निकांड ‘हादसे’ ही हैं? इस तरह की घटनाएं बार-बार हो रही हैं और हम कोई सबक नहीं ले रहे हैं। हर घटना के बाद जांच होती है, कुछ बयान जारी होते हैं, और कुछ दिनों के बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों में कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि ये घटनाएं फिर न हों।

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