दिल्ली में घुसपैठिए वोटर…

क्या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विधानसभा चुनाव में 20 लाख से अधिक घुसपैठिए मतदान करेंगे? क्या देश की राजधानी में इतने रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं? यदि हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करने का दोषी और जवाबदेह कौन है? क्या लाखों अवैध शरणार्थियों को, सिर्फ चुनाव के मद्देनजर, राजनीतिक संरक्षण दिया जाना संभव है? क्या भारत सरकार और सीमाओं पर तैनात सुरक्षा बलों ने आंखें मूंद रखी हैं? ऐसे कई सवाल बेहद संवेदनशील हैं। दिल्ली को घुसपैठियों की धर्मशाला नहीं बनाया जा सकता। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने 114 पन्नों की जो शोध-रपट जारी की है, बेशक उसे पूर्ण सत्य न माना जाए, लेकिन घुसपैठियों का मुद्दा तो पुराना है। इस रपट को नकारा भी नहीं जा सकता, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। चुनाव आयोग ने सभी दृष्टिकोण से सुनिश्चित करने और क्रॉस चेकिंग के बाद जो अंतिम मतदाता-सूची तैयार की है, क्या उसमें करीब 20 लाख घुसपैठियों के नाम भी दर्ज हैं। इस अवैध मतदान से न केवल हमारी चुनाव-प्रणाली प्रभावित होगी, बल्कि दिल्ली की जनसंख्या के समीकरण भी बदल रहे हैं। यहां की 84 फीसदी हिंदू आबादी घट कर 81.7 फीसदी हो गई है, जबकि मुस्लिम आबादी 5.7 फीसदी थी, जो बढक़र करीब 13 फीसदी हो गई है। यह खतरनाक बदलाव है। सवाल यह है कि घुसपैठिए मतदाता बने, उन्हें सभी सरकारी संसाधन और सुविधाएं भी हासिल हैं, उनके पास मतदाता पहचान कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड आदि सरकारी, वैध दस्तावेज भी हैं, तो उनकी छंटनी कर कैसे साबित किया जा सकता है कि वे अवैध घुसपैठिए हैं? वे बांग्लादेश, म्यांमार सरीखे पड़ोसी देशों से भारत में घुसे हैं?
रपट में खुलासा किया गया है कि राजधानी दिल्ली में 20 लाख से अधिक घुसपैठिए मौजूद हैं और वे किन इलाकों में रहते हैं। पुलिस ने अधिकतर चेहरे चिह्नित भी कर रखे हैं। उन्हें उनके देश वापस भेजने का फैसला भी हो चुका है, लेकिन डिपोर्ट करने के 70 फीसदी मामले आज भी लंबित पड़े हैं, क्योंकि घुसपैठियों के मूल देश उन्हें अपने नागरिक मानने को तैयार नहीं हैं। यही नहीं, पुलिस को भी इनके इलाकों में जाने से रोका गया है। क्या घुसपैठिए इतना बड़ा खतरा हैं अथवा राजनीतिक संरक्षण के तहत ऐसा किया गया है? करीब 45 फीसदी घुसपैठिए झुग्गियों में रहते हैं। वहां उन्हें मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त शिक्षा सरीखी सरकारी सुविधाएं हासिल हैं। जिन इलाकों में घुसपैठिए रहते हैं, वहां आसपास के स्कूलों में 20-30 फीसदी बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। ये घुसपैठिए असंगठित क्षेत्रों में काम या मजदूरी करते हैं और कम वेतन या दिहाड़ी पर भी काम करने को तैयार रहते हैं, लिहाजा कारोबारी उन्हें काम पर रखने को प्राथमिकता देते हैं और श्रम के कोई भी दस्तावेज नहीं देने पड़ते हैं। भाजपा ने इसे भी मुद्दा बनाया है कि जो काम पूर्वांचल या अन्य क्षेत्रों के लोगों को मिलने चाहिए थे, वे कम पैसे के कारण घुसपैठियों को मिल रहे हैं। यह भी बेरोजगारी का बड़ा कारण है। रपट में बताया गया है कि फर्जी दस्तावेज बनाने का भी एक गिरोह सक्रिय है, जो स्थानीय नेताओं के इशारे पर इन घुसपैठियों के फर्जी दस्तावेज तैयार करता है। बदले में ये अवैध अप्रवासी उन नेताओं को चुनाव में वोट देते हैं। किसी भी स्तर पर घुसपैठ स्वीकार्य न हो।



