संपादकीय

यमुना का पेयजल प्रदूषित और सवालिया

यमुना नदी के जहरीले पानी पर दिल्ली चुनाव में वाकई जंग छिड़ी है। इसमें आम आदमी पार्टी (आप), भाजपा ही शामिल नहीं हैं, बल्कि चुनाव आयोग का युद्ध अलग किस्म का है। उसके निशाने पर ‘आप’ और केजरीवाल हैं। आयोग ने ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल से पांच और सवाल पूछे थे। केजरीवाल ने यहां तक आरोप लगाया था कि हरियाणा सरकार ने यमुना के पानी में जहर मिलाने की साजिश रची थी। यदि दिल्ली सरकार के इंजीनियरों ने विषाक्त पानी को यथासमय न रोका होता, तो दिल्ली में ‘नरसंहार’ भी हो सकता था। यह बेहद गंभीर और नाजुक आरोप है, लिहाजा चुनाव आयोग तह तक जाना चाहता है कि जहर कौन-सा था? कब और कैसे यमुना के पानी में मिलाया गया? दिल्ली जल बोर्ड के किन इंजीनियरों ने कहां पानी रोका, नतीजतन दिल्ली ‘नरसंहार’ से बच गई? यमुना के जहरीले पानी पर यह सियासत 5 फरवरी को थम जाएगी, क्योंकि उस दिन दिल्लीवाले नई विधानसभा के लिए मतदान करेंगे, लेकिन इससे भी अधिक संवेदनशील और मानवीय सवाल देश भर में साफ पेयजल को लेकर है। एनएसएसओ के 79वें राउंड का डाटा है कि देश के करीब 95 फीसदी घरों की पहुंच पेयजल तक जरूर है। नल के जरिए जल, संरक्षित कुओं, नलकूपों और बोतलबंद पानी के तौर पर घरों को पीने का पानी उपलब्ध है, लेकिन कोई भी विभाग, एजेंसी या वितरण-संस्था यह शर्तिया दावा नहीं कर सकती कि उपलब्ध पेयजल बिल्कुल साफ, विषाणु-रहित और पीने योग्य पानी है। बेशक ‘नल से जल’ अभियान के बाद पानी के रंगों में सुधार आया है, लेकिन अभी बहुत कुछ सवालिया और प्रदूषित है। ग्रामीण भारत के करीब 40 फीसदी घरों में पेयजल का मुख्य स्रोत नल का पानी ही है, जबकि शहरों में यह आंकड़ा करीब 70 फीसदी है। इस पेयजल की स्वच्छता, पीने की योग्यता पर सवाल क्यों उठते रहे हैं? हमारा करीब 70 फीसदी पानी ‘प्रदूषित’ क्यों है? यह सवाल नीति आयोग के ‘संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक’ की जून, 2018 में प्रकाशित रपट में सामने आया है।

रपट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पानी की गुणवत्ता के संदर्भ में भारत दुनिया के 122 देशों में 120वें स्थान पर है। यह सवालिया के साथ-साथ शर्मनाक स्थिति है। अनुमान है कि 4 करोड़ अपशिष्ट पानी हररोज हमारी नदियों और अन्य जल-स्रोतों में मिलता है। उसमें से एक छोटा-सा हिस्सा ही शोधित किया जाता है। जब शोधन किए गए पानी को पाइपों के जरिए प्रवाहित किया जाता है, तो उस पानी की गुणवत्ता भी दूषित हो जाती है, क्योंकि पानी को पुराने नेटवर्क के जरिए ही प्रवाहित किया जाता है। उस नेटवर्क के समानांतर सीवेज लाइनें होती हैं, लिहाजा पानी के प्रदूषित होने की संभावनाएं सौ फीसदी होती हैं। निष्कर्ष है कि जो पानी नलों के जरिए दिन में कुछ समय के लिए ही छोड़ा जाता है, वह पीने लायक नहीं रह पाता। क्षेत्र और आवासीय कालोनी के मुताबिक भी पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। 2019 में मुंबई के नल वाले जल को 100 फीसदी सुरक्षित घोषित किया गया था, लेकिन मॉनसून मौसम से पहले ही शहर में जल संबंधी बीमारियां बढऩे लगीं। हमारे राजनेता और सत्ताएं बिल्कुल परवाह नहीं करतीं। चुनाव कभी भी पानी के मुद्दे पर तय नहीं हुए। शुक्र है कि इस बार दिल्ली चुनाव में यमुना का पानी अचानक सबसे उग्र चुनावी मुद्दा बन गया है। यमुना के पानी को शोधित करने के लिए संयंत्र कार्यरत हैं, लेकिन पानी में अमोनिया अथवा अन्य रसायन की उपस्थिति मात्रा से अधिक होगी, तो संयंत्र भी पानी को पीने लायक नहीं बना सकते। बेशक देश की राजधानी में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सरीखे वीवीआईपी के अलावा न्यायाधीश, सांसद, राजनयिक भी रहते हैं। उन्हें कौनसा पानी सप्लाई किया जाता है, हम नहीं जानते, लेकिन पानी के मुद्दे का सरलीकरण नहीं किया जा सकता। पेयजल राष्ट्रीय समस्या है, लिहाजा उसे उसी स्तर पर, उसी गंभीरता से ग्रहण किया जाना चाहिए। अन्यथा कोई भी महामारी हमारे देश को घेर सकती है।

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