अमेरिकी वरदान से भस्मासुर बना पाकिस्तान

लगभग 60 साल पहले 1965 की लड़ाई हार जान के बाद पाकिस्तान के विदेशमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने कहा था, ‘यदि भारत ने परमाणु बम बनाया तो हम हजार बरस तक घास और पत्ते खाकर जी लेंगे, भूखे रह लेंगे, पर अपना बम बनाकर दम लेंगे।’ इसकी पृष्ठभूमि यह थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति आजनहावर की एटम फार पीस योजना के तहत पाकिस्तान को 1960 में कराची का परमाणु बिजली घर और 1965 में रावलपिंडी का शोध रिएक्टर मिला था।
इसी योजना के तहत भारत को कनाडा से साइरस परमाणु रिएक्टर मिला था, जिसका ईंधन अमेरिका सप्लाई करता था। दो लड़ाइयां हार चुके पाकिस्तान को यह डर सताने लगा था कि यदि भारत ने पहले परमाणु बम बना लिया तो फिर उसका क्या होगा? अमेरिका के साथ-साथ पाकिस्तान भी चीन से रिश्ते बढ़ा रहा था। मार्च 1963 की चीन-पाकिस्तान संधि के तहत वह कराकोरम कश्मीर की लगभग 5,000 वर्ग किमी की पट्टी उसे भेंट कर चुका था।
चीन ने अक्टूबर 1964 में जम्मू-कश्मीर की सीमा से लगते सिजियांग में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। सुरक्षा की इस दोतरफ़ा चुनौती को देखते हुए भारत को अपने परमाणु निरस्त्रीकरण के सिद्धांत के बावजूद परमाणु शक्ति का विकास करना पड़ा, जिसकी परिणति 1974 पोखरण परीक्षण में हुई। पोखरण के बाद पाकिस्तान और भी मुस्तैदी से चीन की मदद और यूरोप से तकनीक की चोरी करते हुए परमाणु शक्ति के विकास में जुट गया।
परमाणु अप्रसार की वकालत करने वाला अमेरिका जानता था कि कम्युनिस्ट तानाशाही वाला चीन पाकिस्तान को परमाणु तकनीक दे रहा है, जो एक अवैध काम है और जिसकी वजह से पूरे दक्षिण एवं पश्चिम एशिया में तनाव फैल सकता है, फिर भी उसने यह सब अनदेखा किया, क्योंकि वह चीन से रिश्ते गांठने में लगा था, ताकि उसे सोवियत खेमे से निकाल सके। इसी बीच ईरान में इस्लामी क्रांति हो गई और अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का कब्ज़ा हो गया। जिया उल हक के पाकिस्तान को अमेरिका की ओर से मनमानी करने की छूट मिल गई। पाकिस्तान ने न केवल अपने परमाणु बम बनाए, बल्कि उनकी तकनीक ईरान और उत्तरी कोरिया को भी बेची। अमेरिका ने भारत के लिए पाकिस्तान और अपने लिए ईरान और उत्तरी कोरिया के रूप में दो भस्मासुर खड़े कर लिए।
अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार दिए और सऊदी अरब से पैसा दिलाया, जिसका प्रयोग उसने इस्लामी जिहाद करने वाले मुजाहिदीन दस्ते बनाने के साथ पंजाब में खालिस्तानी आतंक को हवा देने में किया। जिहादी जंग में सोवियत संघ की हार से उत्साहित पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसियों और सेना ने वही नुस्ख़ा जम्मू-कश्मीर में हिजबुल, लश्कर और जैश जैसे जिहादी आतंकी भेजकर आज़माया, जो आज तक जारी है। इसमें अमेरिका का कोई भला नहीं हुआ। उसने जिस अफ़ग़ानिस्तान में जिहादी जंग करा कर सोवियत संघ को खदेड़ा, अलक़ायदा ने वहीं अड्डा बनाया और अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर पर 2001 में आतंकी हमला किया। हमला करने वाले आतंकियों में पाकिस्तान का तो कोई नहीं था, परंतु उसकी योजना बनाने वाला खालिद शेख पाकिस्तानी था, जिसे सेना मुख्यालय के पास रावलपिंडी से पकड़ा गया। अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को भी रावलपिंडी के पास एबटाबाद के एक घर में मारा गया।
रावलपिंडी पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय होने के साथ-साथ परमाणु नियंत्रण केंद्र भी है। लादेन और खालिद शेख जैसे कुख्यात आतंकियों के उसी क्षेत्र में पाए जाने के कारण इसकी चिंता होना स्वाभाविक है कि पाकिस्तान के परमाणु बम इस्लामी जिहादियों के हाथों में भी जा सकते हैं। परमाणु अस्त्रों का प्रयोग करने की पहल न करने की भारत की नीति के उलट पाकिस्तान की नीति अस्तित्व का संकट आने पर परमाणु अस्त्रों के प्रयोग की पहल करने की है। इसी कारण वह बार-बार उनके प्रयोग की धमकी देता है।
इससे चिंतित होकर अमेरिका ने कई बार उसके परमाणु नियंत्रण केंद्र पर कब्ज़ा करने की आपातकालीन योजना का जिक्र भी किया है। यदि अमेरिका को इतनी ही चिंता थी तो फिर उसने उसे परमाणु हथियार बनाने और बेचने से रोकने की ईमानदार कोशिश क्यों नहीं की? यदि की होती तो आज उसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए इतने जतन न करने पड़ते और दक्षिण एशिया में स्थितियां बेहतर होतीं। ईरान इसकी भी मिसाल है कि जिहादी मानसिकता केवल सैनिक हमलों से ख़त्म नहीं की जा सकती। उसके लिए कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर आतंकियों और उनकी समर्थक सेना की कमर तोड़ने की ज़रूरत भी होती है, लेकिन अमेरिका ने लगभग हमेशा इसका उलटा किया है।
पहलगाम के बर्बर आतंकी हमले के लिए पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने और आतंकी ठिकाने बंद कर आतंकियों को सौंपने की मांग करने की जगह उसने आइएमएफ से उसके लिए करोड़ों डालर के कर्ज़ की किस्त मंज़ूर करा दी। पाकिस्तान इस पैसे का प्रयोग आतंकियों के परिवारों को मुआवज़ा देने में करेगा। इसी तरह के दुरुपयोग के कारण पाकिस्तान 1958 से अब तक 24 बार कर्ज़ लेकर आइएमएफ़ का चौथा सबसे बड़ा कर्ज़दार बन चुका है।
अमेरिका ने बांग्लादेश की नई जिहादी सरकार के लिए भी हिंदुओं के दमन और लोकतंत्र की बहाली का हिसाब मांगे बिना 1300 करोड़ डालर की किस्त मंज़ूर कराई है। पिछले दिनों रियाद में और भी दिलचस्प बात हुई, जब ट्रंप ने अपने मेज़बान और अमेरिकी माल के बड़े ग्राहक सऊदी युवराज सलमान के कहने पर सीरिया के नए शासक अहमद अल-शारा की सराहना करते हुए सीरिया से सारे प्रतिबंध हटा लिए। अल-शारा अल क़ायदा का कमांडर और सीरिया का कुख्यात अल-नुसरा आतंकी संगठन का प्रमुख था। उसे गिरफ़्तार कराने के लिए एक करोड़ डालर का इनाम था, लेकिन ट्रंप से हाथ मिलाते ही वह अमेरिका का व्यापार साझीदार बन गया। इसी तरह परमाणु समझौते के लिए तैयार होते ही ईरान भी आतंकी देश से व्यापार साझीदार बन जाएगा।
अब यह और स्पष्ट है कि जब भी अमेरिका के आर्थिक और सामरिक हितों की बात आती है तो बाकी रिश्ते गौण हो जाते हैं, भले वे कितने भी पुराने और गहरे हों। यूरोप के देश इसकी मिसाल हैं। अमेरिका से गहराते सामरिक रिश्तों की विश्वसनीयता भारत को इसी तराजू पर तौलनी होगी।



