बंगाल का ‘रक्त-चरित्र’

बेशक पश्चिम बंगाल में ‘परिवर्तन’ का जनादेश दिया गया है और आज पहली भाजपा सरकार शपथ ग्रहण कर रही है, लेकिन बंगाल का ‘रक्त-चरित्र’ नहीं बदला है। जनादेश के बाद बंगाल का ‘बदलापुर’ सामने है। चुनाव के बाद हिंसा, हत्या, आगजनी, तोडफ़ोड़, कब्जेबाजी और बुलडोजर सरेआम दिख रहे हैं। पांच राजनीतिक हत्याएं की जा चुकी हैं। उनमें घोर निर्मम हत्या सुवेन्दु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की है। सुवेन्दु भाजपा सरकार के भावी मुख्यमंत्री माने जा रहे हैं। गौरतलब है कि उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनकी घरेलू सीट ‘भवानीपुर’ में पराजित किया है। चंद्रनाथ राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे। वायुसेना से सेवानिवृत्त थे। वह सुवेन्दु के साथ तब से कार्यरत थे, जब सुवेन्दु ममता सरकार में मंत्री थे और मुख्यमंत्री के भरोसेमंद नेता थे। हमलावरों ने चंद्रनाथ को उनके घर से 100-150 मीटर दूर ही गोलियों से भून दिया। हमलावर अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं, लेकिन एसआईटी की जांच जारी है। ममता बनर्जी ने अदालत की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की है, जिसे तृणमूल नेता दोहरा रहे हैं। सुवेन्दु अधिकारी का मानना है कि हमलावरों के निशाने पर वह थे, क्योंकि उन्होंने ममता बनर्जी को हराया है, लेकिन उनके सहायक की हत्या कर दी गई। यह पूर्व नियोजित, साजिशाना, नृशंस हत्या है। हमलावरों को बख्शा नहीं जाएगा। दरअसल यह हत्या ही बंगाल के ‘रक्तचरित्र’ को बयां करती है। हालांकि चुनाव और जनादेश के बाद भाजपा कार्यकर्ता मधु मंडल और तृणमूल के कार्यकर्ता अबीर शेख की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। कांग्रेस कार्यकर्ता को भी मारा गया है, जबकि बंगाल में कांग्रेस के अवशेष ही बचे हैं।
बंगाल के कोलकाता, हावड़ा, टॉलीगंज, हुगली, बांकुरा, आसनसोल, बीरभूम, जलपाईगुड़ी से 24 परगना तक हिंसा का जो ‘नंगा नाच’ सामने आया है, उनके ‘रक्तबीज’ कौन हैं? कमोबेश बंगाल से ‘भद्रलोक’ का सम्मानजनक विशेषण छीन लेना चाहिए, क्योंकि अब वह मुखौटा भर है, क्योंकि राजनीतिक हिंसा और हत्याओं में बंगाल देश में शीर्ष स्थान पर है। यह राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का आंकड़ा है। इस बार भी 400 से अधिक जगहों पर हिंसा, तोडफ़ोड़, आगजनी की घटनाएं हुई हैं। 200 से अधिक अप्राथमिकी दर्ज की गई हैं, 433 लोगों की गिरफ्तारियां की गई हैं और करीब 1100 लोग हिरासत में लिए गए हैं। राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों के 2.40 लाख जवान तैनात किए गए थे। सीएपीएफ की 500 कंपनियां और तैनात की जा रही हैं, लेकिन बंगाल का ‘रक्तचरित्र’ यथावत है, कोई अंकुश नहीं, कोई बदलाव नहीं। बेशक प्रधानमंत्री मोदी ‘बदला नहीं, बदलाव’ की अपील करते रहें। इस बार चुनाव के दौरान अपेक्षाकृत बहुत कम हिंसा हुई। हत्या कोई नहीं हुई थी, लेकिन चुनाव और जनादेश के बाद बंगाल का ‘रक्तरंजित’ चरित्र सामने आ गया। दरअसल बंगाल में जो ‘रक्तबीज’ कांग्रेस ने बोया था, उससे पैदा हिंसा की फसलों को वाममोर्चे की सत्ता के दौरान ‘संस्थानगत’ आकार दिया गया। तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, तो वामदलों के गुंडे, अपराधियों ने निष्ठाएं बदल लीं और तृणमूल के साथ जुड़ गए। नतीजतन 15 साल की सत्ता के दौरान हिंसा, हत्या, दादागीरी, गुंडई और इलाकाई बदमाशी का एक ‘इकोसिस्टम’ तैयार हो गया। तृणमूल के गुंडे, हमलावर आज भी उसी सिस्टम की धमकियां दे रहे हैं, लिहाजा भाजपा सरकार के सामने सबसे विराट चुनौती यही है कि उस सिस्टम को प्राथमिकता के साथ कुचला जाए। अब जनादेश के बाद उन दफ्तरों को छुड़ाने के लिए उत्पात मचाए जा रहे हैं, जिन पर किसी अन्य दल ने कब्जा कर लिया था। ऐसे हमले तृणमूल के दफ्तरों पर अधिक हो रहे हैं। तृणमूल दफ्तरों पर बुलडोजर चलाने की भी खबरें हैं। बहरहाल बंगाल के ‘रक्तचरित्र’ के लिए ममता बनर्जी और उनके सांसद-भतीजे अभिषेक बनर्जी को माफ नहीं किया जाना चाहिए। अभिषेक ने ‘जल्लाद’, ‘दिल्ली में बाप’ और ‘अमित शाह बंगाल में घुस कर दिखाए’ सरीखे शब्दों और वाक्यों का जो इस्तेमाल किया था, उस पर हिंसा और हत्याओं की सुई केंद्रित क्यों न की जाए?



