लेख

प्रेम का धर्म, धरा का मंदिर

यह कोई विचारधारा नहीं, एक जीवन-पद्धति है। इसे मानना नहीं, जीना होता है। और जब हम इसे जीते हैं, तब हमारा जीवन एक नृत्य बन जाता है, एक ऐसा नृत्य जिसमें कोई दीवार नहीं, कोई सीमा नहीं, केवल प्रेम का विस्तार है। यदि हमारा धर्म प्यार है, तो नियम बहुत सरल हो जाएगा- जो भी करो, प्रेम से करो। चाय बनानी है? प्रेम से बनाओ। बहस करनी है? प्रेम से करो। गुस्सा आ गया? थोड़ा रुककर प्रेम से संभालो। यानी धर्म कोई भारी ग्रंथ नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हल्का-फुल्का अनुशासन बन जाएगा। और हां, परीक्षा भी रोज होगी, हम खुद अपने परीक्षक होंगे। प्रेम का धर्म किसी एक समुदाय का नहीं, समूची मानवता का धर्म है, मानव होने का धर्म है। धरती का मंदिर सबका है। हृदय का ग्रंथ सब पढ़ सकते हैं। और दयालुता की प्रार्थना हर कोई कर सकता है…

भगवान श्री कृष्ण का विराट रूप। मानो हजारों सूर्य चमक उठे। हर दिशा में मुख और आंखें। उस अनंत अपार शरीर में सारी सृष्टि। सारी सृष्टि में वही एक अनंत प्रभु व्याप्त। चारों ओर से देवों, असुरों, ऋषियों और सिद्धों का स्तुति गान। प्रकाश ही प्रकाश। भगवान श्री कृष्ण के इस अद्भुत और दिव्य विराट रूप से अभिभूत और विकल हुए अर्जुन ने नतमस्तक होकर हाथ जोड़े और विनीत स्वर में बोला, ‘हे केशव, मैंने भूल से, अज्ञानवश, मजाक में, सबके सामने या अकेले में कभी आपको मित्र कहा हो, आपका अनादर किया हो, तो कृपा करके मुझे क्षमा कर दीजिए।’ जिस तरह से अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक जाने-अनजाने में हुई अपनी हर भूल के लिए क्षमा मांग ली, आज के युग में भी वैसे ही विनम्रतापूर्वक क्षमा मांग लेना भारतीय संस्कृति का अभिन्न भाग है। क्षमा मांग लेना और क्षमा कर देना तभी संभव होता है जब प्रेम हमारा धर्म बन जाए, हमारा पूरा अस्तित्व ही प्रेममय हो जाए। प्रेम अगर हमारा धर्म बन जाए तो दुनिया ही बदल जाती है क्योंकि हमारा नजरिया बदल गया, सोच बदल गई, सोचने-समझने का तरीका बदल गया। हम किसी भी दृष्टिकोण से देखें, दुनिया सचमुच बदल जाती है। यह कथन भावनात्मक भी है, दार्शनिक भी, और वैज्ञानिक भी। प्रेम सामाजिक बंधन का आधार है, नैतिकता का केंद्र है और आध्यात्मिक एकत्व का अनुभव है। जब हम प्रेम को धर्म कहते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारा आचरण करुणा पर आधारित होगा। प्रेम जैविक और सामाजिक विकास का आधार है।

न्यूरोसाइंस बताती है कि जब हम प्रेम और करुणा का अनुभव करते हैं, तब मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन, डोपामिन और सेरोटोनिन जैसे रसायन सक्रिय होते हैं। ये रसायन न केवल हमें सुख का अनुभव कराते हैं, बल्कि सामाजिक बंधन को भी मजबूत करते हैं। इस प्रकार प्रेम केवल आध्यात्मिक आदर्श नहीं, बल्कि मानव विकास की एक जैविक आवश्यकता है। जब हम कहते हैं कि हमारा प्रेम ही हमारा धर्म है तो हम धर्म की उसी सनातन व्याख्या को स्वीकार करते हैं जो हमें बांटने के बजाय जोड़ती है। प्रेम बांटता नहीं, जोड़ता है। प्रेम किसी झंडे के नीचे खड़ा नहीं होता, वह खुले आकाश में नृत्य करता है। जब हम कहते हैं कि हमारा धर्म प्रेम है, तब हमें किसी संकीर्ण पहचान की आवश्यकता नहीं रह जाती। हम सिर्फ इनसान हो गए और इनसानियत हमारा व्यवहार हो गया। इसी तरह जब हम धरती को मंदिर मानते हैं, तब हम उस पर हिंसा नहीं कर सकते। हम उसे दूषित नहीं करते। हम ऐसा समझेंगे तो विभाजन नहीं रह जाएगा। हम धर्म के नाम पर लडऩे की बजाय प्रेम के नाम पर जुड़ेंगे। यदि हमारा धर्म प्रेम है, तो हम किसी को पराया नहीं मानेंगे। तब जाति, भाषा, पंथ के भेद गौण हो जाएंगे। हम सब एक ही धरती के पुत्र हैं, और यही धरती हमारा मंदिर है। इस मंदिर की रक्षा करना, इसे प्रदूषण से बचाना, इसे सम्मान देना, यही हमारी पूजा होगी।

जब हम धरती को ही अपना मंदिर मान लें तो तब हमें अपने ईश्वर को दीवारों में बंद करने की जरूरत नहीं रह जाती। आकाश हमारा गुंबद है, वृक्ष हमारे स्तंभ हैं, नदियां हमारा शंखनाद हैं, और जीवन नृत्य हो जाता है, जीवन उत्सव बन जाता है क्योंकि हम जो भी देखें, जिसे भी देखें, सब तरफ उस सर्वशक्तिमान परमात्मा का ही नूर जगमगाता नजर आता है। मेरा कोई अलग ग्रंथ नहीं है, मेरा हृदय ही मेरा ग्रंथ है। हृदय का ग्रंथ शब्दों में नहीं लिखा जाता, वह अनुभवों में लिखा जाता है। जब हम प्रेम करते हैं, जब हम क्षमा करते हैं, जब हम किसी को बिना शर्त स्वीकार करते हैं- तभी हम उस ग्रंथ को पढ़ते हैं। यदि हम केवल किताबों में सत्य खोजते रहेंगे, तो हम बाहर भटकते रहेंगे। सत्य भीतर धडक़ रहा है। दर्शनशास्त्र की भाषा में हृदय वह आंतरिक विवेक है जो हमें सही और गलत का बोध कराता है। यदि हम हृदय को ग्रंथ मानते हैं, तो इसका अर्थ है कि नैतिकता बाहरी आदेश से नहीं, आंतरिक चेतना से उत्पन्न होती है। नैतिक नियम हमारे भीतर के विवेक से उत्पन्न होते हैं। जब हम हृदय को ग्रंथ मानते हैं और आंतरिक विवेक का सहारा लेते हैं तो कोई गलत काम करना, अनैतिक काम करना, किसी के साथ झूठ बोलना, किसी का अपमान करना, किसी को धोखा देना आदि संभव नहीं हो पाता क्योंकि तब हमारा आंतरिक विवेक हमें तुरंत आगाह करता है कि हम कुछ गलत कर रहे हैं। प्रेम को धर्म मान लिया और धरती को मंदिर मान लिया और हृदय को ग्रंथ मान लिया तो करुणा हमारी प्रार्थना बन जाती है, पूजा बन जाती है, अर्चना बन जाती है। तब हमारी प्रार्थना शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं रहेगी, बल्कि व्यवहार का विस्तार बन जाएगी। जब हम किसी भूखे को भोजन देंगे, जब हम किसी दुखी को सहारा देंगे, जब हम किसी शत्रु को क्षमा करेंगे- वही हमारी प्रार्थना होगी। तब हम पाएंगे कि प्रार्थना मंदिर में सीमित नहीं, जीवन में प्रवाहित है। हम ऐसा समझेंगे तो देखेंगे कि धर्म कोई संस्था नहीं, एक अनुभव है। प्रेम कोई नियम नहीं, एक स्वाभाविकता है। जब हम प्रेम में जीते हैं, तब हम मुक्त होते हैं। तब हमें भय नहीं रहता कि कौन सही है, कौन गलत। हम जागरूक होते हैं, द्रष्टा होते हैं, हर चीज के साक्षी होते हैं पर साथ ही हर पल हम प्रेम से ओतप्रोत रहते हैं और किसी दूसरे की गलतियों पर हम न निराश होते हैं, न नाराज होते हैं, बल्कि करुणामय दृष्टिकोण से सहायता करते हैं ताकि भूल का सुधार हो सके। अंतत: हम ऐसा जानेंगे कि धरती मंदिर है, हृदय ग्रंथ है, प्रेम धर्म है, और दयालुता प्रार्थना है।

यह कोई विचारधारा नहीं, एक जीवन-पद्धति है। इसे मानना नहीं, जीना होता है। और जब हम इसे जीते हैं, तब हमारा जीवन एक नृत्य बन जाता है, एक ऐसा नृत्य जिसमें कोई दीवार नहीं, कोई सीमा नहीं, केवल प्रेम का विस्तार है। यदि हमारा धर्म प्यार है, तो नियम बहुत सरल हो जाएगा- जो भी करो, प्रेम से करो। चाय बनानी है? प्रेम से बनाओ। बहस करनी है? प्रेम से करो। गुस्सा आ गया? थोड़ा रुककर प्रेम से संभालो। यानी धर्म कोई भारी ग्रंथ नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हल्का-फुल्का अनुशासन बन जाएगा। और हां, परीक्षा भी रोज होगी, हम खुद अपने परीक्षक होंगे। प्रेम का धर्म किसी एक समुदाय का नहीं, समूची मानवता का धर्म है, मानव होने का धर्म है। धरती का मंदिर सबका है। हृदय का ग्रंथ सब पढ़ सकते हैं। और दयालुता की प्रार्थना हर कोई कर सकता है। जब हम इस समन्वित दृष्टि को अपनाते हैं, तब जीवन में विभाजन समाप्त हो जाता है और एकत्व बढ़ता है। सिर्फ प्रेम का मार्ग ही ऐसा मार्ग है जहां विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म एक साथ खड़े दिखाई देते हैं, प्रेम के पक्ष में, तो आइये आज से हम प्रेम को धर्म बनाएं, प्रेमधर्मी हो जाएं।-सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण

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