‘बदजुबान’ नेता-मंत्री

मंत्री और नेता ‘बदजुबान’ क्यों होने लगते हैं? वे आपत्तिजनक ही नहीं, अश्लील, शर्मनाक और मर्यादाहीन भाषा क्यों बोलने लगते हैं? उच्च न्यायालय को उसे ‘गटर की भाषा’ क्यों करार देना पड़ता है? वे निजी हमले भी करते हैं और देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता के लिए खतरनाक बोली भी बोलते हैं। यह कानूनन मानहानि ही नहीं, देशद्रोह की परिधि में भी आना चाहिए। मप्र के जनजातीय कल्याण मंत्री और 8 बार के निर्वाचित विधायक विजय शाह तो आदतन और सिलसिलेवार ‘गालीबाज’ रहे हैं। न जाने क्यों भाजपा अभी तक उन्हें ढो रही है? सिर्फ चुनाव जीतना ही राजनीति नहीं होता। राजनीति के सामाजिक और वैचारिक मूल्य भी होने चाहिए। भाषा अभद्र नहीं होनी चाहिए। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के महासचिव एवं वरिष्ठ सांसद रामगोपाल यादव ने खुलासा किया है कि एयर मार्शल एवं वायुसेना ऑपरेशन के महानिदेशक एके भारती ‘यादव’ हैं और विंग कमांडर व्योमिका सिंह हरियाणा की ‘जाटव’ हैं। इन दोनों सैन्य अधिकारियों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की कार्रवाई को देश को ब्रीफ किया था। उनके साथ कर्नल सोफिया कुरैशी भी थीं, जिनके खिलाफ मप्र के मंत्री ने ‘जहर उगला’ था। उन्हें ‘आतंकियों की बहन’ तक करार दिया था। सवाल है कि इन दोनों नेताओं को बदजुबानी कर क्या हासिल हुआ? सेना और सैनिक का कोई जाति-धर्म नहीं होता। वे सिर्फ ‘भारतीय’ होते हैं। बेशक मप्र के मंत्री ने बाद में कई बार माफी भी मांग ली, लेकिन वह निर्लज्जता की हंसी भी हंसते रहे। यह हमारे लोकतंत्र के नेताओं-मंत्रियों का चरित्र है। मंत्री विजय शाह का दूसरों के प्रति बदजुबानी का पुराना इतिहास रहा है। उन्होंने 2013 में मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी तक को नहीं छोड़ा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर फब्तियां कसीं। चलो, इसे राजनीति के खाते में डाल देते हैं। किन्नर समुदाय का मजाक उड़ाया और अब आतंकवाद तथा मुस्लिम की आड़ में ऐसे अपशब्दों का प्रयोग किया है, जिन्हें हमारी नैतिकता लिखने से रोकती है। दरअसल यह अलगाववादी सियासत है।
भाजपा में एक तबके की सोच यह है कि मुसलमानों को जितनी गालियां दोगे, हिंदुओं के उतने ही वोट मिलेंगे। यह गलतफहमी है। मप्र उच्च न्यायालय की जबलपुर बेंच ने कर्नल सोफिया के प्रति मंत्री की बदजुबानी का स्वत: संज्ञान लिया है। सहज सवाल किया गया कि मंत्री के संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ‘गटरनुमा भाषा’ कैसे बोल सकता है? सर्वोच्च अदालत में प्रधान न्यायाधीश जस्टिस बी. आर. गवई ने इसी आधार पर मंत्री के वकील के जरिए मंत्री को फटकार लगाई और उच्च न्यायालय के प्राथमिकी दर्ज करने वाले आदेश को रद्द करने से इंकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 152, 196-1बी, 197-1सी के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई है। इंदौर पुलिस को देर रात प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी, क्योंकि उसे ‘अवमानना’ की धमकी दी गई थी, लेकिन पुलिस ने छल और मजाक किया। प्राथमिकी में मंत्री की बदजुबानी का कोई भी ब्यौरा नहीं था। बहरहाल अदालत ने हडक़ा कर प्राथमिकी ठीक कराई और आगे की जांच अदालत की निगरानी में करने का आदेश दिया। बहरहाल शुक्रवार, 16 मई को सर्वोच्च अदालत में सुनवाई थी। उस फैसले का विश्लेषण बाद में किया जा सकता है, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या भाजपा के राजनीतिक संस्कार यह भी हैं कि उसके नेता और मंत्री अपनी बदजुबान के जरिए देश की सेना और सैन्य अधिकारियों को अपमानित करते रहें? देश में ऐसे तत्त्व निरंकुश क्यों हैं कि कभी वे देश के विदेश सचिव विक्रम मिसरी और उनकी बेटी का सोशल मीडिया पर अपमान करते हैं। ‘पहलगाम नरसंहार’ में विधवा हुई हिमांशी नरवाल के लिए अलग-अलग विशेषण इस्तेमाल करते हैं। क्या वे ही ‘राष्ट्रवादी’ हैं? क्या मजहबी नफरत, मवाद, खुन्नस, विद्वेष उनके दिमाग में घुसा है। मप्र के मंत्री ने भी क्या सोचा होगा? रामगोपाल यादव ने सैन्य अधिकारियों की जातियों का जिक्र क्यों किया? ये तमाम तत्त्व ऐसे हैं कि जितना भी जहर उगल लें, लेकिन इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती। मंत्री को शायद एहसास नहीं है कि यदि उन्हें तीन साल की सजा हो गई, तो उनकी विधायकी और मंत्री की कुर्सी भी साफ हो जाएगी।



