नक्सलवाद से मुक्ति के बाद श्रमिकों की अशांति को रोकना जरूरी

भाजपा नेताओं ने चुनाव प्रचार में दावा किया कि पिछले 7 दशकों में जी.डी.पी. के लिहाज से पश्चिम बंगाल का रैंक तीसरे से 24वें नम्बर पर आ गया है। नक्सलबाड़ी इलाके में 60 साल पहले चीन के समर्थन से गरीब, बेरोजगार और भूमिहीन किसानों को ङ्क्षहसक नक्सलवाद से जोडऩे के बाद पश्चिम बंगाल में अर्थव्यवस्था की बदहाली शुरू हो गई थी। गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च को ‘नक्सल मुक्त भारत अभियान’ की सफलता से नक्सलवाद के आतंक से राहत दिलाने की घोषणा की। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा है कि पाकिस्तान से भारत के युवाओं को ड्रग्स के नशे से जोडऩे का कारोबार हो रहा है।
नोएडा और दूसरे शहरों में श्रमिकों के हिंसक आंदोलन के तार भी पाकिस्तान से जुड़ रहे हैं। संसद से पारित श्रम कानूनों के अनुसार न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा का लाभ देकर आंदोलन को खत्म किया जा सकता है । उसकी बजाय मजदूर नेताओं और शिक्षित युवाओं की मनमानी गिरफ्तारी का दौर बढऩे से विदेशी शक्तियों के सहयोग से नक्सलवादी ताकतें नए स्वरूप में पूरे देश में विस्तार कर सकती हैं। ए.आई. और ऑटोमेशन के दौर में संसद से पारित श्रम कानूनों को लागू करने में केन्द्र और राज्य सरकारों की विफलता से जुड़े 5 पहलुओं को समझना जरूरी है।
पहला, साल 2019 में संसद से 4 श्रम कानूनों के पारित होने के बाद सरकार ने दावा किया था कि इन सुधारों से कामगारों को नियुक्ति पत्र, न्यूनतम मजदूरी, ग्रैच्युटी, मैडिकल जांच, साप्ताहिक छुट्टी, ओवरटाइम के लिए दोगुनी मजदूरी के साथ महिलाओं को बराबर वेतन मिलेगा। लेकिन हकीकत में इन्हें लागू करने के 7 साल बाद भी राज्यों में नियम नहीं बने। आंदोलन के बाद योगी सरकार ने श्रमिकों के कल्याण के लिए शिकायत तंत्र की मजबूती, दुर्घटना के लिए बीमा लाभ के साथ सुलभ आवासीय योजना जैसे वायदे किए हैं। लेकिन सरकारी प्रचार-तंत्र से किए गए वायदों को जमीनी स्तर पर लागू नहीं करने से असंतोष के साथ हिंसा बढ़ रही है। दूसरा, उत्तर प्रदेश में पिछले 12 सालों में विधायकों के भत्ते 4 गुना बढ़कर लगभग 2.96 लाख रुपए मासिक हो गए। 8वें वेतन आयोग के अनुसार न्यूनतम 69,000 रुपए बेसिक वेतन के साथ सरकारी कर्मचारियों को महंगाई और दूसरे भत्ते मिलेंगे। लेकिन महंगाई की मार से ग्रस्त मजदूरों की वेतन वृद्धि के लिए राज्यों में नियमित वेज बोर्ड का गठन नहीं हो रहा। मजदूरों के उग्र आंदोलन के बाद न्यूनतम दैनिक मजदूरी को 350 से 450 रुपए करने की बात केन्द्र सरकार कर रही है। सरकारी वेतन, पैंशन, सबसिडी, रेवड़ी की वजह से खाली खजाने वाले बदहाल राज्यों में नए श्रम कानूनों को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार को आॢथक पैकेज देने के लिए तत्काल पहल करनी चाहिए।
तीसरा, वित्तमंत्री ने कहा था कि ई-श्रम पोर्टल को मनरेगा, स्किल इण्डिया, श्रमयोगी मानधन आदि से जोड़कर वन स्टाप सैंटर बनाया जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 90 फीसदी मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं, जिन्हें इन श्रम कानूनों का लाभ नहीं मिलेगा। मनरेगा का नाम ‘वीबी-जी रामजी’ हो गया लेकिन लोगों को 125 दिन के काम की गारंटी और न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही। आंगनवाड़ी और ठेके पर रखे गए सरकारी कर्मियों को भी श्रम कानूनों का लाभ नहीं मिल रहा। एमेजॉन, स्विगी, फ्लिपकार्ट, जोमैटो, ओला और उबर जैसी धनी और ताकतवर कम्पनियां गिग वर्कर्स को वेतन और सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं दे रहीं।
चौथा, हरियाणा में एकतरफा तौर पर 35 फीसदी और यू.पी. में 21 फीसदी न्यूनतम मजदूरी बढ़ा दी गई है। ईरान युद्ध, अमरीका के दंडात्मक टैरिफ और चीन के साथ व्यापारिक संघर्ष की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था और एक्सपोर्ट पर संकट के बादल हैं। उद्योग जगत से विचार किए बगैर एकतरफा तौर पर श्रम कानूनों और न्यूनतम मजदूरी को लागू करने से औद्योगिक बंदी की विकरालता बढ़ सकती है। इससे बेरोजगारी और असमानता बढऩे के साथ जी.डी.पी. में भारी गिरावट हो सकती है।
पांचवां, नोएडा के पास जेवर में नए अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन किया। पुलिस के अनुसार उपद्रवी लोग जेन-जी को ङ्क्षहसा के लिए भड़का कर नोएडा को बंधक बनाने की योजना बना रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, श्रमिकों के वेतन के इंडैक्स में भारत 156वें नम्बर पर है। पिछले 2 सप्ताह में फैक्ट्रियों में 4 हादसों में 60 से ज्यादा मजदूर मर गए। संसद से पारित कानूनों को लागू करने की मांग करने वाले श्रमिकों के आंदोलन को पुलिसिया दमन के माध्यम से खत्म करने के प्रयास से नक्सलवादी शक्तियां नए तरीके से देश में पनप सकती हैं। नक्सलमुक्त होने के बाद केन्द्र सरकार अब लोगों के दिल और दिमाग को जीतने के लिए राज्यों के सहयोग से ‘चिंतामुक्त विकास अभियान’ चला रही है। 1965 में पाकिस्तान युद्ध के समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। जवान और किसान के साथ अब श्रम शक्ति के कल्याण के लिए ‘न्यू इण्डिया’ में संसद से पारित कानूनों पर अमल की जरूरत है।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)



