राजनीति

लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल छोटा मगर मील का पत्थर सिद्ध हुआ

11 जनवरी 1966 को जब निधन हुआ तब लाल बहादुर शास्त्री को केवल लगभग 19 महीने प्रधानमंत्री पद ग्रहण किए हुए थे। पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा न कर सके पर उनका नाम और काम आज तक याद आता है क्योंकि जो किया उसकी छाप जब पड़ी थी तब से लेकर आज वर्तमान और कल भविष्य पर भी रहेगी।

महिलाओं का उत्थान : आज हर नेता और राजनीतिक दल कहता है और ढोंग करने की हद से भी परे जाकर घोषणाओं का दिखावे के लिए इस्तेमाल करता है ताकि लगे कि उनसे बड़ा महिलाओं का कोई हिमायती नहीं। शास्त्री जी का एक काम याद आता है जिसमें उन्होंने स्त्रियों को बस कंडक्टर बनाने की योजना बनाई और उस पर अमल भी सुनिश्चित किया। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार और वह भी ऐसा कि हर तरह के लोगों के साथ व्यवहार करने और प्रत्येक स्थिति का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर सकें। महिलाएं एक ओर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें और दूसरी ओर पुरुष दूसरे काम कर सकें, दोनों एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें।

शास्त्री जी का दूसरा काम जो आज तक चल रहा है और देश को दुनिया भर में गौरवान्वित कर रहा है, वह है दुग्ध उत्पादन और सहकारिता के माध्यम से कीर्तिमान स्थापित करना जिसके बल पर हम दूध का उत्पादन करने वाले देशों में सबसे आगे हैं। अमूल का नाम आज हर कोई जानता है। अगर शास्त्री जी वर्गीज कूरियन से न मिले होते और डेयरी उद्योग की नींव न डाली होती तो आज इस क्षेत्र में महिलाओं विशेषकर ग्रामीण इलाकों में उनके जीवन भर रोजगार का साधन न बनता। दुधारू पशुओं की देखभाल पहले भी करती थीं लेकिन उन्हें एक व्यवस्थित जीवन और निरंतर आमदनी का साधन इसी से मिला। 

राष्ट्रीय स्तर पर नैशनल डेयरी डिवैल्पमैंट बोर्ड की स्थापना का श्रेय उन्हीं को जाता है। उनकी नीति और दूरदर्शिता का ही कमाल था कि आज यह बोर्ड अपनी महत्वपूर्ण भूमिका से स्व-सहायता समूहों, स्व-रोजगार और स्वयं निर्मित संसाधनों से देहाती क्षेत्रों में स्त्री-पुरुषों की आजीविका का प्रमुख साधन बन रहा है। दूध का व्यापार करने की आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है और एक तरह से प्रतियोगिता और प्रतिद्वंद्विता का वातावरण बन रहा है।

खाद्यान्न सुरक्षा : सन् 1964 से 1966 तक देश के अनेक भाग अकाल ग्रस्त थे। ऐसे में खाद्य सुरक्षा और खाद्यान्न में उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की शुरूआत शास्त्री जी ने ही की थी। आज हम एक विशाल जनसंख्या को मुफ्त अनाज देने का दम भरते हैं, उसका आरंभ उन्होंने ही हरित क्रांति के रूप में किया था। पूरे देश से अनुरोध किया था कि सप्ताह में एक वक्त का भोजन न करें और अन्न की बर्बादी न होने दें। अधिक उपज देने वाली फसलों के अनुसंधान और उनसे तेजी से अनाज उत्पादन करने की नींव उन्होंने ही डाली थी। फूड कार्पोरेशन का गठन उन्होंने ही किया था। राष्ट्रीय कृषि उत्पाद मंडल की स्थापना उन्हीं का लक्ष्य था जिसके जरिए देश को खाद्य संपन्न बनाया जा सकता था। हरित क्रांति को लेकर आज जो बहस होती है उसका सूत्रपात उन के कार्यकाल में हुआ था। डाक्टर एम.एस. स्वामीनाथन का इस क्षेत्र में योगदान मात्र इस नीति की बदौलत हुआ कि देश अनाज के मामले में विपन्न न रहे और अन्य देशों से आयात करने की मजबूरी से मुक्त हो। यह उन्हीं की दीर्घकालीन सोच का परिणाम था कि आज हमारा देश आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि खाद्यान्न का निर्यात और भुखमरी से जूझ रहे देशों को अनाज मुहैया कराने में सक्षम है।

केवल जनहित : शास्त्री जी गृह, परिवहन और रेल मंत्री भी रहे। सभी पदों के अनुभव को लेकर जब प्रधानमंत्री बने, उन्होंने कभी व्यक्तिगत हित की बात तो छोडि़ए पार्टी के बारे में भी नहीं सोचा कि उनके किसी काम से कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि जनहित से बड़ा किसी भी नेता का कोई कार्य या उद्देश्य हो सकता है। रेल दुर्घटना के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी और त्यागपत्र देने वाले वह एकमात्र मंत्री थे और उनका उदाहरण आज भी दिया जाता है। आज रेल दुर्घटना होने पर पद छोडऩे की बात तो दूर, उसके कारणों और व्यवस्था में व्याप्त अकुशलता को दूर करने में भी किसी मंत्री की कोई रुचि नहीं होती। वे केवल दोषारोपण करते हैं और भीषण हादसा होने पर यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं होते। डाक्टर होमी जहांगीर भाभा के सुझाव पर विचार और मंजूरी देने का श्रेय उन्हीं को जाता है। स्वतंत्र भारत में पाकिस्तान के साथ पहला युद्ध भी उन्हीं के नेतृत्व में सन 1965 में लड़ा गया था। हमने शत्रु पर विजय पाई और उसकी राजधानी तक को जीतने का संकल्प उन्हीं का था। 

जिस पीढ़ी ने नेहरू और शास्त्री का दौर देखा है वे इस बात से सहमत होंगे कि विदेश और देशनीति में जो मील के पत्थर इस 5 फुट 2 इंच की पतली दुबली काया के व्यक्ति ने रखे, वे आज भी कायम हैं। विडंबना है कि इंदिरा  गांधी से शुरू हुआ परिवारवाद आज कांग्रेस के पतन में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल छोड़कर नरसिम्हा राव और डा. मनमोहन सिंह की बात करें तो वे संयमी और ईमानदार होने के अतिरिक्त देश को कुछ ऐसा न दे सके जिसका शास्त्री की भांति कदमों के निशान की तरह अनुसरण किया जा सके। इन दोनों प्रधानमंत्रियों को देश की अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन का कत्र्ता माना जा सकता है लेकिन इसके साथ ही पर्दे के पीछे किसी की कठपुतली बनने के दोष से उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता।-पूरन चंद सरीन

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