संपादकीय

महाकुंभ,भीड़ की त्रासदी है

अंतत: साबित हो गया कि महाकुंभ प्रयागराज में ‘त्रासद हादसा’ हुआ। भीड़ के कारण भगदड़ मची। भगदड़ वैसी ही थी, जैसी इतिहास में दर्ज हैं और हम कई बार देख-सुन चुके हैं। जिंदगी एक भी बेहद अमूल्य है, वह किसी भी सूरत में कुचली नहीं जानी चाहिए। यह अक्षम्य मानवीय अपराध तय होना चाहिए। मौत निश्चित और अपरिहार्य है, लेकिन मौत वह होनी चाहिए, जो नियति ने तय की हो। क्या महाकुंभ की त्रासदी को भी नियति मान लिया जाए? महाकुंभ में करोड़ों श्रद्धालु पुण्य कमाने गए थे और अब भी जा रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें ‘पुण्यात्मा’ माना है, वे पूर्णत: आस्थामय थे, लिहाजा पवित्र संगम घाट से 200 मीटर की दूरी तक पहुंच गए थे। फिर उनकी आस्था अधूरी क्यों रही? शायद यही नियति हो! बहरहाल भगदड़ मची और सोते, विश्राम करते भक्त भीड़ की कुचलियों तले फंस गए। कुचलन के कारण 30 मौतें हो गईं, 60 घायल हुए। उनमें से 36 लोग अब भी अस्पताल में उपचाराधीन हैं। महाकुंभ की यह त्रासदी विश्व भर के मीडिया में छाई है। बड़े-बड़े अखबारों में सुर्खियां, विश्लेषण छापे जा रहे हैं कि भारत इतने व्यापक स्तर पर भीड़ का प्रबंधन करने में नाकाम रहा। सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या कुंभ जैसे अपरिमित जन-आयोजन भारत में किए जाने चाहिए? भारत के सुरक्षाकर्मी भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे अथवा महज अपीलें जारी कर रहे थे? अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत-विरोधी अभियान-सा छिड़ गया लगता है। बेशक भगदड़ें होती रही हैं, धार्मिक स्थलों पर ज्यादा हुई हैं, लिहाजा ऐसी त्रासदियों को भी नियति माना जाए। दुनिया भर में भयानक और वीभत्स हत्याएं भी की जाती रही हैं। यह एक निरंतर अपराध है। कुंभ या किसी भी जन-सैलाब के दौरान भगदड़ और बर्बर हत्याओं को मीडिया में ‘बैनर सुर्खियों’ के तौर पर छापा जाता रहा है। कई दिनों तक विश्लेषण भी प्रकाशित किए जाते रहे हैं, लेकिन अलजाइमर की बीमारी दुनिया भर में मौतों की 7वीं सबसे बड़ी और तय कारण है, लेकिन उसकी खबर एक कोने में छपती है।

कई बार तो नजरअंदाज भी कर दिया जाता है। सडक़ दुर्घटनाओं में सालाना लाखों मौतें होती हैं, लेकिन इन्हें भी सुर्खियां नहीं बनाया जाता। कोरोना महामारी की खबर तब तक एक कोने में, अंदर के पन्नों पर, छपती रही, जब तक भारत में मौतों का आंकड़ा निरंतर और भयावह नहीं हो गया। दरअसल भारत एक संकरा और भीड़-भाड़ वाला देश है। आबादी करीब 145 करोड़ है और निरंतर बढ़ रही है। गौरतलब है कि भारत में 9 शहर ऐसे हैं, जिनकी आबादी 70 लाख से ज्यादा है। करीब 46 शहर ऐसे हैं, जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है। इन शहरों के पास ऐसे मैदान भी नहीं हैं, जहां 5 लाख की भीड़ को एक जगह संभाल लिया जाए। देश में कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां एक दिन में 8-10 करोड़ लोगों की भीड़ जमा हो सके और कोई हादसा भी न हो। हमारे रेलवे स्टेशनों पर इतनी भीड़ हो जाती है कि अक्सर भगदड़ के आसार बनते रहते हैं। फिर महाकुंभ में करोड़ों की भीड़ के प्रबंधन और नियंत्रण के दावे क्यों किए गए? पुण्य स्नान के लिए लोगों को आमंत्रण क्यों दिया जाता रहा? बेशक मेला क्षेत्र 4000 हेक्टेयर में फैला है। यह अभूतपूर्व है। सुरक्षाकर्मी 70,000 से अधिक तैनात किए गए हैं, लेकिन स्नान की होड़ में भीड़ उनके निर्देशों को भी नहीं मानती। दरअसल भारत के ज्यादातर लोग धर्म-भीरू हैं, आस्तिक आत्माएं कम हैं, लिहाजा भक्त 10-15 किलोमीटर पैदल चलते रहे, धक्के खाते रहे, संघर्ष करते रहे, क्योंकि उन्हें ‘अमृत स्नान’ करना था। बहरहाल महाकुंभ की त्रासदी पर न तो इंजीनियर बनें और न ही राजनीतिक विद्वेष फैलाएं। हमें भीड़-तंत्र के विज्ञान को समझना होगा, नहीं तो त्रासदियां भी अपरिहार्य ही रहेंगी।

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