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शादी खूबसूरत हो, दिखावटी नहीं


अगर दहेज के मूल कारण पर जाएं तो खर्चीली शादियां सबसे बड़ा कारण हैं। इस पहलू पर समाज को सोचना होगा, विशेषकर युवा वर्ग को जो आजकल आजाद सोच के नाम पर स्वयं आत्मनिर्भर बन हर निर्णय लेते हैं, तो इस मुद्दे पर क्यों परिवारों के प्रभाव में आ जाते हैं। शायद कुछ तो शादी का खर्चा या जिम्मेदारी परिवार पर डालना चाहते हैं या कुछ स्वयं दिखावटी शादी करना पसंद करते हैं। लेकिन इस सब में सबसे ज्यादा नुकसान उस युवा दपंत्ति का होता है जिनकी शादी का आधार समर्पण नहीं बल्कि दिखावटी शादी होती है। उन सभी युवाओं से यही आह्वान है कि हमारे देश के सबसे खूबसूरत शादी के आदर्श को और खूबसूरत बनाने के लिए अनावश्यक खर्च वाली शादी की जगह आपसी समझ और प्यार के बंधन वाले पवित्र रिश्ते में बंधें, लेकिन ये सब वर-वधू की आपसी समझ और परिवार के सहयोग से ही संभव है…

आजकल देशभर में भोपाल की टविशा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर और अमरोहा की पुष्पैंद्री देवी की दहेज उत्पीडऩ के कारण संदिग्ध मौत चर्चा का विषय बना हुआ है। क्या इन मौतों का जिम्मेदार सिर्फ संबंधित परिवार है? शायद नहीं, वो समाज भी बराबर का भागीदार है जहां शादी के नाम पर लाखों, करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर देहज देने में हामी भरी जाती है। इस संदर्भ में अच्छी शादी का आधार खर्चीली और दिखावटी शादी को बनाया जाता है और वर तथा वधू के संस्कार, वैचारिक समानता सब पहलू दोयम दर्जे के बन जाते हैं। क्योंकि इस तरह की शादियों में वधू का परिवार में मान-सम्मान भी मायके द्वारा दिए गए महंगे गिफ्ट और शादी में किए गए खर्चे पर निर्भर करता है। हद तो तब हो जाती है जब दहेज लोभी ससुराल वाले अपनी इच्छाओं को पूरा करने का हथियार नई नवेली दुल्हन को बना लेते हैं। ऐसी परिस्थिति में लडक़ी का परिवार अपनी बेटी की खुशी के लिए अपनी औकात अनुसार और गिफ्ट देता है, जिसका कि अंत नहीं होता। लेकिन जिसका समापन या बच्ची की मौत के साथ होता है, शादी की इति के साथ।

नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक देश में दहेज के कारण हर वर्ष 6 से 7 हजार महिलाओं को मार दिया जाता है। यानी कि हर घंटे एक महिला दहेज के कारण जान गंवा रही है। इस तरह के कई गुमनाम केस तो न कहीं दर्ज होते हैं और न ही प्रकाश में आते हैं, क्योंकि उनका परिवार इसे अपनी शान के खिलाफ समझता है। हालांकि शहरों या कुछ रसूख परिवारों की बच्चियों की खबर मीडिया की सुर्खियां बन पाती हैं। तब एक ही सवाल मन में आता है कि आखिर क्यों पढ़ी-लिखी लड़कियां निर्मम हत्या का शिकार हो जाती हैं। इसका एक ही जवाब है दिखावटी उड़ाऊ शादियां, जो सिर्फ लोगों की संतुष्टि के लिए की जाती हैं, बेशक उन शादियों में प्यार, आदर और नैतिकता कम रह जाए।

हमारे विकासशील देश भारत में ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक 130 बिलियन अमरीकी डॉलर का कारोबार है, जो दुनिया के सबसे बड़ा बाजारों में से एक है। यहां मध्यम वर्ग के लिए शादियां शिक्षा से दोगुना खर्चीली हो गई हैं, जिसमें एक समारोह का खर्च 10 लाख से 50 लाख तक पहुंच जाता है। एक सर्वे के मुताबिक देश के निम्न और मध्यवर्गीय लगभग 40 प्रतिशत परिवार शादियों का खर्चा पूरा करने के लिए लोन तक लेते हैं, क्योंकि इन परिवारों के बच्चों पर अमीरों की शादियों के स्टाइल, बॉलीवुड वैडिंग का और घर के सदस्यों पर करना पड़ता है, जैसे शब्दों का प्रभाव बहुत होता है। बेशक इस उद्योग से हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है लेकिन दूरदर्शिता समाज को शादी के बेजोड़ रिश्ते की जगह दिखावटी शादी की ओर धकेल रही है, जो अच्छी बात नहीं है। जाने-माने समाजशास्त्री पेट्रीसिया ओबेरॉय का मानना है कि भव्य और महंगी शादियों के बल धन का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि ये प्रतिष्ठित उपभोग और स्पष्ट बर्बादी का दृश्यमान स्थल है।

अगर दहेज के मूल कारण पर जाएं तो खर्चीली शादियां सबसे बड़ा कारण हैं। इस पहलू पर समाज को सोचना होगा, विशेषकर युवा वर्ग को जो आजकल आजाद सोच के नाम पर स्वयं आत्मनिर्भर बन हर निर्णय लेते हैं, तो इस मुद्दे पर क्यों परिवारों के प्रभाव में आ जाते हैं। शायद कुछ तो शादी का खर्चा या जिम्मेदारी परिवार पर डालना चाहते हैं या कुछ स्वयं दिखावटी शादी करना पसंद करते हैं। लेकिन इस सब में सबसे ज्यादा नुकसान उस युवा दपंत्ति का होता है जिनकी शादी का आधार समर्पण नहीं बल्कि दिखावटी शादी होती है। उन सभी युवाओं से यही आह्वान है कि हमारे देश के सबसे खूबसूरत शादी के आदर्श को और खूबसूरत बनाने के लिए अनावश्यक खर्च वाली शादी की जगह आपसी समझ और प्यार के बंधन वाले पवित्र रिश्ते में बंधे, लेकिन ये सब वर और वधू के आपसी समझ और परिवार के सहयोग से ही संभव है। ये कोई सपना नहीं बल्कि खूबसूरत विचार है, जो संभव है। शायद घर की बेटियां अपने परिवार के साथ और मुस्कुरा सकें।

विवाह में बढ़ते दिखावे के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं : भव्य आयोजन और थीम : साधारण जयमाला और रिसेप्शन की जगह डेस्टिनेशन वेडिंग, कॉकटेल पार्टियां और बॉलीवुड स्टाइल के ‘संगीत’ समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। सोशियल मीडिया का दबाव : प्री-वेडिंग शूट, वीडियोग्राफी के लिए ड्रोन, और हर रस्म के लिए अलग थीम और महंगे डिजाइनर कपड़ों का चलन बढ़ गया है। बजट से बाहर खर्च : लोग अपनी क्षमता (चादर) से बाहर जाकर कर्ज लेकर शादियां कर रहे हैं, जिससे बाद में उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। पारिवारिक अपनापन कम होना : इस दिखावे के कारण सगे-संबंधियों और संस्कारों से ज्यादा फोकस सजावट, महंगी गाडिय़ों, वीआईपी मेहमानों पर होता है।-डा. निधि शर्मा

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