राजनीति

द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0: थलापति विजय…हिंदू मां-ईसाई पिता, BJP दुश्मन तो क्या पेरियार को मानते भगवान?

तमिलनाडु में एक्टर विजय की पार्टी TVK पहली बार में झंडा गाड़ चुकी है. टीवीके तमिलनाडु में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. अब इस जीत के बात शायद थलापति विजय नए सीएम बन सकते हैं. एक्टर विजय का अब द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0 के तहत सेक्युलर सोशल जस्टिस और भ्रष्टाचार विरोध पर जोर होगा. चलिए जानते हैं थलपति विजय की पॉलिटिकल एंट्री और द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0 को.

Actor Vijay TVK: सौ बात की एक बात ये कि तमिलनाडु में एक्टर विजय चुनाव जीत गए. अब सबकी दिलचस्पी तो इस बात में बहुत होगी कि एक फ़िल्मों का हीरो पार्टी बनाकर चुनाव लड़कर पहले ही चुनाव में ऐसा जीता कि अब मुख्यमंत्री बन सकता है. लेकिन तमिलनाडु के बाहर के लोग ज़्यादा समझ नहीं पा रहे कि उनकी पॉलिटिक्स क्या है, उनकी विचारधारा क्या है. तो उसकी वजह ये भी है कि उत्तर भारत के ज़्यादातर लोग द्रविड़ पॉलिटिक्स का इतिहास ज़्यादा जानते नहीं. असल में ये ज़्यादा बताया ही नहीं गया शायद. और नाम के साथ धर्म जोड़ने वाले भी नहीं समझ पाते कि विजय नाम का व्यक्ति चर्च क्यों जा रहा है? क्योंकि विजय अपने चुनाव अभियान में मंदिर भी जाते दिखे और चर्च भी जाते दिखे. फिर लोगों को जब पता चलता है कि उनका नाम जोजफ़ विजय चंद्रशेखर है तो वो और कनफ़्यूज़ हो जाते हैं. तो विजय के पिता हैं एस. ए. चंद्रशेखर और वो ईसाई हैं और उनकी मां जो हैं वो हिंदू हैं. और उनकी पार्टी जो है TVK उसकी विचारधारा वो कहते हैं कि वो सेक्युलर सोशल जस्टिस की है. वो जिन ऐतिहासिक हस्तियों को फ़ॉलो करने की बात करते हैं उनमें नाम लेते हैं परियार का, डॉक्टर आंबेडकर का, कामराज का, रानी वेलु नाचियार का, और अंजलई अम्माल का.

आज की उत्तर भारत की पब्लिक डॉक्टर आंबेडकर के नाम से तो वाकिफ़ है. शायद कामराज का नाम भी सुना हो, लेकिन बाक़ी नामों के बारे में उत्तर भारत में लोग ज़्यादा नहीं जानते. तो उसके लिए द्रविड़ पॉलिटिक्स को थोड़ा समझना और जानना ज़रूरी है. जानना ज़रूरी है कि देश में सिर्फ़ बीजेपी कांग्रेस वाली पॉलिटिक्स ही नहीं है. ये जो तमिलनाडु में DMK और AIADMK में ही सत्ता घूमती रहती थी, उसमें ये जो TVK पार्टी की एंट्री हुई है तो क्या ये विचारधारा DMK और AIADMK की विचारधारा से अलग है? BJP की विचारधारा जैसी विजय बात नहीं कर रहे क्योंकि एक तो वो सेक्युलर की बात करते हैं, और दूसरा वो चुनाव में BJP को वैचारिक दुश्मन बता चुके हैं. तो क्या वो कांग्रेस जैसे हैं? क्योंकि वो कामराज का नाम लेते हैं. और कामराज तो कांग्रेस के कद्दावर नेता होते थे. लेकिन वो पेरियार का भी नाम लेते हैं. और पेरियार तो वो थे जिनकी द्रविड़ विचारधारा से ही प्रेरित हो कर DMK पार्टी बनी थी. और DMK ने तमिलनाडु में कांग्रेस का राज हमेशा के लिए ऐसा ख़त्म किया था कि फिर कांग्रेस तमिल नाडु में वापस आ ही नहीं पाई.

तमिलनाडु में हिदू धर्म और ब्राह्मण कथा

तो वो क्या था कि तमिल नाडु को अंग्रेज़ों के टाइम में कहते थे मद्रास प्रेसिडेंसी. उसमें आंध्र भी था, केरल के भी कुछ हिस्से थे और कर्नाटक के भी. ख़ैर, वो अलग विषय है. लेकिन मद्रास प्रेसिडेंसी में अंग्रेज़ों के टाइम ही कांग्रेस के विरोध में एक पार्टी खड़ी हो गई थी. 1916 में ही, यानी गांधी के आने से भी पहले. उस पार्टी का नाम था जस्टिस पार्टी. और उसका कहना था कि कांग्रेस जो है वो ब्राह्मणों की पार्टी है. और ये सब लोग हिंदू धर्म के नाम पर ब्राह्मण लोग पिछड़ों और दलितों का शोषण करते हैं. और आज़ादी मिल गई और उनकी सरकार आ गई तो और ज़्यादा बुरा हाल होगा. इसलिए जो ये पार्टी बनी जस्टिस पार्टी, ये एक तरह से द्रविड़ पॉलिटिक्स की पहली पार्टी थी. और विचार ये था कि उत्तर भारत की संस्कृति को पूरे भारत की संस्कृति नहीं कहा जा सकता, और ये हिंदू धर्म के नाम पर असल में ब्राह्मणवाद है. उस समय मद्रास प्रेसिडेंसी में ब्राह्मण सरकारी नौकरियों और पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे थे. तो जस्टिस पार्टी ने कहा कि वहां के मूल निवासी तो द्रविड़ हैं और उनको ये ब्राह्मण पिछड़ा मानते हैं और पिछडे फिर दलितों को अपने से नीचे मानते हैं, तो ये जो व्यवस्था है ये द्रविड़ व्यवस्था नहीं है.

तमिल समाज और उसकी सोच

सिर्फ़ अपने जन्म की वजह से कि कौन किस परिवार में पैदा हुआ, उससे वो समाज में ऊंचा-नीचा नहीं हो सकता. और उनका मानना था कि ये उत्तर भारत की सोच है जो द्रविड़ समाज पर थोपी गई है सदियों तक. इसलिए आज़ादी आने पर ये सोच नहीं रहनी चाहिए. आर्य संस्कृति उनकी संस्कृति नहीं है, और सबको हिंदी आनी चाहिए और भारत को जोड़ने वाली भाषा हिंदी ही हो सकती है इस विचार के भी वो ख़िलाफ़ थे और इसलिए कांग्रेस के खिलाफ़ खड़े हो गए थे. लेकिन 1916 में बनी ये पार्टी ज़्यादा समर्थन नहीं जुटा पाई थी. फिर 1925 में पेरियार नाम के नेता ने कांग्रेस छोड़ी और इन्हीं विचारों पर सेल्फ़ रेस्पेक्ट मूवमेंट शुरू की. और वो तो इतने उग्र तरीक़े से ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ खड़े हो गए थे कि हिंदू देवी-देवताओं को पता नहीं क्या-क्या कह देते थे. मंदिरों तक में जा कर ऐसे-ऐसे विरोध प्रदर्शन कर देते थे ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़. और ये इतना उग्र आंदोलन था कि एक स्तर पर तो हिंदू धर्म की व्यवस्था जो थी उसके पूरी तरह ख़िलाफ़ ही हो गया था.

पेरियार और जस्टिस पार्टी का इतिहास

फिर 1938 में पेरियार जस्टिस पार्टी में शामिल हो गए और उन्होंने उस जस्टिस पार्टी में जान फूंक दी. और जस्टिस पार्टी को DK यानी द्रविड़ कड़गम के नाम से सामाजिक संगठन बना दिया. कि द्रविड़ लोग उत्तर भारत वाले आर्य लोगों से अलग हैं, और एक लेवल पर ये ऐंटी ब्राह्मण होते-होते ऐंटी-हिंदू और ऐंटी-हिंदी संगठन माना जाने लगा. ब्राह्मणों का दबदबा भी ऐसा हुआ करता था कि हर प्रभावी ओहदे पर ब्राह्मण ही होते थे. लेकिन फिर भी कांग्रेस का ही समर्थन ज़्यादा था मद्रास में और ये DK नाम का संगठन कोई बहुत ब़ड़ा जनाधार नहीं बना सका था. लेकिन उसकी विचारधारा के साथ बहुत लोग थे कि जात-पात मिटाओ, महिलाओं को अधिकार दो, तमिल भाषा और संस्कृति बचाओ, हिन्दी को थोपे जाने मत दो. सामाजिक संगठन के रूप में उसके समर्थक बढ़ते गए.

अन्नादुरई कौन थे, उनके नाम पर ही AIADMK पार्टी 

पेरियार के एक शिष्य थे फ़िल्मों के लेखक अन्नादुरई. अन्ना कहते थे उनको. यहां से फ़िल्मों की एंट्री हुई तमिल राजनीति में. अन्ना के नाम पर ही AIADMK पार्टी है. ऑल इंडिया अन्ना डीएमके में अन्ना वही हैं. तो आज़ादी के बाद अन्ना ने 1949 में DK जो संगठन था उससे अलग होकर एक राजनीतिक पार्टी बना दी DMK, अलग वो इसलिए हुए पेरियार से क्योंकि पेरियार ने 70 साल की उम्र में एक युवती से शादी कर ली थी तो DK में बग़ावत हो गई थी. अन्ना ने बना दी DMK, उसी विचारधारा पर. अन्ना के नाटकों में, फ़िल्मों में भी यही सब कहानियां होती थीं कि कैसे समाज में अगड़ी जातियों का अत्याचार है और धर्म में कैसी-कैसी कुरीतियां हैं. और बिल्कुल उग्र विरोध और विद्रोह की कहानियां होती थीं. नाटकों और फ़िल्मों को राजनीतिक हथियार बना लिया एक तरह से. और हर बात को वो तमिल गौरव से जोड़ कर पेश करते थे.

फिल्म और द्रविड़ पॉलिटिक्स

उनके शिष्य थे करुणानिधी, वो भी फ़िल्मों के लेखक थे. वो इसी विचारधारा की कहानियां लिखते थे. और इन फ़िल्मों के हीरो होते थे MGR, तो ये फ़िल्में एक तरह से द्रविड़ विचारधारा के साथ जनता को जोड़ती गईं. लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे कामराज. वो ख़ुद पिछड़ी जाति के थे. तो भले ही DMK की विचारधारा को फ़िल्मों में समर्थन मिल रहा था लेकिन उसकी द्रविड़ पॉलिटिक्स ज़्यादा नहीं चल पा रही थी क्योंकि कामराज ख़ुद ना तो ब्राह्मण थे, और ना ही अग्रेज़ों के टाइम जैसे ब्राह्मणों को ही सारे पद मिलते थे वैसा उनका प्रशासन था. वो तो पिछड़े वर्गों को ख़ुद ही आगे लाने वाली नीतियां बना रहे थे मद्रास में. और प्रधान मंत्री थे नेहरू. तो ऐसा भी नहीं हो रहा था कि केंद्र की तरफ़ से कोई हिंदी को थोपे जाने के आरोप टिक रहे थे. लेकिन 1964 में नहरू की मृत्यु हो गई और लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बन गए. और शास्त्रीजी पर कांग्रेस के नेताओं ने दबाव डालना शुरू किया कि अब बहुत साल हो गए आज़ाद हुए, हिंदी को पूरे देश की आधिकारिक भाषा बना देना चाहिए.

कैसे हिंदी ने DMK की द्रविड़ पॉलिटिक्स में जान फूंक दी

इस चर्चा ने ही DMK की द्रविड़ पॉलिटिक्स में जान फूंक दी. प्रधानमंत्री शास्त्री को ख़ुद आ कर बयान देना पड़ा कि हिंदी थोपी नहीं जाएगी. लेकिन DMK इसको बड़ा मुद्दा बना चुकी थी और फिर तो उसके आंदोलन को ऐसा बल मिलता गया कि 1967 में उसने तमिलनाडु की सत्ता ही हासिल कर ली. फिर अन्ना के बाद DMK के बड़े नेता बने करुणानिधी और फिर MGR करुणानिधी से अलग हुए और अन्ना के नाम से नई पार्टी बनाई AIADMK, और वो सत्ता में आई. और फिर एक बार DMK, एक बार AIADMK, यही चलता रहा. फिर MGR के बाद जयललिता AIADMK के लीडर हो गईं. और करुणानिधी के बाद स्टालिन. तो ये थी द्रविड़ पॉलिटिक्स.

द्रविड़ पॉलिटिक्स में विजय की एंट्री

इसमें हुई है विजय की एंट्री. वो भी पेरियार का ही नाम ले रहे हैं. यानी वो भी कह रहे हैं कि विचारधारा उनकी भी यही है. लेकिन DMK और AIADMK में जो भ्रष्टाचार और परिवारवाद आ गया था वो उससे हटकर मूल द्रविड़ राजनीती की बात कर रहे हैं. लेकिन वो पेरियार के मंदिरों के ख़िलाफ़ होने की बात नहीं कर रहे. वो मंदिरों में भी गए चुनाव प्रचार में. और ना ही वो उदयनिधी स्टालिन की तरह सनातन के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं. वो द्रविड़ पॉलिटिक्स को एक तरह आज के युवा के साथ जोड़ कर पेश कर रहे हैं. उन्होंने भी अपनी फ़िल्मों के ज़रिये आज के मुद्दे उठाए.

ये है विजय की द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0

वो NEET परीक्षा में तमिल भाषा में पढ़े हुए बच्चों के मुद्दे तक को उठा चुके हैं. और पेरियार और आंबेडकर का भी नाम लेते हैं तो कांग्रेस के कामराज का भी. और रानी वेलु नाचियार का भी नाम लेते हैं. वो झांसी की रानी की अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने वाली तमिल रानी थीं. यानी तमिल गौरव की बात वो भी कर रहे हैं. और मुख्य सिद्धांत जिसको वो अपनी विचारधारा से जोड़ रहे हैं वो ये कि जन्म से नहीं तय होना चाहिए कि कोई समाज में ऊंचा है या नीचा है.  ये है विजय की द्रविड़ पॉलिटिक्स 2.0, आप सहमत हों ना हों, लेकिन समझने की ज़रूरत है ही, और ये उत्तर और दक्षिण में जो इतिहास में राजनीति में टकराव होता रहा है उसको भी जानने की ज़रूरत है. सौ बात की एक बात.

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