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भारत की विविधता से दूर होती नई पीढ़ी, अपनी विरासत को जानने की जिज्ञासा क्यों खो रही है?

अपने समाज या राष्ट्र को हम कितना जानते हैं? पिछले डेढ़ सौ वर्षों से भारत के अभिप्राय पर चर्चा, विवाद और टकराव चल रहा है। इसमें रवींद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की परिभाषाएं हैं, तो दूसरी ओर संसद में इस पर होने वाली बहस भी शामिल है। पर यह अपूर्ण है। इसका कारण दूसरे प्रश्न में छिपा है। ‘हम भारत को कितना जानने का प्रयास करते हैं?’

समाजशास्त्र और इतिहास के पाठ्यक्रम, जिन पर ‘विशेषज्ञों’ द्वारा अनगिनत बार पुनर्विचार हुआ है, भारत की सही तस्वीर दे पाने में असमर्थ हैं। यही वजह है कि पीढ़ियों के लिए ये पुस्तकें परीक्षाओं में अंक लाने तक सीमित हैं। हर पुनर्विचार थोड़ा राजनीतिक विवाद जरूर पैदा करता है, जो हमें सूचित करता है कि भारत के इतिहास, विरासत और विविधता के बारे में विपरीत विचार अभी भी मुखर हैं। यूरोप के विद्वानों को ‘भारत की खोज’ प्रेरित और उद्वेलित करती है, पर यह हमें नहीं कर पाती है।

मैक्समूलर ने 1882 में अपने भाषणों की शृंखला में बताया था कि ‘भारत: हमें क्या सिखा सकता है’, तो एलएम बाशम ने ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ (आश्चर्यजनक, जो भारत था) के द्वारा हमें वह बताया, जो दक्कन से पाटलिपुत्र तक था। उन पुस्तकों को पढ़ना हमारे लिए बौद्धिक विलासिता है, तो एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़ना अनिवार्यता है। इन दोनों से अलग अपने परिवेश, परंपरा, विरासत को ढूंढ़ना, उससे साक्षात्कार करना और उस बुनियाद पर अपने आपको विकसित करना एक सभ्यताई दायित्व भी है। इसका हमने परित्याग कर दिया है।

बीसवीं शताब्दी का एक संक्षिप्त कालखंड था, जब भारत की खोज में लोग लगे थे। वह भारत की कला, पत्रकारिता, राजनेताओं के भाषण और साहित्यकारों की लेखनी द्वारा जनसामान्य तक पहुंचता था। इसमें लोकमान्य तिलक के ‘केसरी’ से महर्षि अरविंद का ‘वंदे मातरम्’ अखबार और बिपिनचंद्र पाल का ‘सोल आफ इंडिया’ से लेकर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का ‘सोमनाथ’ उपन्यास शामिल है।

पर भारत की व्यापकता उसकी जीवन पद्धतियों में है। वे भिन्न तो दिखती हैं, पर उनमें स्वर एक है। इसी विविधता को जानने और समझने में अपनी स्वैच्छिक अज्ञानता को हमने आगे कर रखा है। 1882 से लेकर 1941 तक साम्राज्यवादी शासन के दौरान हुई जनगणना में भारत को जानने, समझने का प्रयास हुआ, जो अब नहीं हो रहा है। उदाहरण के तौर पर 1911 और 1921 की जनगणना में सामाजिक परंपराओं, त्योहारों और रीति-रिवाजों में समुदायों की परस्पर साझेदारी का विस्तृत वर्णन है। इसी में पंजाब की ‘पंचपीरिया परंपरा’, बंगाल का ‘फिरंगी काली मंदिर’ और मद्रास का डुडेकुला समुदाय आदि हैं।

वर्ष 1891 की जनगणना रिपोर्ट ने गिब्बन को उद्धृत किया कि ‘एक हजार उपवनों और हजार नदियों के देवी-देवता अपने स्थानीय और विशिष्ट प्रभावों में शांतिपूर्वक प्रतिष्ठित थे। (भारत के) प्राचीनकाल में इतनी उदार भावना और समन्वय की प्रवृत्तियां थीं कि राष्ट्र अपने धार्मिक और पूजा पद्धतियों के बीच भेदों की अपेक्षा उनकी समानताओं पर अधिक जोर देता था।’ यह भारत की रचनात्मक विविधता है। वह पहचान की कट्टरता और प्रतिद्वंद्विता, दोनों से मुक्त है।

इसी को उभारते हुए 1931 में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के जनगणना अधीक्षक एसी टर्नर ने भारत में धर्म के वैशिष्ट्य को उभारा था, ‘पश्चिम में धर्म का अर्थ ईश्वर, परलोक आदि विचारों और अलौकिक शक्तियों से है, तो भारत में धर्म सामाजिक क्षेत्र के संपूर्ण आचरण को समाहित करता है।’

भारत की श्रेष्ठता को स्वीकार करने में इन रपटों में थोड़ी भी हिचकिचाहट नहीं थी। इसीलिए 1931 के जनगणना आयुक्त जेएच हट्टन ने भारत के धार्मिक मेलों की महत्ता, प्रकार, प्रभाव और प्रचंड स्वरूप के सामने यूरोप के सभी ऐसे मेलों को नगण्य माना था। ‘धार्मिक तीर्थयात्राएं भारतीय जीवन में किसी भी अन्य राष्ट्र की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्व निभाती हैं। यहां तक कि ‘सेंट जेम्स आफ काम्पोस्टेला’ की अत्यंत प्राचीन यात्राएं और लूर्डे की गुफा तक की आधुनिक यात्राएं भी इलाहाबाद के कुंभ की तुलना में नगण्य प्रतीत होती हैं।’ वे हमारी इसी विशिष्टता को देख रहे थे, जिसमें विविधता के बीच समन्वय था।

वर्ष 2020 में मैंने जब संसद में मेघालय के कोंगथोंग की चर्चा की, जहां स्वर उच्चारण से लोग एक-दूसरे को पहचानते और बुलाते हैं, तो आश्चर्य हुआ। मेघालय का केंद्रीय विश्वविद्यालय भी इससे अनभिज्ञ था। ठीक वैसे, जैसे अरुणाचल के दिबांग घाटी में अनिनी गांव की इदु मिश्मी जनजाति के लोगों की मान्यताओं, परंपराओं के बारे में स्वतंत्र भारत का समाज अज्ञानी बना हुआ है। विश्वविद्यालय अपने आसपास की संस्कृतियों, परंपराओं को प्रसारित करने का माध्यम हो सकते हैं। इसके लिए ‘स्थानीयता’ अध्ययन केंद्र एक अच्छा उपक्रम हो सकता है।

पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण भी देश के अनेक हिस्सों में है। इसे मेघालय में खासी जयंतिया के लोग ‘ला लिंगडोह’ कहते हैं। पश्चिम खासी (मेघालय) में 78 एकड़ में मवफलांग पवित्र वन है, जिसमें कोई एक पत्ता भी तोड़ नहीं सकता। कर्नाटक के शिमोगा में मुत्तर, आंध्र के श्रीकुरमन, सोलापुर के शेटफल गांव जैसे तमाम उदाहरण हैं, जो आश्चर्य में डालने वाली परंपराओं के जीवंत उदाहरण हैं।

आधुनिकता और नवउदारवाद ने हमें ‘अच्छे मकान’, ‘अच्छे वेतन’, ‘अच्छे वस्त्र’ और ‘अच्छे भोजन’ तक सीमित कर दिया है। पर यह विनाशकारी है। यह मानव मन की उत्कंठा को मारता है, रचनात्मकता को दबाता है और भौतिकता को बढ़ाता है। इसका परिणाम आना शुरू हो गया है। मशीन से उत्पादित वस्तुओं की तरह मनुष्य एकरूपता में नहीं रह सकता, लेकिन लुधियाना से लद्दाख तक माल और क्लब की संस्कृति ने हमें ऐसा ही बना दिया है।

संस्कृति और समाज स्थिरता में नहीं रहते हैं। सतत परिवर्तन इसका स्वभाव है। इसी परिवर्तन का सारथी बनने की क्षमता, लालसा और उत्कंठा को उभारना ही हमारी विरासत और भविष्य को जोड़ सकेगा।-राकेश सिन्हा

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