सरकार ही जज, अदालत

बीते दिनों केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने कुछ संदिग्ध और सवालिया न्यूज वेब पोर्टल, निजी न्यूज चैनलों पर पाबंदी लगाई थी। आरोप पुराने ही थे कि वे ‘फेक न्यूज’, ‘भ्रामक सामग्री’ और ‘झूठी खबरें’ परोस रहे थे। सरकार इसे ‘आपराधिक कृत्य’ मानती है। बीते एक अंतराल से ऐसी पाबंदियां ही चस्पा नहीं की गईं, बल्कि कुछ पत्रकारों, संपादकों, प्रकाशकों को भी, कड़ी कानूनी धाराओं में, जेल भी भेजा गया है। बहरहाल वे मामले अदालतों के विचाराधीन हैं। बेशक फेक न्यूज लंबे समय से एक गंभीर समस्या बनी हुई है। ऐसी खबरों या सूचनाओं से हिंसा भडक़ी है, दंगे हुए हैं, देश के खिलाफ युद्ध सरीखे अभियान तक छेड़े गए हैं। फर्जी खबरें चुनावों को भी एक निश्चित सीमा तक प्रभावित करती रही हैं। काली भेड़ें तो हर समाज और व्यवस्था में होती हैं, लेकिन उनकी आड़ में पत्रकारिता और खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने की कोशिशें नहीं होनी चाहिए। दरअसल फेक न्यूज, भ्रामक खबरों, झूठी सूचनाओं के संदर्भ में भारत सरकार ही जज, ज्यूरी और कार्यान्वित करने वाली ईकाई की भूमिका निभाना चाहती है। गौरतलब है कि अप्रैल, 2023 में सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने 2021 आईटी नियमों में कुछ संशोधनों को अधिसूचित किया था, ताकि एक ‘फैक्ट चेकिंग यूनिट’ बनाई जा सके। वह यूनिट ऑनलाइन सामग्री, खबरों, अन्य सूचनाओं को प्रभावी रूप से सेंसर कर सके। यदि केंद्र सरकार की किसी नीति, काम, फैसले को ‘फर्जी’ या ‘भ्रामक’ करार दिया गया हो, तो उस पर कार्रवाई की जा सके।
जब ऐसी अधिसूचना जारी की गई थी, तब केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा था कि यदि लोगों के दिमाग में कोई संदेह होगा या मन में कोई शंका होगी कि सरकार के आधार पर शक्तियों का दुरुपयोग किया गया है, तो उसे जरूर संबोधित किया जाएगा। इसी सप्ताह केंद्र सरकार ने ‘फैक्ट चेकिंग यूनिट’ को, ‘प्रेस सूचना ब्यूरो’ के तहत एक वैधानिक संस्था के तौर पर अधिसूचित किया है। प्रेस सूचना ब्यूरो सरकारी विज्ञप्ति या कैबिनेट की कोई सूचना मीडिया तक पहुंचाने वाली संस्था है। हालांकि संशोधित नियमों की संवैधानिकता को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई है, फिर भी यह वैधानिक व्यवस्था करने से स्पष्ट है कि केंद्रीय मंत्री का आश्वासन बेमानी है। अदालत ने सरकारी प्रयास पर रोक लगा दी है, लेकिन बुनियादी समस्या यथावत है कि सूचना-प्रसारण मंत्रालय के पीआईबी के तहत एक संस्था को सेंसरशिप की ताकत दी गई है। दरअसल सरकार ही संविधान, जज, अदालत, फैसले को लागू करने वाली ईकाई और मौलिक अधिकारों की पैरोकार, सब कुछ बन जाना चाहती है। सरकार ही प्रत्येक स्थिति की व्याख्या करेगी कि क्या सही है, सच है और क्या फर्जी है? फर्जी, भ्रामक, झूठी खबर या सूचना क्या है, उन्हें लेकर नियमों में बिल्कुल भी स्पष्टता नहीं है। वे परिभाषित भी नहीं हैं। अखबार में तो संपादक ही अपने विवेक से खबरें तय करता है, लेकिन ऑनलाइन की दुनिया अभी निरंकुश है। वहां अधिकतर नौसीखिए, गैर-पेशेवर लोग ही सक्रिय हैं। कई अनुभवी पत्रकार सेवानिवृत्ति के बाद अपने चैनल चला रहे हैं। वहां सरकार वैचारिकता की आड़ में पत्रकारों को दबोचती रही है, लिहाजा पीआईबी में नई व्यवस्था को लेकर ‘एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने भी असंतोष और नाराजगी जताई है। इनमें अधिकतर पत्रकार ऐसे हैं, जिन्हें पीआईबी ने दशकों तक मान्यता दिए रखी। यह मान्यता कई संदर्भों में आज भी बरकरार है। बहरहाल एक बार किसी खबर को भ्रामक या फर्जी घोषित कर दिया गया, तो सोशल मीडिया, मीडिया प्लेटफॉर्म और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को भी उसे अपने मंच से हटाना पड़ेगा। बुनियादी सवाल यह है कि सत्यता और फर्जीपन को तय करने का दायित्व किस पर होना चाहिए? सरकार अकेली ही यह तय नहीं कर सकती। न्यायपालिका और मौजूदा आपराधिक, सिविल कानून भी हमारी व्यवस्था के निर्णायक अंग हैं, जो न्यायिक तौर पर फर्जी और झूठी खबरों से निपट सकते हैं।


