राष्ट्रीय

पाकिस्तान पर भारी पड़ रहा है नासूर बना बलूचिस्तान

वैसे तो यह बात यकीन करने लायक नहीं लगती कि कहीं ट्रेन को भी अगवा किया जा सकता है. टीवी और फिल्मों में तो ऐसा दिखाया जाता है पर वाकई में ऐसा हुआ है यह सुनकर ही अजीब लगता है. अभी तक हमने सुना है कि आदमी किडनैप होता है, हद से हद प्लेन हाइजैक होने की खबरें आती है. पर करीब 400 आदमियों से भरी ट्रेन दिन दहाड़े किडनैप हो जाती है, ये थोड़ा अजीब है. यह सब हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में हुआ है तो चिंता और भी बढ़ जाती है. हांलाकि नई दिल्ली से बलूचिस्तान की दूरी करीब  1200 किलोमीटर है. इसके बावजूद यह सब हजम नहीं हो रहा है. इसी हफ्ते मंगलवार को  क्वेटा से पेशावर  जाने वाली जाफर एक्सप्रेस को बलूच लिबरेशन आर्मी  ने अगवा कर लिया. बीएलए की मांग रही है कि पाकिस्तानी जेलों से बलूच लोगों को रिहा किया जाए. इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन लॉन्च किया.

पाकिस्तान आर्मी का दावा है ट्रेन को हाईजैक करने वाले सभी 33 लोगों को मार दिया गया है.  करीब 300 बंधकों को बचा लिया गया है. इस ऑपरेशन में कुछ यात्री मारे गए हैं. वही  बलूच लिबरेशन आर्मी  का दावा है कि उसने 50 से अधिक बंधकों के मार गिराया है. कई पाकिस्तानी सैनिक भी मारे गए है.

पाकिस्तानी सेना और खुफिया विभाग की नाकामी

 यह साफ है कि  पाकिस्तान में पूरी व्यवस्था चरमरा गई है. पूरा सिस्टम फेल होने का ही नतीजा है कि पाकिस्तान में ऐसी घटनाएं हो रही हैं. अपनी सुरक्षा व्यवस्था के तार-तार होने और सेना व खुफिया विभाग की नाकामी पर पाकिस्तान चुप्पी साधे हुए है. हालत ये है कि पाकिस्तान अपनी गलती मानने के बजाए इसका दोष सीधे भारत पर मढ़ रहा है. पाकिस्तान ने पहले अफगानिस्तान पर इसका आरोप मढ़ा और बाद में इस घटना के पीछे भारत का हाथ बता दिया. इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है.

 विदेश मंत्रालय के  प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि पूरी दुनिया जानती है कि वैश्विक आतंकवाद का केंद्र कहां है. पाकिस्तान को अपनी आंतरिक समस्याओं और विफलताओं के लिए दूसरों पर उंगली उठाने और दोष मढ़ने के बजाय अपने अंदर झांकना चाहिए. वही अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान को खरी-खोटी सुना दी. अफगानिस्तान ने कहा कि पाकिस्तान  गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी न करें और अपनी सुरक्षा और आंतरिक समस्याओं को हल करने पर ध्यान केंद्रित करें.

बलूच लिबरेशन आर्मी का आतंक दशकों पुराना

पाकिस्तानी सेना के सिरदर्द बने बलूच लिबरेशन आर्मी का आतंक नया नहीं है. कहा जाता है कि बलूच लिबरेशन आर्मी पहली बार  1970 के दशक में वजूद में आया. उस समय इसने पाकिस्तान की भुट्टो सरकार के खिलाफ बगावत शुरु की. लेकिन यह बलूचिस्तान में एक दशक से ज्यादा सक्रिय है. वैसे इसका मकसद साफ है. इसके मुताबिक पाकिस्तान ने गैरकानूनी तौर पर बलूचिस्तान पर कब्जा करके रखा हुआ है.1947 में भारत पाक बंटवारे के समय उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल करा दिया गया . यह लोग उस वक्त बलूचिस्तान को एक आजाद मुल्क के तौर पर चाहते थे. इसलिए ये लोग तब से पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है.ये लोग बलूचिस्तान की आजादी की मांग को लेकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.

अमेरिका और पाकिस्तान ने बीएलए को आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है लेकिन संयुक्त राष्ट संघ ने इसे अभी तक आतंकी संगठन नहीं माना. बीएलए के हमले हाल के सालों में ज्यादा बढ़े हैं. सरकारी प्रतिष्ठान और पाक सुरक्षा बलों पर बीएलए लगातार हमले करता रहा है. बलूचिस्तान की आजादी के लिये वहां पर कई आंतकी संगठन सक्रिय हैं. इसमें से बीएलए सबसे पुराने और ताकतवर संगठनों में से एक है.

बलूचिस्तान के बारे में विस्तार से जानिए

पाकिस्तान में चार प्रांत- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तून हैं. बलूचिस्तान , पाकिस्तान ,ईरान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में फैला हुआ हैं. 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने यहां भी अपना नियंत्रण स्थापित किया. 1947 में बंटवारे के वक्त बलूचिस्तान का विभाजन पाकिस्तान और ईरान के बीच हो गया. यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत हैं, जो कि 3 लाख 47 हज़ार 190 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है. जो पाकिस्तान के एरिया का 44 फीसदी है. लेकिन सबसे कम आबादी वाला प्रांत है. यहां की आबादी 1.49 करोड़ हैं. इसमें बलूची और पश्तो सबसे ज़्यादा हैं. 

बलूचिस्तान पठारी इलाका है, जो कि नेचुरल गैस और आर्थिक संपदा से भरपूर है. लेकिन ब्रिटिश भारत के समय से लेकर यह इलाका अन्य इलाके की तुलना में सामाजिक और आर्थिक तौर पर अविकसित रहा है. पाकिस्तान के शासन काल में भी  बलूचिस्तान के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा. 1948 से 1950 में पाकिस्तान के खिलाफ बलूचिस्तान में पहला संघर्ष हुआ. फिर 1958-59 तक बलूचिस्तान में पाक के खिलाफ  गुरिल्ला संघर्ष हुआ. वहीं 1960 में इस लड़ाई ने और तेजी पकड़ी. 1970 के दशक में भी इस इलाके में सशस्त्र विरोध हुआ. 2004 में तो बलूची हमले में तीन चीनी इंजीनियरों की मौत हो गई जिससे हालात और बिगड़े. 2006 में बलूचियों का पाक सेना के साथ भीषण संघर्ष हुआ, इसमें 60 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए.

बलूचों के आंदोलन को हल्के में नहीं ले सकते

यह ठीक है कि अब पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अगवा ट्रेन को बीएलए से छुड़ा लिया है, लेकिन इस बार इसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा.  ऐसे हमलों की रणनीति राजनीतिक मकसद साधना होता है.  इसने यह भी साबित किया कि बलूचों के आंदोलन को हल्के में नहीं लिया जा सकता. पाकिस्तान बनने के समय से ही जारी बलूचियों का विद्रोह कई दौर से गुजरा है. हमेशा से पाकिस्तान ने इसे कुचलने की कोशिश की.  खासकर जब 2006 में  परवेज मुशर्रफ के आदेश पर पाक सेना  ने नवाब अकबर बुगती की हत्या कर दी तो वहां पर आग और भड़क उठी.  पाकिस्तान का सबसे बड़ा और आर्थिक तौर पर संपन्न राज्य होने के बावजूद बलूचिस्तान सबसे गरीब और पिछड़ा हुआ है.

 स्थानीय लोगों को नौकरी नहीं मिलती. आवाज उठाने पर उसे या तो खत्म कर दिया जाता है या फिर अगवा कर लिया जाता है.  पहले पाकिस्तानी औऱ अब चीनी यहां के संसाधनों पर कब्जा जमाये बैठे हैं. लेकिन स्थानीय लोगों को कोई फायदा नहीं मिलने से उनके अंदर जबरदस्त नाराजगी और गुस्सा है. पाकिस्तान में कमजोर लोकतंत्र और गिरती अर्थव्यवस्था से ऐसे विरोध के आंदोलन और मजबूत होते हैं तो सवाल पाकिस्तान के अस्तित्व का खड़ा हो रहा है. अगर पाकिस्तान लोगों की इच्छाओं का सम्मान नहीं करेगा तो ऐसे और आंदोलन का जन्म होगा जो उसकी नींव को खोखला कर देगा. –राजीव रंजन

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