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जापान में गूंजा मोदी मंत्र! भारत के मास्टरस्ट्रोक से चीन-अमेरिका पस्त, ‘Made in India’ बनेगा सुपरपावर

PM Modi Japan Visit 2025: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान दौरा (29–30 अगस्त 2025) सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है. यहां उनका ‘स्वदेशी’ संदेश जापान के ‘निहोंसेई’ मॉडल से जुड़ता है. जानें कैसे जापान की ‘Made in Japan’ ब्रांडिंग भारत के ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को नई दिशा दे सकती है.

भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार आत्मनिर्भरता और ‘स्वदेशी’ की बात कर रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन्होंने दुकानदारों से अपील की थी कि वे बोर्ड लगाएं, “यहां स्वदेशी माल बिकता है”. उनका संदेश साफ था कि यह कदम किसी दबाव में नहीं बल्कि गर्व और ताकत के भाव से उठाया जाना चाहिए. दिलचस्प बात यह है कि जापान भी इसी तरह की सोच को लंबे समय से अपनाता रहा है. वहां ‘Made in Japan’ यानी ‘निहोंसेई’ लेबलिंग ने उपभोक्ताओं के बीच भरोसे और राष्ट्रीय गर्व की मजबूत नींव बनाई है. मोदी का यह दौरा दोनों देशों के अनुभवों को जोड़ने का मौका देता है.PauseMute

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय आयात पर लगने वाले टैरिफ को 25 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है. ऐसे हालात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान दौरा बेहद निर्णायक माना जा रहा है. भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में मोदी का ‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भरता का मंत्र गूंजेगा, जिसे जापान के ‘निहोंसेई’ मॉडल से जोड़ा जा रहा है. कूटनीतिक नजरिये से यह भारत का मास्टरस्ट्रोक है, जो चीन और अमेरिका दोनों को सीधी चुनौती का संकेत देता है.

क्या है ‘निहोंसेई’ लेबलिंग? (Nihonsei Model Inspires Swadeshi Make in India)

‘निहोंसेई’ का अर्थ है “जापान में बना हुआ”. इसमें ‘निहोन’ (जापान) और ‘सेई’ (निर्मित) शब्द शामिल हैं. यह लेबल केवल देश की पहचान नहीं बताता, बल्कि जापानी कारीगरी, गुणवत्ता और सख्त मानकों का प्रतीक माना जाता है. जापान में यह विश्वास गहराई तक बैठ चुका है कि “Made in Japan” का मतलब है भरोसेमंद और उच्च गुणवत्ता वाला उत्पाद.

जापान में लेबलिंग कैसे लागू होती है?

जापान ने उत्पादों की मूल देश की पहचान को कानून से अनिवार्य कर रखा है. हर पैकेजिंग पर “Made in Japan” छोटे अक्षरों में लिखा होता है. दुकानों में घरेलू और विदेशी सामान को अलग-अलग शेल्फ या गलियारे में रखा जाता है. रीजनल ब्रांडिंग का खूब इस्तेमाल होता है, जैसे—‘आओमोरी सेब’ या ‘होक्काइडो क्रैब’. आयातित उत्पादों के लिए अलग से जगह तय की जाती है. यह प्रणाली घरेलू उत्पादों को अलग पहचान तो देती है, लेकिन विदेशी सामान को कमतर नहीं दिखाती.

क्यों असरदार है जापान का मॉडल?

जापान का यह मॉडल इसलिए सफल है क्योंकि इसमें स्पष्टता और निरंतरता है. Consumer Affairs Agency (CAA) और Japan Agricultural Standards (JAS) कड़े नियम लागू करते हैं. बुजुर्ग उपभोक्ता, जिन्हें जापान में ‘सिल्वर मार्केट’ कहा जाता है, खासतौर पर ‘Made in Japan’ पर भरोसा करते हैं. खुदरा बाजारों में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का खास माहौल बनाया जाता है. यानी उपभोक्ता सिर्फ वस्तु नहीं खरीदते, बल्कि एक पहचान और भरोसा खरीदते हैं.

PM Modi Japan Visit 2025 in Hindi: भारत के लिए सबक

भारत भी जापान की तरह स्पष्ट और आकर्षक लेबलिंग रणनीति अपना सकता है. दुकानदारों और कंपनियों को स्वेच्छा से “Made in India” दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. जब उपभोक्ता देशी उत्पाद को गर्व से जोड़ेंगे, तो उनका चुनाव स्वाभाविक रूप से बदलेगा. इससे आत्मनिर्भरता का भाव दबाव से नहीं, बल्कि सकारात्मक माहौल से पनपेगा.

स्वदेशी: इतिहास से आज तक

भारत का स्वदेशी आंदोलन 1900 के दशक की शुरुआत में ब्रिटिश सामान के बहिष्कार से शुरू हुआ था. आज मोदी का ‘वोकल फॉर लोकल’ उसी आंदोलन का आधुनिक रूप है. फर्क बस इतना है कि अब जोर बहिष्कार पर नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी और उच्च गुणवत्ता वाले भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने पर है.

मोदी का ‘स्वदेशी’ अभियान और जापान का ‘निहोंसेई’ मॉडल कई मायनों में एक-दूसरे से मेल खाते हैं. जापान ने दिखाया है कि पारदर्शिता, भरोसा और राष्ट्रीय गर्व घरेलू उत्पादों की ताकत बढ़ा सकते हैं. भारत यदि इस दिशा में कदम बढ़ाए तो आत्मनिर्भरता किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि पहचान और गर्व की संस्कृति से मजबूत होगी.

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