राजनीति

कौन भुगतेगा चुनावी गारंटी का खामियाजा

सबसे पहले इसका असर यह होगा कि हमारे तमाम विकासगत खर्च कम हो जाएंगे और विकास ठप हो जाएगा, जिससे भविष्य में टैक्स की प्राप्तियां भी कम हो जाएंगी। दूसरे, सरकार को भारी कर्ज लेना पड़ेगा…

लोकसभा चुनावों की गर्मी चरम सीमा पर है। चुनावों में हर वोट महत्वपूर्ण है। इसलिए राजनीतिक दल हर वर्ग को लुभाने की कवायद में लगे हैं। पूर्व में राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणापत्र में चुनाव जीतने पर अपनी प्रस्तावित नीतियों संबंधी घोषणाएं करते रहे हैं, लेकिन पिछले लगभग डेढ़-दो दशक से राजनीतिक दल वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त स्कीमों संबंधी घोषणाएं करने लगे हैं। कभी किसानों के ऋण माफी की घोषणा, तो कभी युवाओं को बेरोजगारी भत्ता, तो कभी सरकारी नौकरियों का वायदा आदि से शुरुआत हुई। लेकिन अब यह वादे, गारंटी का रूप ले चुके हैं। अब मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की गारंटी सबसे लुभावनी मुफ्तखोरी की स्कीमें बन चुकी हैं। हालांकि कुछ स्कीमों के द्वारा जनकल्याण की भावना को समझा जा सकता है, जैसे लिंग असंतुलन को दूर करने और महिलाओं में साक्षरता और शिक्षा को बढ़ाने हेतु लाडली योजना, किसानों की हालत सुधारने के लिए सस्ते इनपुट या उनकी उपज का अधिक मूल्य देने की गारंटी आदि कुछ ऐसी जनकल्याणकारी योजनाएं हैं जिनको न्यायसंगत कहा जा सकता है। लेकिन सभी लोगों को मुफ्त बिजली, पानी या यात्रा के फलस्वरूप सरकारों के बजट बिगड़ सकते हैं या सरकारों पर कर्ज बढ़ सकता है। गारंटियों के संदर्भ में हर राजनीतिक दल दूसरे से बढ़-चढक़र घोषणाएं कर रहा है। लेकिन वोटरों को लुभाने और येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की कवायद में देश के कई राज्य पहले से ही लगातार कर्ज के बोझ में दबते जा रहे हैं और इस कारण जहां वे एक ओर तो अपने वायदे पूरी तरह निभा पाने में असफल हो रहे हैं, साथ ही उन राज्यों का विकास कार्य तथा आवश्यक सरकारी कामकाज तक प्रभावित हो रहे हैं।

अनेक राज्य हं प्रभावित : पंजाब में चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली समेत कई घोषणाएं की।

आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद इनमें से कुछ घोषणाओं पर अमल हुआ, लेकिन आज स्थिति यह है कि सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ तो रहा ही है, उससे भी ज्यादा कर्ज लेने की कवायद चल रही है और केंद्र सरकार पर भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो राज्य को पैसा नहीं दे रही। जबकि वास्तविकता यह है कि राज्य सरकारें वोट बटोरने की कवायद में गैर जिम्मेदारी से मुफ्तखोरी की स्कीमें चला रही हैं। इसी प्रकार आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड आदि में लगातार कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। उधर केंद्र सरकार राज्यों को और अधिक कर्ज लेने देने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि यह ‘एफआरबीएम अधिनियम’ के खिलाफ है। जिन राज्यों पर मुफ्तखोरी की स्कीमों के कारण कर्ज बढ़ रहा है, वे अपने-अपने राज्य में आवश्यक खर्च करने में सक्षम नहीं हंै। पंजाब में उद्योगों को बिजली इसलिए महंगी मिल रही है क्योंकि पंजाब सरकार लगभग 60 लाख लोगों को मुफ्त बिजली दे रही है। पंजाब में इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। लंबे समय से विभिन्न सरकारों द्वारा दी जा रही मुफ्तखोरी स्कीमों के चलते पंजाब, जो एक समय देश का सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य था, वह 19वें स्थान पर खिसक चुका है। लगभग इसी प्रकार के हालात कर्ज में डूबे अन्य राज्यों में भी हैं। 2024 के आम चुनावों में अब तो बात हर साल प्रत्येक लाभार्थी परिवार को एक लाख रुपए देने तक आ गई है। अगर ऐसी पार्टी सत्ता में आती है तो ऐसी योजना का क्रियान्वयन भयावह हो सकता है। गौरतलब है कि 31 मार्च 2023 तक भारत में सरकारों (केंद्र और राज्य) पर कुल कर्ज (उनके द्वारा दी गई गारंटी सहित) 231.7 लाख करोड़ रुपए था, जो मौजूदा कीमतों पर जीडीपी का 85.1 प्रतिशत था। इसमें से केंद्र सरकार का कुल कर्ज जीडीपी के 57.1 प्रतिशत के बराबर है और बाकी राज्य सरकारों (जीडीपी का लगभग 28 प्रतिशत) का है। हमें यह जानना होगा कि राज्य सरकारों के कर्ज का अनुपात पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ रहा है। राज्य सरकारों की गैरजिम्मेदाराना मुफ्तखोरी, सरकारों के समग्र ऋण में वृद्धि के कारण देश को परेशान कर रही है, और समग्र ऋण में यह वृद्धि के कारण अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा रेटिंग घटाने का कारण बन रही है।

क्या गारंटियां राजकोष के संकट को बढ़ा सकती हैं : समझना होगा कि केंद्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें, किसी भी सरकार के पास खर्च करने हेतु असीमित राजकोष नहीं होता। राजकोष मोटे तौर पर देश के लोगों की कर देने की क्षमता पर निर्भर करता है। लंबे समय से हमारा कर-जीडीपी अनुपात 17 प्रतिशत पर बना हुआ है, जिसमें से केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए करों का अनुपात जीडीपी के लगभग 10 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। वर्ष 2024-25 में करों की कुल प्राप्ति (निवल) का अनुमान मात्र 26.02 लाख करोड़ रुपए आंका गया है। ऐसे में कुल बजट, जो 47.66 लाख करोड़ रुपए का है, में 26.02 लाख करोड़ रुपए की कर प्राप्तियों और 4 लाख करोड़ रुपए की गैर कर राजस्व प्राप्तियों के बाद शेष राजकोषीय घाटा, जो लगभग 16.85 लाख करोड़ रुपए है, जिसमें से अधिकांश पैसा उधार से प्राप्त होगा। यानी ज्यादा खर्च करने के लिए उधार के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। इसके अलावा यह भी समझना होगा कि अर्थशास्त्रियों का इस बारे में मतैक्य है कि कुल बजट के 75 प्रतिशत से अधिक का खर्च पूर्व निर्धारित मदों पर हो जाता है, जिसमें पूर्व में लिए गए ऋणों के मूल और ब्याज की अदायगी, वेतन और पेंशन, प्रतिरक्षा खर्च, कानून और व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय संबंध, रखरखाव समेत अन्य जरूरी खर्च शामिल हैं। इसके बाद जो बचता है, उसे इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं, जैसे गरीबों के लिए घर, सार्वजनिक वितरण, मनरेगा, पेयजल, अनुसूचित जाति/जनजाति, महिला, बाल विकास कार्यक्रम, कृषि विकास, औद्योगिक विकास, अल्पसंख्यक आदि के कल्याण के लिए खर्च किया जाता है। जाहिर है कि यदि कांग्रेस द्वारा हाल ही में दी गई हर गरीब परिवार की चिन्हित महिला को 1 लाख रुपए देने की गारंटी को यदि लागू करना पड़ा तो उसका असर यह होगा कि कम से कम 10-12 लाख करोड़ रुपए उसके लिए उपलब्ध कराना होगा। ऐसे में उसका क्या असर होगा, यह समझा जा सकता है। पहला, सीमित कराधान के चलते, अपने निश्चित बजट में सबसे पहली कटौती पूंजीगत व्यय की होगी। यानी इंफ्रास्ट्रक्चर, औद्योगिक विकास, कृषि विकास और अन्य पूंजीगत व्यय को कम किया जाएगा। यदि इतिहास में देखें तो यूपीए के 10 सालों में कुल पूंजीगत व्यय वर्ष 2003-04 में 1.09 लाख करोड़ रुपए से बढक़र वर्ष 2013-14 तक 1.88 लाख करोड़ रुपए तक ही पहुंचा, यानी 72 प्रतिशत की वृद्धि। जबकि एनडीए यानी नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में यह 2023-24 तक 10.01 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया, यानी 433 प्रतिशत की वृद्धि। समझा जा सकता है कि यदि एक लाख रुपए प्रति वर्ष चिन्हित परिवारों को देना लागू किया गया तो पुन: हमें पूंजीगत खर्च में कटौती करनी पड़ेगी।

सबसे पहले इसका असर यह होगा कि हमारे तमाम विकासगत खर्च कम हो जाएंगे और विकास ठप्प हो जाएगा, जिससे भविष्य में टैक्स की प्राप्तियां भी कम हो जाएंगी। दूसरे, गारंटी को लागू करने के लिए सरकार को भारी कर्ज लेना पड़ेगा, जिसका असर यह होगा कि भविष्य में ब्याज की अदायगी बढ़ेगी और भविष्य का बजट भी बिगड़ेगा। तीसरे, घाटे के बजट बनाने होंगे, एफआरबीएम को तिलांजलि देनी पड़ेगी और महंगाई बढ़ेगी। चौथे, गरीबों के लिए घर, शौचालय, पेयजल आदि कार्यक्रम भी प्रभावित होंगे। पांचवें, सरकार पर कर्ज बढऩे से रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग को कम करेंगी जिसका असर हमारे भविष्य में विदेशी निवेश, ब्याज दर आदि पर पड़ेगा, जिससे हमारा विकास ठप्प हो सकता है।

डा. अश्वनी महाजन

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