संपादकीय

आरक्षण का ही देश नहीं

यह देश किसी एक जाति, संप्रदाय, नस्ल, वर्ग, भाषा और जमात का नहीं है। यह देश हिंदू-मुसलमान या जैन-बौद्ध अथवा सिख-जट या पारसी-ईसाई आदि का भी नहीं है। यह देश दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों का भी है तथा अल्पसंख्यक सवर्ण गरीबों का भी है। यह देश समस्त भारतीयों का है, लिहाजा सभी के दुख-सुख और हित में सोचना और नीतियां बनाना अनिवार्य है। दुर्भाग्य और विडंबना है कि इस बार के आम चुनाव में इस विविधता और व्यापकता पर कोई बहस नहीं की गई। सिर्फ मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा सबसे अधिक गूंजता रहा है। विपक्ष के खेमे का लगभग समवेत स्वर रहा है कि मुसलमानों को आरक्षण जरूर देंगे। लालू यादव तो 100 फीसदी आरक्षण मुसलमानों को ही देने के पैरोकार हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सार्वजनिक ऐलान किया है कि मुस्लिम आरक्षण जारी रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी लगातार पलटवार करते रहे हैं कि वह मुस्लिम आरक्षण लागू नहीं होने देंगे। जब तक वह जिंदा हैं, तब तक दलितों, आदिवासियों और ओबीसी का आरक्षण छिनने नहीं देंगे। आरक्षण किसी का संवैधानिक मौलिक अधिकार नहीं है। हमारे संवैधानिक पुरखों ने एक व्यवस्था 10 साल के लिए तय की थी, ताकि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक विषमताएं समाप्त की जा सकें, लेकिन आजादी के 77 साल बाद भी वह ‘संवैधानिक कृपा’ बरकरार है, विषमताएं भी मौजूद हैं, क्योंकि आरक्षण आज भी लागू है। बल्कि आरक्षण आज राजनीतिक हथियार बन चुका है। संविधान पीठ भी फैसला दे चुकी है कि धर्म पर आधारित आरक्षण ‘संवैधानिक’ नहीं है।

कुछ राज्य सरकारों ने मुसलमानों को धार्मिक कोटा देने की जुर्रत की थी, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने उन्हें खारिज कर दिया। सिर्फ बिहार और बंगाल ही नहीं, मध्यप्रदेश, गुजरात, उप्र, केरल, आंध्रप्रदेश, ओडिशा आदि राज्यों में भी कई-कई जातियों की आड़ में मुसलमानों को आरक्षण देने की व्यवस्था है। अदालत की आंख में धूल झोंकी गई है। कई राज्यों में तो भाजपा की सरकारें है। कुछ भी संवैधानिक नहीं है, फिर भी आरक्षण का चुग्गा फेंक कर मुस्लिम तुष्टिकरण और बंधक वोट बैंक की राजनीति खेली जा रही है। मुसलमानों की आड़ में बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या सरीखी देश-विरोधी गतिविधियां भी जारी हैं। यह कड़ा आदेश मुख्यमंत्रियों को भी दिया जाना चाहिए कि ऐसे रंगे सियार वोट बैंक असंवैधानिक हैं, लिहाजा देश में एनआरसी भी अनिवार्य की जानी चाहिए। अब तो कुछ दिनों के बाद नई सरकार भारत में बनेगी, लिहाजा वोट बैंक की चिंताएं कम होंगी, लिहाजा भारत सरकार ऐसा अभियान चलाए, ताकि अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर किया जा सके। हम पूरा दोष घुसपैठियों को या वोट बैंक के तुष्टिकरण को ही नहीं दे सकते, क्योंकि देश में ही कांग्रेस पूरी तरह ‘मुस्लिमवादी’ रही है। मुस्लिमवादियों के अपने कुतर्क हैं। कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार ने ही 2004 में जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग गठित किया था। उसने 2007 में मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण देने की सिफारिश की थी। जस्टिस रंगनाथ मिश्र देश के प्रधान न्यायाधीश रह चुके थे। मुसलमानों के लिए ही सच्चर कमेटी का गठन किया गया। यूपीए सरकार के तहत अलग से ‘अल्पसंख्यक मंत्रालय’ भी बनाया गया, जिसका फोकस मुसलमानों पर ही रहा है।

उस दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का विवादास्पद बयान भी सामने आया कि देश के संसाधनों पर पहला दावा और अधिकार खासकर अल्पसंख्यक मुसलमानों का है। 2024 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी का 2012 का एक वीडियो बेनकाब किया है, जिसमें राहुल मुस्लिम आरक्षण का दावा ठोंकते देखे और सुने जा सकते हैं। सवाल है कि इन सरकारों को महज मुसलमानों की ही चिंता क्यों सताती रही है? उनके सरोकार और कार्यक्रम भी मुस्लिम सम्मत क्यों रहे हैं? क्या भारत सिर्फ उन्हीं का देश है? वे करीब 15 फीसदी आबादी हैं। शेष 85 फीसदी आबादी क्या हाथ मलती रहे? यह संवैधानिक न्याय नहीं है। मदद उनकी की जानी चाहिए, जो विपन्न, वंचित और निरक्षर हैं, चाहे उनकी जाति और समुदाय कुछ भी हो। हमारा ही नहीं, यह अधिकांश देश का विनम्र आग्रह है कि बंधक वोट बैंक और तुष्टिकरण के खिलाफ कोई संवैधानिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए और मौलिक अधिकार भी खंडित नहीं होने चाहिए।

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