परमाणु रिसाव हुआ तो…

ईरान युद्ध में परमाणु रिसाव के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का मानना है कि अमरीका और इजरायल जिस तरह बमबारी कर रहे हैं, मिसाइल-ड्रोन से हमले किए जा रहे हैं, उनसे परमाणु केंद्रों पर चिंताजनक स्थितियां बनती जा रही हैं। हालांकि अभी आईएईए ने किसी भी तरह के परमाणु विकिरण की पुष्टि नहीं की है और न ही ऐसे संकेत हैं, लेकिन परमाणु रिसाव की संभावनाओं से इंकार भी नहीं किया है। आईएईए ने आपात बैठक भी की है, क्योंकि ईरान के राजनयिक रेजा नजाफी ने दावा किया था कि अमरीकी-इजरायली लड़ाकू विमानों ने ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया है, जबकि उन केंद्रों में शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा पर काम किया जा रहा है। अब बमबारी के बाद परमाणु रिसाव का खतरा पैदा हो गया है। आईएईए ने ईरान सरकार के संबद्ध अधिकारियों से बात की और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि परमाणु विकिरण फैल सकता है। यदि परमाणु रिएक्टर ‘मेल्टडाउन’ हुआ, तो 10 करीबी देशों में भी परमाणु खतरा पैदा हो जाएगा। फारस की खाड़ी में भी विकिरण पहुंचेगा और बड़े स्तर पर पानी जहरीला और जानलेवा हो सकता है। जलीय जीव तो मरेंगे ही, उनके अलावा मनुष्य में कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों का ज्यादा विस्तार होगा। यदि ईरान के परमाणु केंद्रों से रिसाव शुरू हुआ, तो सभी खाड़ी देश उसके दायरे में होंगे। कई अरब देशों के परमाणु रिएक्टर खतरनाक स्थितियों में हैं। ईरान ही नहीं, इराक, सीरिया, बहरीन, कुवैत आदि देशों में भी परमाणु साइट्स हैं। क्या वे परमाणु कार्यक्रम उन देशों के अपने और घोषित, वैध कार्यक्रम हैं अथवा अमरीका के परमाणु उपनिवेश हैं? यह दायित्व आईएईए का है। अमरीका ने इन देशों के परमाणु केंद्रों पर आपत्ति दर्ज नहीं की और न ही किसी हमले की धमकियां दीं! क्या ये ‘संहारी संयंत्र’ नहीं हैं? अलबत्ता आईएईए के महानिदेशक राफेल ग्रोसी ने कहा है कि हमारे पास ऐसे किसी हमले की जानकारी नहीं है। फिर आपात बैठक में क्या विमर्श किया गया? फिर अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने चिंताजनक स्थितियां किस आधार पर आंकी थीं?
अमरीका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने फिर दोहराया है कि ईरान परमाणु बम बनाने में जुटा है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों का बयान भी सामने आया है कि हम परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाएंगे। फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी के नेताओं के बयान आए थे कि वे यूक्रेन को परमाणु हथियार मुहैया कराने पर विचार कर रहे हैं। ये बड़े देश विनाश की ओर अग्रसर क्यों हो रहे हैं? इस संदर्भ में गौरतलब है कि ओमान की मध्यस्थता से जिनेवा में अमरीका और ईरान के बीच बातचीत के जो दौर हुए थे, उनमें ईरान यूरेनियम संवद्र्धन को 3-5 फीसदी तक कम करने को तैयार हो गया था। उस स्थिति में ईरान परमाणु बम नहीं बना सकता। आईएईए का एक अनुमान है कि यदि ईरान के इस्फहान, नतांज, बुशहर परमाणु संयंत्रों से विकिरण की नौबत आ गई, तो कमोबेश 20 देशों के करीब 51 करोड़ लोग उस खतरे के दायरे में होंगे। बहरहाल जिनेवा वार्ता एक ढकोसला थी और अमरीका-इजरायल ईरान पर हमला करने की योजना बहुत पहले बना चुके थे और उनकी खुफिया एजेंसियां उस पर काम कर रही थीं। अमरीका-इजरायल और ईरान, सभी खाड़ी देशों समेत, जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर अमरीकी एटम बम बरसाने और उनके बाद की त्रासद् स्थितियों को भूले नहीं होंगे। हिरोशिमा के बम-हमले में अनुमानत: 1,40,000 लोग और नागासाकी में करीब 74,000 लोग मार दिए गए। करीब 38,000 मासूम बच्चे भी बेमौत मारे गए। इससे वीभत्स, बर्बर, त्रासद् सामूहिक नरसंहार कोई दूसरा नहीं है। आज दुनिया में अमरीका के अलावा, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी से लेकर भारत और पाकिस्तान तक परमाणु हथियारों वाले देश हैं। अमरीकी राष्ट्रपति किस-किस देश के परमाणु कार्यक्रम को रोक पाए? यह ठेकेदारी अमरीका की नहीं है। यह भी देशों की संप्रभुता से जुड़ा विषय है। परमाणु अप्रसार की जिम्मेदारी देशों की अपनी है। पाकिस्तान जैसे आतंकी देश पर परमाणु शक्ति होने का विश्वास किया जाता रहा है, ईरान कौनसे विध्वंस पैदा कर सकता है। इस लड़ाई को एकदम रोकना पूरे विश्व के हित में होगा।



