संपादकीय

वे खालिस्तान समर्थक हैं!…

लंदन में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की सुरक्षा में जो चूक हुई है, वह कोई सामान्य घटना नहीं है। खामोश नहीं बैठा जा सकता और न ही बर्दाश्त किया जा सकता है, लिहाजा यह निंदनीय घटना है। कुछ भी हो सकता था! जो खालिस्तान-समर्थक विदेश मंत्री के काफिले तक कूद गया, वह सुनियोजित ढंग से हमला भी कर सकता था! यकीनन यह ब्रिटिश पुलिस की लापरवाही है। उस खालिस्तानी उग्रवादी ने भारतीय ध्वज ‘तिरंगे’ का भी अपमान किया। सवाल यह है कि जहां विदेश मंत्री बैठक कर रहे थे, उसी स्थल के करीब खालिस्तान समर्थकों को, उनके कथित झंडे के साथ, प्रदर्शन करने की अनुमति क्यों दी गई? क्या ब्रिटिश सरकार और पुलिस का ऐसे अलगाववादी तत्त्वों के प्रति रवैया कुछ ज्यादा उदार और लचीला हो गया है? यदि यह सुरक्षा चूक, किसी विदेशी मंत्री या प्रतिनिधि के संदर्भ में, भारत में हो जाती, तो पश्चिमी और यूरोपीय देश आसमान सिर पर उठा लेते! सवाल और जिज्ञासा यह भी है कि आखिर अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी और ऑस्टे्रलिया सरीखे देशों में खालिस्तान-समर्थक इतने निरंकुश और सक्रिय क्यों हैं? यह पहली घटना नहीं है। मार्च, 2023 में भारतीय उच्चायोग से ‘तिरंगा’ उतार दिया गया था। ये सभी देश भारत के मित्र-देश, रणनीतिक साझेदार देश होने का भी दावा करते रहे हैं और खालिस्तानी उग्रवादियों, समर्थकों को भी पालते-पोसते रहे हैं। क्या यह दोगलापन नहीं है? क्या ये देश वैचारिक और बुनियादी तौर पर ‘खालिस्तान’ को एक अलग देश के तौर पर मान्यता देने के पक्षधर हैं? यदि यह सोच है, तो वह पूरी तरह भारत-विरोधी है। सिर्फ कूटनीति या संबद्ध देश के उच्चायुक्त अथवा राजदूत को तलब कर, अपनी तल्खी दिखाने मात्र से ही इस सोच का समाधान हासिल नहीं होगा।

प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के स्तर पर यह द्विपक्षीय संवाद होना चाहिए कि खालिस्तान का समर्थन स्वीकार्य नहीं है। इन देशों को लोकतंत्र और मानवाधिकार की परिभाषाएं, कमोबेश भारत के संदर्भ में, बदलनी पड़ेंगी। क्या ये देश यह नहीं जानते कि भारत ने खालिस्तानी उग्रवादियों के खिलाफ कितनी लंबी लड़ाई लड़ कर उन्हें कुचला है और कितनी कुर्बानियों के बाद आज भारत और पंजाब में शांति-स्थिरता का माहौल है? गौरतलब यह है कि भारतीय मूल के ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे ऋषि सुनक की सरकार ने खालिस्तानियों पर शिकंजा कसने के लिए कई कदम उठाए थे। टास्क फोर्स को 1 करोड़ रुपए का फंड दिया था, ताकि सरकार खालिस्तान-समर्थक उग्रवाद से पैदा हुए खतरों को समझ सके। उनकी ऑनलाइन-ऑफलाइन धन उगाही पर भी निगरानी रखी गई थी। सुनक सरकार ने सिख समुदाय के साथ सक्रिय होकर काम किया, ताकि गुरुद्वारों और धर्मार्थ संगठनों का इस्तेमाल धन उगाही के लिए न किया जा सके। अब वहां प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सरकार है। उनका खालिस्तानियों के प्रति रुख नरम रहा है। बीते दो साल में स्टार्मर सरकार ने टास्क फोर्स को कोई नया फंड नहीं दिया, लिहाजा वह निष्क्रिय होकर बंद होने के कगार पर है। चरमपंथियों की जो निगरानी की जा रही थी, वह भी शिथिल पड़ी है। ब्रिटिश गृह सचिव कूपर ने एक रपट पेश की थी, लेकिन उसमें सिर्फ खालिस्तान समर्थकों का जिक्र था, उन पर कार्रवाई को लेकर कोई उल्लेख नहीं था। खालिस्तान को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है, लिहाजा अधिकारी भी ऐसे तत्त्वों के खिलाफ कार्रवाई करने से हिचक रहे हैं। बहरहाल हमारे विदेश मंत्री ने यह महत्वपूर्ण घोषणा जरूर की-‘मुझे लगता है कि हम जिस हिस्से का इंतजार कर रहे हैं, वह कश्मीर के चुराए गए हिस्से की वापसी है।’

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