संपादकीय

तेल संकट के विरोधाभास

बुलढाणा (महाराष्ट्र) में किसान धरने पर बैठ गए हैं। उन्हें पर्याप्त डीजल नहीं मिल पा रहा है। बिन डीजल के खेती करना नामुमकिन है। किसी जगह लोगों में मारपीट की नौबत आ गई है। एक जगह ट्रक, टै्रक्टर, ट्रॉली और अपने-अपने डिब्बे, ड्रम लिए लोगों की लंबी-लंबी कतार लगी है। किसान पेट्रोल पंप के पास ही रात गुजारने, सोने को विवश हैं, लिहाजा मच्छरदानी तान कर बंदोबस्त कर रहे हैं। कोई पेट्रोल पंप ही बंद कर दिया गया है। तख्ती टांग दी गई है-पेट्रोल खत्म है और डीजल यहां नहीं बिकता। यह भारत देश की औसत तस्वीर है, हकीकत है, लेकिन केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी दावा कर रहे हैं कि देश में कच्चे तेल, नेचुरल गैस, रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं है। ऐसे विरोधाभास में कब तक जिएगा आम भारतीय? कुछ आंकड़े गौरतलब हैं। इंडियन ऑयल कंपनी ने 95,000 करोड़ रुपए से अधिक, भारतीय पेट्रोलियम ने 65,000 करोड़ रुपए से अधिक, हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने 48,000 करोड़ से अधिक और ओएनजीसी ने 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक के मुनाफे कमाए हैं। आम उपभोक्ता को कितने सस्ते पेट्रोल-डीजल और एलपीजी मुहैया कराए गए? सरकार इस संदर्भ में बिल्कुल खामोश है। अलबत्ता पेट्रोलियम मंत्री जरूर रुदनावस्था में कहते रहे हैं कि अब भी तेल कंपनियों को रोजाना 750 करोड़ रुपए का घाटा है। पेट्रोल-डीजल के दाम जितने बढ़ाए गए हैं, उससे तो कंपनियों के नुकसान की 15 फीसदी ही भरपाई होगी। यदि पेट्रोल-डीजल 10 रुपए प्रति लीटर महंगे किए जाएंगे, तो घाटे की 50 फीसदी भरपाई हो सकती है। जब पेट्रो पदार्थ 17-18 रुपए महंगे होंगे, तो तेल कंपनियों का मुनाफा शुरू हो सकता है। आखिर ये मुनाफे किसके लिए हैं? क्या इनका एक हिस्सा आम उपभोक्ता से साझा नहीं करना चाहिए। जब देश में 70-72 डॉलर प्रति बैरल कच्चा तेल आ रहा था, तब भी कंपनियों ने पेट्रो पदार्थों के खुदरा दाम क्यों नहीं घटाए थे? ये भारत की सार्वजनिक उपक्रम वाली कंपनियां हैं, जो करदाता और शेयरधारक के पैसे से चलती हैं। किसी लाला की दुकानदारी नहीं है। बहरहाल भारत में तेल-संकट का दौर है और एक बड़ी तेल कंपनी करीब 2 लाख करोड़ रुपए अमरीका में निवेश करेगी! आपदा में भारतीय कंपनी अपने देश में नहीं, विदेश में निवेश करेगी, इससे कुरूप और भद्दा विरोधाभास क्या हो सकता है? इसी तरह दवाएं बनाने वाली एक बड़ी कंपनी भी करीब 2 लाख करोड़ रुपए अमरीका में ही निवेश करेगी। यह कैसा राष्ट्रवाद है? एक और विरोधाभास उल्लेखनीय है। मार्च-अप्रैल में भारत में 1.32 लाख करोड़ रुपए का कच्चा तेल आयात किया गया। फिर उसे रिफाइन करके 150 गरीब देशों को 52,826 करोड़ रुपए के पेट्रो पदार्थ निर्यात कर दिए गए।

शेष किसी अन्य देश में बेच दिया होगा! सवाल है कि जब देश संकट में है, पेट्रोल-डीजल-गैस के लिए मारामारी है, ऐसी स्थिति में तेल देश के काम आना चाहिए था, लेकिन एक जमात को अपने धंधे और मुनाफे की ही चिंता है। सरकार ने न तो कोई कार्रवाई की है और न ही ऐसे विरोधाभास का खुलासा किया है, लेकिन मीडिया में सब कुछ बेनकाब हो गया। इन मुनाफों के बावजूद देश की सबसे प्रमुख रिलायंस कंपनी विश्व में 106वें स्थान पर है। पहले 100 में कोई भी भारतीय कंपनी नहीं है। बहरहाल चार दिन में पेट्रोल-डीजल के दाम दूसरी बार बढ़ाए गए हैैं। सतही तौर पर ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ समान लगते हैं, लेकिन उनके द्वारा वसूली व्यापक है। हालांकि कुल 4 फीसदी के करीब बढ़ोतरी की गई है। दुनिया में सबसे कम दाम भारत में ही बढ़ाए गए हैं। सरकार ने 16 बार उत्पाद शुल्क बढ़ा कर 42-43 लाख करोड़ रुपए कूटे हैं। यह विपक्ष का आरोप है, लिहाजा हम इसकी पुष्टि नहीं कर सकते। इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन सामने आया है कि ईरान युद्ध और उससे उपजे संकट, किल्लत के कारण वैश्विक जीडीपी में 500-800 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। यदि युद्ध के समापन की घोषणा राष्ट्रपति टं्रप आज ही कर दें और ईरान भी उसे कबूल कर ले, तो भी सामान्य हालात होने में 6 माह से एक साल तक का वक्त लग सकता है। तेल कुओं, रिफाइनरियों आदि के पुनर्निर्माण में तो 3-5 साल लग सकते हैं। तब तक संकट बरकरार रहेगा। कई स्थानों से ऐसी सूचनाएं आ रही हैं कि पेट्रोल-डीजल लेने गए लोगों को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा है। रसोई गैस के लिए भी कतारें लगी हैं और आपूर्ति नहीं हो पा रही है। सरकारी दावों के अनुसार तेल-गैस की देश भर में कोई कमी नहीं है, अतिरिक्त स्टाक पड़ा हुआ है, लेकिन हकीकत इससे अलग है क्योंकि इनकी खरीद को कतारों में लगे लोगों को खाली हाथ वापस लौटना पड़ रहा है। आपूर्ति की व्यवस्था चरमरा गई लगती है।

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