संपादकीय

पहले से हो तैयारी

हिमालय क्षेत्र इस समय भयानक तबाही के दौर से गुजर रहा है। उत्तराखंड से लेकर जम्मू-कश्मीर तक, नदियां उफान पर हैं, पहाड़ दरक रहे हैं और जिंदगियां दांव पर लगी हैं। ये आपदाएं और जानमाल का नुकसान गंभीर चेतावनी है।

जनजीवन पर असर: जम्मू में वैष्णो देवी धाम के पास हुए लैंडस्लाइड में मृतकों की संख्या 32 तक जा पहुंची है। यात्रा रोकनी पड़ी है और फंसे हुए यात्रियों को निकाल कर सुरक्षित घर पहुंचाने की कोशिश जारी है। जम्मू ने केवल 20 घंटों में ही 10 साल की सबसे ज्यादा बारिश देख ली। राज्य के कई हिस्सों में कमोबेश ऐसे ही हालात हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने X पर बताया कि भारी बारिश से आम जनजीवन प्रभावित हुआ है।

धराली से जम्मू तक: इस मॉनसून सीजन में यह सीन बार-बार दिख रहा है। इसी महीने की शुरुआत में उत्तराखंड के धराली में बादल फटने के बाद आए फ्लैश फ्लड ने पूरे कस्बे को तबाह कर दिया। फिर चमोली के थराली में आफत बरसी। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में एक बार पहले भी, इसी 14 तारीख को बादल फटने से भारी तबाही मची थी। मचैल माता यात्रा के रास्ते पर आई प्राकृतिक आपदा की वजह से जन-धन की हानि हुई थी।

भीड़ पर नियंत्रण: इन घटनाओं पर गौर करें तो आपदाओं में जान गंवाने वालों में बड़ी तादाद पर्यटकों की रही। धराली, उत्तराखंड के चार धाम में से एक, गंगोत्री के रूट पर पड़ता है। इसी तरह वैष्णो देवी के दर्शन के लिए सालभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। ये हादसे सबक हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में मौजूद भीड़भाड़ वाले पर्यटन और धार्मिक क्षेत्रों में ऐसे इंतजाम करने की जरूरत है, जिससे किसी अनहोनी की सूरत में लोगों को तुरंत निकाला जा सके।

वॉर्निंग सिस्टम: प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनसे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। इसके लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को बेहतर करने की जरूरत है। बाढ़ और भूस्खलन के खतरे वाले इलाकों में लगातार निगरानी से खतरों की पूर्व सूचना मिल सकती है। मॉनसून के सीजन में पहाड़ों की यात्रा वैसे भी मुश्किल भरी हो जाती है, तो इस मौसम में यात्रियों की संख्या सीमित करने पर विचार किया जा सकता है।

राहत पर फोकस: मौसम विभाग ने जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश का अलर्ट दिया है। दूसरे राज्यों के पर्यटक और श्रद्धालु अब भी विभिन्न जगहों पर फंसे हुए हैं। अभी इन सभी की सुरक्षित घर वापसी और राहत-बचाव पर फोकस होना चाहिए। साथ में, ऐसी नीतियों की जरूरत है, जिसमें पहाड़ों की संवेदनशीलता का ख्याल रखा गया हो।

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