मुफ्तखोरी और गारंटियों की राजनीति,चुनावी गारंटियां बेनकाब

मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी भी कई बार चेता चुके हैं कि मुफ्त की रेवडिय़ां देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत घातक हैं। इन कथनों के बावजूद आज देश में मुफ्तखोरी और गारंटियों की ही राजनीति चल रही है। चुनावों में गारंटियों की खैरात घोषित की जाती है, लेकिन सरकार बनने के बाद बहाने बनाए जाते हैं, कन्नी काट ली जाती है, समीक्षाओं की आड़ ली जाती है, लिहाजा बहुधा गारंटियां लागू नहीं हो पातीं। मुफ्तखोरी या रेवडिय़ों का ही नतीजा है कि देश पर करीब 176 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। यह कर्ज पूंजीगत व्यय और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए भी लेना पड़ा होगा! जितना हम पर कर्ज है, उतनी कई देशों की अर्थव्यवस्था भी नहीं होती। देश के सभी राज्य कर्ज में डूबे हैं। यदि कोई ‘सरप्लस’ में होने का दावा करता है, तो झूठ बोल रहा है। देश की जनता को बेवकूफ बना रहा है। दो मुख्य उदाहरणों के जरिए मुद्दे को समझने की कोशिश करते हैं। भारत सरकार की ओर से 81 करोड़ से अधिक लोगों में 5 किलो मुफ्त अनाज प्रति माह बांटा जा रहा है। यह योजना 2028 के अंत तक चलेगी। कोरोना महामारी के कारण यह योजना शुरू करनी पड़ी थी, लेकिन अब तो कोरोना के प्रभाव समाप्त हो चुके हैं। बाजार खुले हैं। आर्थिक गतिविधियां खूब चल रही हैं। फिर भी इतनी आबादी को सरकार ने मोहताज बनाकर क्यों रखा हुआ है? मुफ्त अनाज पर पांच साल में 11.80 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे। दूसरी प्रमुख योजना है-पीएम किसान सम्मान निधि। इसके तहत किसानों को, हर चार माह में, 2000 रुपए दिए जाते हैं। सालाना 6000 रुपए उनके बैंक खातों में डाल दिए जाते हैं। करीब 8-9 करोड़ किसानों में यह राशि बांटी जाती है। इस पर कुल 60,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाने की बात कही जाती है। बहरहाल केंद्र सरकार की ऐसी 100 से अधिक योजनाएं हैं, जिनमें राशि बैंक खातों में जाती है अथवा सबसिडी के तौर पर दी जाती है। ये योजनाएं रेवडिय़ां हैं या मुफ्तखोरी है अथवा जन-कल्याण की श्रेणी में आती हैं, सरकार को इन्हें अलग-अलग परिभाषित करना चाहिए। एक संदर्भ में लाभार्थी और दूसरे में रेवड़ी कैसे हो सकता है?
बिजली, पानी, बस यात्रा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कर्जमाफी आदि सभी कुछ मुफ्त कैसे मुहैया कराया जा सकता है? आखिर पैसा तो देश के औसत करदाता का है। ताजा संदर्भ के लिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के नैतिक साहस की सराहना करनी चाहिए, जिन्होंने अपनी ही पार्टी की कर्नाटक सरकार को, गारंटियों के मद्देनजर, खरी-खोटी सुनाई और आईना दिखा दिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वायदा वह करें, जो बजट के अनुरूप हो और पूरा किया जा सके। यदि गारंटियां ‘खटाखट, फटाफट’ घोषित की जाती हैं, तो राज्य दिवालिया हो सकता है। सरकार नाकाम हो सकती है। वायदे पूरे नहीं किए गए, तो लोग 10 साल तक कांग्रेस की सरकार नहीं चुनेंगे। मल्लिकार्जुन खडग़े ने परोक्ष रूप से राहुल-प्रियंका गांधी की गारंटियों को खारिज किया है, जो लोकसभा चुनाव के बाद ‘खटाखट खटाखट’ मिलनी थी। यदि एक परिवार को एक लाख रुपए सालाना ‘मुफ्त’ में ही मिलना है, तो देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष की यह नसीहत, चेतावनी सिर्फ कांग्रेस सरकारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने महाराष्ट्र और झारखंड कांग्रेस को भी चेताया है कि चुनावों में 5, 6, 7, 8 या 10 गारंटियों की घोषणा न करें। वायदे ऐसे करें, जिन्हें बजट के जरिए पूरा किया जा सके और अंतत: जनता को लाभ और राहत मिल सके। मुफ्तखोरी की यह परंपरा 1970 के दशक से शुरू हुई, जब दक्षिण भारत के राज्यों में रेवडिय़ां बंटने का सिलसिला आरंभ हुआ। अब ऐसा कोई राज्य नहीं है, जिस पर लाखों करोड़ रुपए का कर्ज न हो। भाजपा शासित राज्य भी कर्जदार हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी यह न कहें कि कांग्रेस शासित राज्यों में हालात बदतर हैं। मप्र और उप्र के आंकड़ों पर गौर किया जाए, तो उनकी भी गारंटियों का सच बेनकाब हो जाएगा। महाराष्ट्र सरकार ने जिस ‘लाडली बहना योजना’ की घोषणा की है, उस पर 46,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह लाभार्थी योजना है या मात्र रेवड़ी देकर चुनाव जीतने की कवायद है? बहरहाल, इसे ‘मेरी, तेरी रेवड़ी’ के तौर पर पेश न करें।


