संपादकीय

संवैधानिक आरक्षण लांघते हुए

‘इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ’ (1992) सर्वोच्च अदालत का ऐसा ऐतिहासिक फैसला था, जिसे 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सुनाया था। फैसला बहुमत से लिया गया था, लेकिन उसका प्रभाव सामूहिक था। उसे ‘मंडल आयोग मामला’ भी कहा जाता है। फैसले में सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण की वैधता को बरकरार रखा गया था, लेकिन कुछ और महत्वपूर्ण फैसले भी सुनाए गए। मसलन-आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी होगी। ‘क्रीमी लेयर’ (अमीर ओबीसी सदस्यों) को आरक्षण से बाहर करना और पदोन्नति में आरक्षण को हटाना। ‘पदोन्नति में आरक्षण’ को असंवैधानिक करार दिया गया, जिसका अर्थ है कि आरक्षण केवल शुरुआती नियुक्ति के चरणों में ही लागू हो सकता है। दरअसल बहुमत के उस फैसले ने भारत में आरक्षण नीति को आकार दिया, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ उस ऐतिहासिक फैसले को लांघने का प्रयास करते रहे हैं। आरक्षण की परिभाषा खंडित करके उसे अपने अनुसार बनाया जा रहा है। ताजातरीन मामला बिहार में ‘तेजस्वी का प्रण’ का है। यह विपक्षी गठबंधन का चुनावी घोषणा-पत्र है। उसमें 25 ‘प्रण’ किए गए हैं, जिनके आधार पर जनादेश मांगा जा रहा है। उनमें एक ‘प्रण’ यह भी है कि आरक्षण की 50 फीसदी सीमा को बढ़ाने का कानून बनाएंगे और उसे 9वीं अनुसूची में दर्ज कराने की कोशिशें करेंगे। यह एक ऐसा चुनावी वायदा है, जो राज्य स्तर के चुनाव में नहीं किया जा सकता। बेशक विधानसभा में, बहुमत के आधार पर, आरक्षण की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। बिहार में ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद के साथ गठबंधन सरकार के दौरान ‘जातीय सर्वेक्षण’ कराया था। ‘जातीय जनगणना’ केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है। उस सर्वेक्षण के बाद आरक्षण की सीमा 65 फीसदी तक बढ़ाने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित किया गया था, लेकिन वह लागू नहीं हो सका, क्योंकि मामला अब भी सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है। पटना उच्च न्यायालय ने जून, 2024 में इसे ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए खारिज कर दिया था।

सर्वोच्च अदालत ने न तो उच्च अदालत के फैसले पर रोक लगाई और न ही पलटी मारने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केंद्र की मोदी सरकार से आरक्षण की इस सीमा को 9वीं अनुसूची में डलवा पाए। संविधान की 9वीं अनुसूची में कुल 284 अधिनियम हैं। पहली बार इस अनुसूची को संविधान के सर्वप्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा 13 कानूनों के साथ, संविधान में जोड़ा गया था। किसी भी कानून को 9वीं अनुसूची में रखने से उसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती, लिहाजा उसे अदालत में रद्द भी नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण लागू है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए भी 10 फीसदी आरक्षण है। कुल 79 फीसदी आरक्षण का कानून 9वीं अनुसूची में दर्ज किया गया है। झारखंड विधानसभा में 77 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव 11 नवंबर, 2022 को पारित किया गया था, लेकिन साथ में यह भी कहा गया था कि संवैधानिक रूप से स्वीकृति मिलने के बाद ही उसे लागू किया जाएगा। सर्वोच्च अदालत में फिलहाल विचाराधीन है। ऐसे ही प्रयास तेलंगाना, कर्नाटक, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में भी किए गए, बेशक वोट भी मिले, लेकिन सभी ‘सियासी बयानबाजी’ साबित हुए। बुनियादी अड़चन 9वीं अनुसूची है।

यह तभी संभव है, जब केंद्र में आपके दल या गठबंधन की सरकार हो, लिहाजा बिहार में सरकार बनने के बावजूद ‘तेजस्वी का यह प्रण’ खोखला ही साबित होगा। कुछ और प्रण भी किए गए हैं, जो केंद्र सरकार के ही विशेषाधिकार में आते हैं। उन्हें फिलहाल छोड़ते हैं। बहरहाल आज आरक्षण एक सशक्त राजनीतिक और चुनावी हथियार बन चुका है, लिहाजा इसकी समीक्षा की बहुत जरूरत है। यह जोखिम भाजपा-एनडीए को ही उठाना पड़ेगा। ‘संविधान सभा’ में हमारे पुरखों ने जिस सोच के साथ आरक्षण की व्यवस्था की थी, सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक विषमताओं के वे आधार आज ढह चुके हैं। देश उन विसंगतियों से काफी-कुछ उबर चुका है। अदालत ने ‘क्रीमी लेयर’ को आरक्षण से बाहर रखने के आदेश दिए हैं। ‘क्रीमी लेयर’ में 8.5 लाख रुपए सालाना आय वाले ‘पिछड़े’ भी शामिल हैं। सरकारी नौकरी में ऐसे चेहरों की भी भरमार है, जो 12 लाख रुपए सालाना के वेतन पा रहे हैं और आरक्षण की ‘मलाई’ भी चाट रहे हैं। क्या 2025 से 2047 वाले भारत में यह व्यवस्था होनी चाहिए?

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