राष्ट्रीयलेख

या तो मुझे नंबर वन PM पद ही मिले, वर्ना…नेहरू के इस हठ के चलते पटेल ने देशसेवा की खातिर खुद को कर दिया ‘कुर्बान’

नई दिल्ली: गांधीजी ने एक बार खुद दबे मन से कहा था कि उन्हें जवाहरलाल नेहरू बेहद पसंद थे, मगर प्रशासक के रूप में सरदार वल्लभभाई पटेल सबसे बेहतर थे। आज जिस भारत में हम सांस ले रहे हैं, उसका भूगोल-इतिहास सब पटेल की ही देन है। भारत की एकजुटता बनाए रखने और रियासतों का विलय कुशलता से कराने वाले सरदार पटेल देश के पहले डिप्टी प्राइम मिनिस्टर और होम मिनिस्टर थे। ऐसे में अक्सर ये चर्चा होती है कि सरदार पटेल को क्यों भारत का पहला प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूरा देश 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की 150वीं जयंती मना रहा है। जानते हैं यह कहानी।

गांधीजी की हत्या के बाद पटेल ने की थी इस्तीफे की पेशकश

गांधीजी के परपोते राजमोहन गांधी ने 1990 में आई अपनी किताब Patel: A Life में लिखा है कि जब गांधीजी की हत्या हुई तो उस वक्त पटेल गृहमंत्री थे। ऐसे में उनके विरोधी यह बात फैलाने लग गए कि पटेल गांधीजी की रक्षा नहीं कर पाए और वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। पटेल को यह बात जब पता लगी तो उन्होंने इस्तीफा देने की पेशकश कर डाली। तब नेहरू ने कहा कि आपका और हमारा साथ आजादी से पहले से 30 साल का है। मैं आप पर भरोसा करता हूं। इस बीच, पीएम नरेंद्र मोदी ने केवड़िया में सरदार पटेल के परिवार से मुलाकात कर खुशी जाहिर की।

मुस्लिमों को शांत करने के लिए मौलाना आजाद बने कांग्रेस अध्यक्ष

Revisiting india पर छपे एक लेख के अनुसार, बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि कैसे सरदार पटेल को भारत के पहले प्रधानमंत्री के पद से वंचित कर दिया गया, जबकि वे उस पद के लिए चुने गए थे। इसकी शुरुआत 1939 में तब हो गई थी, जब मुस्लिम लीग धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में लग गई थी। इस स्थिति को शांत करने के लिए, महात्मा गांधी ने बहुत ही समझदारी से मौलाना अबुल कलाम आजाद को कांग्रेस अध्यक्ष चुना, जो पाकिस्तान निर्माण के लाहौर प्रस्ताव से कुछ महीने पहले ही हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध, भारत छोड़ो आंदोलन और अधिकांश कांग्रेस नेताओं के जेल में होने जैसे विभिन्न कारणों से, कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए वार्षिक चुनाव अप्रैल 1946 तक नहीं हो सके। मौलाना आज़ाद कांग्रेस अध्यक्ष बने रहे और सरकार के साथ विभिन्न वार्ताओं और ब्रिटिश दूतावासों के दौरे में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते रहे।

कांग्रेस अध्यक्ष को ही बनना था भारत का पहला पीएम

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होते-होते यह स्पष्ट होता जा रहा था कि भारत की स्वतंत्रता अब ज़्यादा दूर नहीं है। यह भी स्पष्ट था कि 1946 के चुनावों में कांग्रेस को मिली सीटों की संख्या को देखते हुए, कांग्रेस अध्यक्ष को ही केंद्र में अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष का पद अचानक ही बेहद दिलचस्प हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की घोषणा होते ही मौलाना आजाद ने पुनः चुनाव की इच्छा जताई। अपनी आत्मकथा ‘इंडिया विंस फ्रीडम में,मौलाना लिखते हैं-आम तौर पर यह सवाल उठता था कि कांग्रेस के नए चुनाव होने चाहिए और एक नया अध्यक्ष चुना जाना चाहिए। जैसे ही प्रेस में यह बात उठी एक आम मांग उठी कि मुझे एक और कार्यकाल के लिए अध्यक्ष चुना जाना चाहिए… कांग्रेस में यह आम धारणा थी कि चूंकि अब तक मैंने ही बातचीत का संचालन किया है, इसलिए मुझे ही उन्हें सफलतापूर्वक संपन्न कराने और उन्हें लागू करने का दायित्व सौंपा जाना चाहिए।

मौलाना के एक ऐलान से नेहरू हो गए दुखी

मौलाना के इस कदम से उनके घनिष्ठ मित्र और सहयोगी जवाहरलाल नेहरू को बहुत दुःख हुआ, जिनकी अपनी अपेक्षाएं थीं। हालांकि, गांधीजी ने 20 अप्रैल 1946 को नेहरू के पक्ष में अपनी पसंद जता दी। उन्होंने मौलाना आजाद को लिखा-जब कार्यसमिति के एक-दो सदस्यों ने मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि एक ही अध्यक्ष का बने रहना ठीक नहीं होगा…। आज की परिस्थितियों में अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं जवाहरलाल को प्राथमिकता दूंगा। मेरे पास इसके कई कारण हैं।

पटेल जब चुन लिए गए कांग्रेस के निर्विरोध अध्यक्ष

हालाकि, जवाहरलाल नेहरू के प्रति गांधीजी के खुले समर्थन के बावजूद कांग्रेस सरदार पटेल को अपना अध्यक्ष और इसलिए भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी, क्योंकि उन्हें एक महान कार्यकारी, संगठनकर्ता और जमीनी स्तर पर मजबूत नेता माना जाता था। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 29 अप्रैल, 1946 थी। उन दिनों कांग्रेस के संविधान के अनुसार, प्रदेश कांग्रेस समितियां (पीसीसी) ही एकमात्र निर्वाचक मंडल थीं और केवल वे ही चुनाव प्रक्रिया में भाग ले सकती थीं। 15 में से 12 प्रदेश कांग्रेस समितियों ने सरदार पटेल को नामांकित किया। शेष तीन ने मतदान में भाग नहीं लिया। नामांकन दाखिल करने के अंतिम दिन यानी 29 अप्रैल 1946 को भी किसी भी प्रदेश कांग्रेस समिति ने जवाहरलाल नेहरू या किसी अन्य का नाम प्रस्तावित नहीं किया। ऐसे में सरदार पटेल निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए।

जब नेहरू ने कहा कि वह नंबर दो नहीं बनेंगे

पटेल विरोधी तंत्र तेजी से काम करने लगा। 29 अप्रैल 1946 को नई दिल्ली में कार्यसमिति की बैठक के दौरान गांधीजी की इच्छा का सम्मान करते हुए जेबी कृपलानी ने नेहरू की उम्मीदवारी के लिए प्रस्तावकों और समर्थकों को ढूंढ़ने का बीड़ा उठाया। कृपलानी कार्यसमिति के कुछ सदस्यों और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के स्थानीय सदस्यों से नेहरू के नाम का प्रस्ताव करवाने में सफल रहे। सरदार पटेल को नेहरू के पक्ष में अपना नामांकन वापस लेने के लिए मनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। पटेल ने गांधीजी से सलाह मांगी, जिन्होंने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा और वल्लभभाई ने तुरंत ऐसा कर दिया। जब गांधीजी को बताया गया कि जवाहरलाल दूसरा स्थान नहीं लेंगे तो उन्होंने पटेल से अपना नाम वापस लेने को कहा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दुख जताया कि गांधीजी ने एक बार फिर ‘ग्लैमरस नेहरू’ की खातिर अपने भरोसेमंद सहयोगी की बलि दे दी है और उन्हें यह भी डर था कि नेहरू ब्रिटिश तरीकों पर चलेंगे।

पटेल ने इस वजह से नंबर 2 बनना मंजूर किया

पटेल ने दो कारणों से सरकार में नंबर दो बनना स्वीकार किया। पहला, क्योंकि पटेल के लिए पद या पद महत्वहीन था। मातृभूमि की सेवा ज़्यादा महत्वपूर्ण थी और दूसरा, नेहरू चाहते थे कि या तो वे सरकार में पहला स्थान लें या बाहर रहें। वल्लभभाई का यह भी मानना था कि जहां पद नेहरू को नरम बना सकता था, वहीं अस्वीकृति उन्हें विरोध में धकेल देगी। पटेल ऐसे परिणाम की आशंका से कतराते थे, जिससे भारत का भयंकर विभाजन हो जाता। 26 अप्रैल 1946 को नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष चुनने के लिए मौलाना ने एक बयान जारी किया था। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा था, जो मरणोपरांत 1959 में प्रकाशित हुई। इसमें लिखा था-यह शायद मेरे राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल थी। मुझे अपने किसी भी कार्य पर उतना पछतावा नहीं है जितना इस मोड़ पर कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटने के निर्णय पर। मेरी दूसरी गलती यह थी कि जब मैंने खुद चुनाव न लड़ने का फैसला किया, तो मैंने सरदार पटेल का समर्थन नहीं किया। हमारे बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि अगर वे मेरे बाद कांग्रेस अध्यक्ष बनते, तो वे कैबिनेट मिशन योजना को सफलतापूर्वक लागू होते। वे जवाहरलाल वाली गलती कभी नहीं करते, जिससे जिन्ना को योजना को विफल करने का मौका मिल गया।

राजगोपालाचारी ने लिखा-नेहरू विदेश मंत्री और पटेल पीएम होते तो…

वहीं, सी राजगोपालाचारी ने भी एक जगह लिखा है-गांधीजी हमारे मामलों के मूक संचालक थे, तो उन्होंने यह निर्णय लिया कि जवाहरलाल, जो कांग्रेस नेताओं में विदेशी मामलों से सबसे ज़्यादा परिचित थे, को भारत का प्रधानमंत्री होना चाहिए। हालांकि वे जानते थे कि वल्लभभाई उन सभी में सबसे अच्छे प्रशासक होंगे। उन्होंने आगे कहा-निःसंदेह यह बेहतर होता यदि नेहरू को विदेश मंत्री और पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। पटेल के बारे में एक मिथक फैल गया था कि वे मुसलमानों के प्रति कठोर होंगे। यह एक ग़लत धारणा थी, लेकिन यह एक प्रचलित पूर्वाग्रह था।

तो नेहरू नहीं, पटेल को मिलती आजाद भारत की कमान

नेहरू के जीवनीकारों में से एक माइकल ब्रेचर (नेहरू: एक राजनीतिक जीवनी) कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष पद को बारी-बारी से बदलने की पारंपरिक परंपरा के अनुसार, पटेल इस पद के लिए योग्य थे। कराची अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्हें पंद्रह साल बीत चुके थे, जबकि नेहरू ने 1936 और 1937 में लखनऊ और फिरोजपुर में अध्यक्षता की थी। इसके अलावा, पटेल प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों की सर्वमान्य पसंद थे… नेहरू का ‘चुनाव’ गांधी के हस्तक्षेप के कारण हुआ था। पटेल को पद छोड़ने के लिए राजी किया गया था। ब्रेचर ने कहा-चुनाव के एक महीने बाद वायसराय ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। अगर गांधीजी ने हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो पटेल 1946-47 में भारत के पहले वास्तविक प्रधानमंत्री होते।

Show More

Daily Live Chhattisgarh

Daily Live CG यह एक हिंदी वेब न्यूज़ पोर्टल है जिसमें ब्रेकिंग न्यूज़ के अलावा राजनीति, प्रशासन, ट्रेंडिंग न्यूज, बॉलीवुड, बिजनेस, रोजगार तथा टेक्नोलॉजी से संबंधित खबरें पोस्ट की जाती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button