संपादकीय

ममता का ‘चुनावी लूट’ नारा

चुनाव में करारी पराजय के बावजूद ममता बनर्जी ने नया प्रलाप शुरू किया है कि वह ‘लोकभवन’ जाकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी। वह चुनाव में हारी नहीं हैं, तो इस्तीफा क्यों दें? वह चुनाव नहीं हारी हैं, बल्कि उनकी 100 सीटें जबरन लूट ली गई हैं। चुनाव आयोग ‘मुख्य खलनायक’ है और देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की निगरानी में यह ‘चुनावी लूट’ की गई है। ममता का बेहद गंभीर आरोप है कि मतगणना केंद्र में उनके पेट और उनकी पीठ पर लातें मारी गईं। उन्हें धकिया कर मतगणना केंद्र से बाहर निकाल दिया गया। ये आरोप हिंसात्मक भी हैं। जब ममता बनर्जी मतगणना केंद्र में गई थीं, तो वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री थीं और भवानीपुर सीट पर उम्मीदवार भी थीं। सवाल और आश्चर्य है कि एक सार्वजनिक स्थल पर कोई भी एक मुख्यमंत्री, महिला मुख्यमंत्री, पर हिंसात्मक हमला कैसे कर सकता है? सुरक्षाकर्मी कहां थे? ऐसे हमले की प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई गई? क्या कोई साक्षी है उस हमले का? बहरहाल ममता बनर्जी ने ‘चुनावी लूट’ का नया नारा दिया है। इस मुद्दे पर अब वह सडक़ों पर संघर्ष करेंगी और फिर सत्ता में लौटेंगी। बेशक ममता योद्धा किस्म की नेता रही हैं। हार के बाद ममता बनर्जी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें अथवा न दें, लेकिन 7 मई के बाद वह खुद ही ‘पूर्व मुख्यमंत्री’ हो जाएंगी। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक ही है।

चुनाव आयोग ने असम और बंगाल के नवनिर्वाचित विधायकों की अधिसूचनाएं संबद्ध राज्यपालों को भेज दी हैं। राज्यपाल ‘प्रोटेम स्पीकर’ की नियुक्ति करेंगे और वह सभी विधायकों को शपथ दिलाएंगे। जब नई विधानसभा गठित होगी और ममता विधायक भी नहीं होंगी, तो मुख्यमंत्री कैसे बनी रह सकती हैं? नए मुख्यमंत्री और कैबिनेट 9 मई को शपथ ग्रहण कर सकते हैं। दरअसल संविधान के अनुच्छेद 154 में स्पष्ट उल्लेख है कि राज्य की कार्यपालिका की तमाम शक्तियां राज्यपाल में निहित होती हैं। राज्यपाल खुद या अधीनस्थ अधिकारियों (मुख्यमंत्री, मंत्रीगण) के जरिए उन शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। राज्यपाल चाहें, तो वह मुख्यमंत्री को हटा भी सकते हैं, क्योंकि ऐसी नियुक्ति राज्यपाल के ‘प्लेजर’ (प्रसन्नता, संतोष) तक ही सीमित होती हैं। यह अलग मुद्दा है कि मुख्यमंत्री को सदन में ‘सामान्य बहुमत’ प्राप्त होना चाहिए। यदि बहुमत या विश्वास का परीक्षण किया जाना है, तो उसका अंतिम निर्णय ‘सदन’ में ही होगा, लेकिन कोई भी निवर्तमान मुख्यमंत्री, चुनाव के बाद, सत्ता-हस्तांतरण से एकदम पहले इस्तीफा देने से इंकार नहीं कर सकता। नैतिक-वैतिक जीत-हार कुछ नहीं होता। जिसके पक्ष में जनादेश के निर्णायक आंकड़े हैं, वही सत्तारूढ़ होगा। ममता को जनादेश ‘लूट’ लगता है, तो डाटा और दलीलों के साथ सर्वोच्च अदालत में जाएं। ममता ने ‘चुनावी लूट’ का जो प्रलाप शुरू कर राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने से इंकार का जो बयान दिया है, वह लोकतंत्र और संविधान के साथ भद्दा मजाक है। हमें याद नहीं कि देश में किसी भी मुख्यमंत्री ने, चुनाव हारने के बाद, इस्तीफा देने से इंकार किया हो! लोकतंत्र ने ममता बनर्जी के खिलाफ निर्णायक जनादेश दिया है, उसे विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन और केरलम के मुख्यमंत्री विजयन ने चुनावी पराजय के बाद इस्तीफे दे दिए हैं। उन राज्यों में सत्ता-हस्तांतरण की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। देश के किसी भी प्रधानमंत्री ने जनादेश के बाद पद छोडऩे में विलंब नहीं किया। यही भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती और ताकत भी है। बहरहाल अब ममता बनर्जी के ‘लूट’ वाले नारे को राहुल गांधी, अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, केजरीवाल, हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव सरीखे विपक्षी नेताओं ने समर्थन के ऐलान किए हैं, लेकिन खासकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव के दौरान ममता बनर्जी का खुल कर विरोध किया था और बंगाल में भाजपा की सेंधमारी के लिए ममता की ध्रुवीकरण वाली राजनीति को ही ‘जिम्मेदार’ करार दिया था। अब ‘वोट चोरी’ के बजाय ‘चुनावी लूट’ पर दोनों नेता साथ-साथ आने की घोषणा कर चुके हैं। बंगाल के पूरे चुनाव के संदर्भ में उन 27 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम गौरतलब हैं, जो आज भी विचाराधीन हैं। उनके मताधिकार अटके, लटके, भटके हुए हैं। ममता इस मुद्दे पर जरूर लड़ें। इस बीच जहां-जहां चुनाव हुए हैं, वहां-वहां नई सरकारों के गठन की तैयारियां चल रही हैं। तीन राज्यों में भाजपा जीती है, तमिलनाडू में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बजाय एक अभिनेता की नई पार्टी जीती है, जबकि केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन जीता है।

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