इस्तीफा नहीं दूंगा… छिलकों की छाबड़ी

जो करना है कर लो…जो पेड़ उखाडऩा है…उखाड़ लो…जो रिजल्ट दिखाना है…दिखा लो… मैं इस्तीफा नहीं दूंगा! इस्तीफे की ऐसी की तैसी! यह भी कोई चुनाव हुआ भला? ना मेरी सुनी गई, ना मेरे समर्थकों की सुनी गई। मेरी कुर्सी पर कब्जा करने की साजिश रची गई। लोकतंत्र के इस महान मेले में जनता ने फिर वही गलती कर दी- वोट डाल दिए। अब जनता को कौन समझाए कि वोट डालना और सही जगह डालना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। जनता भावुक प्राणी है। कभी गैस सिलेंडर देखकर पिघल जाती है, कभी मुफ्त की बिजली पर मुस्कुरा देती है, और कभी पांच साल पुरानी सडक़ पर नया डामर देखकर विकास का जयघोष करने लगती है। मैंने तो साफ कहा था- ‘भाइयो-बहनो, विकास मैं हूं, व्यवस्था मैं हूं, अनुभव मैं हूं, और अगर मैं नहीं तो फिर अराजकता है।’ लेकिन जनता को शायद स्थिरता से एलर्जी है। उन्हें हर बार नया चेहरा चाहिए, जैसे राजनीति नहीं, मोबाइल का मॉडल खरीद रहे हों। मेरे विरोधी कहते हैं कि मैं कुर्सी से चिपका हुआ हूं। अरे भाई, चिपका नहीं हूं, समर्पित हूं! यह कुर्सी मेरे लिए सिर्फ फर्नीचर नहीं, तपस्या का परिणाम है। कितने धरने, कितनी रैलियां, कितने पोस्टर, कितने झूठे वादे और कितने सच्चे समझौते करने पड़े हैं, तब जाकर यह कुर्सी मिली है। क्या यह इतनी सस्ती चीज है कि हारते ही छोड़ दूं? जनता को लगता है कि नेता हार गया तो उसे नैतिकता दिखानी चाहिए। नैतिकता! राजनीति में यह शब्द वैसे ही लगता है जैसे मिठाई की दुकान पर शुगर फ्री का बोर्ड। दिखाने के लिए अच्छा, खाने में बेकार।
मेरे सलाहकार ने कहा- ‘सर, माहौल खराब है, इस्तीफा दे दीजिए, सम्मान बच जाएगा।’ मैंने कहा- ‘सम्मान? राजनीति में? तुम नए लगते हो!’ यहां तो लोग आरोपों को उपलब्धि मानते हैं। जितने ज्यादा घोटाले, उतनी बड़ी हैसियत। जितनी लंबी जांच, उतनी मजबूत छवि। जेल यात्रा तो अब राजनीतिक तीर्थयात्रा मानी जाती है। ऐसे पवित्र माहौल में तुम मुझसे इस्तीफे की बात कर रहे हो! मीडिया भी बड़ा निर्दयी है। कल तक वही चैनल मुझे ‘जनता का मसीहा’ बता रहे थे, आज वही ‘कुर्सी का लालची’ कह रहे हैं। एंकर ऐसे चिल्ला रहे हैं जैसे मेरी हार से उनका निजी निवेश डूब गया हो। एक ने तो बहस में पूछ लिया- ‘क्या आप नैतिक आधार पर इस्तीफा देंगे?’ मैंने कहा- ‘पहले आप नैतिक आधार पर चिल्लाना बंद कीजिए।’ मेरा ड्राइवर तक सलाह देने लगा- ‘साहब, अब तो छोड़ दीजिए।’ मैंने उससे कहा- ‘तू गाड़ी चला। देश मैं चलाऊंगा।’ असल समस्या यह है कि जनता नेता को इनसान नहीं, एटीएम समझती है। चुनाव के समय सबको याद आता है- किसी को नौकरी चाहिए, किसी को ठेका, किसी को ट्रांसफर, किसी को पड़ोसी पर एफआईआर। और जब काम न हो तो वही आदमी कहता है- ‘नेता भ्रष्ट है।’ भ्रष्टाचार भी बड़ा दिलचस्प शब्द है। जब सामने वाला करे तो भ्रष्टाचार, जब अपना आदमी करे तो व्यवस्थागत मजबूरी। राजनीति में सिद्धांत मौसम विभाग की भविष्यवाणी की तरह होते हैं, कभी भी बदल सकते हैं। मेरे समर्थक अभी भी डटे हुए हैं। उन्होंने नारे लगाए- ‘नेता जी संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं!’ मैंने पूछा- ‘कितने लोग हैं?’ बोले- ‘सोशल मीडिया पर लाखों।’ मैं समझ गया, जमीन पर फिर वही चार लोग और एक ढोलक। विपक्ष चाहता है कि मैं इस्तीफा दूं ताकि वे मेरी कुर्सी पर बैठ सकें। वे इसे जनहित बता रहे हैं। राजनीति में जनहित सबसे उपयोगी मुखौटा है। अंदर चाहे जो हो, बदला, महत्वाकांक्षा, कुंठा या पुराना हिसाब, ऊपर से सब जनहित ही दिखता है। मैंने भी तय कर लिया है, अब मैं और मजबूत होकर उभरूंगा। हार को जनादेश नहीं, तकनीकी त्रुटि घोषित करूंगा।



