संपादकीय

मस्जिद विवाद, ये बैरिकेड क्यों टूटे

मस्जिद की फाइल पूर्व की कई सरकारों की शिकायत कर रही है, लेकिन अब बुधवार के घटनाक्रम ने बता दिया कि कब और किस मंजिल पर बैरिकेड टूट सकते हैं। विरोध, व्यवस्था, कानून और समाज के बीच खड़ी मस्जिद न तो यहां धर्म की प्रतीक बन कर लड़ाई का सबब बन सकती और न ही यह धार्मिक युद्ध क्षेत्र होना चाहिए। दरअसल मस्जिद का अवैध, अवांछित और गैर जरूरी विस्तार आंखों में धूल झौंकता रहा है, लेकिन मजहब की लाल आंखें हमारी परंपराओं से परे हैं।

 पौंग, गोविंद सागर और कोल डैम में डूबे अब एक मस्जिद के सामने अपनी संवेदना, अपना उबाल प्रकट करने लगे हैं। अब मामला अतिक्रमण से ऊपर कानून के मजहब से और भी ऊपर जा पहुंचा है और जहां एक अवांछित कुरुक्षेत्र संजौली की छाती पर छेद कर गया। यह नजारा किसके मनमाफिक रहा और किसे डरा गया। क्या चोट खाए अमन के लिए पुलिस कर्मियों का घायल होना सबूत नहीं कि कहीं आपसी वैमनस्य के पेड़ हरे हो रहे हैं या कसूर उस बैरिकेड का जो जनाक्रोश की आंधी से टूट गया और हारा तो वहां वो मुसाफिर भी, जो ईंट और पत्थरों के बीच फंसे गारे में पल भर के लिए धंस गया। हमने इस बहाने कुछ बीज बो दिए। कल ये उगेंगे और इस तरह नफरत के बीज फैलेंगे इस धरती पर इससे जो पहले कभी लाल न थी। मसले के कारण अनेक हो सकते हैं, शंकाओं के बादल अनेक हो सकते हैं, लेकिन इस दौर तक हम कैसे पहुंचे, यह देखना होगा। इन अवैध मंजिलों के वारिस वे भी हैं, जो व्यवस्था में रह कर व्यवस्था को कुतर रहे हैं। ये सारी दीवारें मौजूदा सरकार में नहीं चढ़ीं और न ही इसके विरोध में खड़े सभी लोग केवल धार्मिक संगठन थे, लेकिन दरारों पर पांव रखकर हम ऐसे मुद्दों के प्रति न्याय नहीं कर सकते। मस्जिद की फाइल पूर्व की कई सरकारों की शिकायत कर रही है, लेकिन अब बुधवार के घटनाक्रम ने बता दिया कि कब और किस मंजिल पर बैरिकेड टूट सकते हैं। विरोध, व्यवस्था, कानून और समाज के बीच खड़ी मस्जिद न तो यहां धर्म की प्रतीक बन कर लड़ाई का सबब बन सकती और न ही यह धार्मिक युद्ध क्षेत्र होना चाहिए। दरअसल मस्जिद का अवैध, अवांछित और गैर जरूरी विस्तार आंखों में धूल झौंकता रहा है, लेकिन मजहब की लाल आंखें हमारी परंपराओं से परे हैं।

विरोध में समूह भी है और समुदाय भी। समूह यह देख रहा है कि कौन धोखा-कौन फरेब कर रहा है और समुदाय यह देख रहा है कि संप्रदाय क्या कर सकता है या कर चुका है। इन दोनों ही परिस्थितियों के बीच सरकार की भूमिका अहम हो जाती है। जाहिर है सियासत के अपने पैमाने हैं और ये बार-बार हिमाचल को उद्वेलित कर रहे हैं। बाबरी मस्जिद विध्वंस में हिमाचल की शांता कुमार सरकार को भले ही कुर्बान होना पड़ा था, लेकिन यहां के हिंदू बहुसंख्यक समाज ने धर्म के आधार पर इस हुकूमत की वापसी नहीं होने दी थी। बहरहाल अब सियासत का परिदृश्य पहले जैसा नहीं रहा और न ही राष्ट्रीय उद्बोधन। देश में बहुसंख्यकवाद के अलख जिस माहौल को जागृत कर रहे हैं, वहां समुदायों के बीच संवाद की गुंजाइश कम होती जा रही है और इसकी गूंज सोशल मीडिया के हर दायरे में परवान चढ़ चुकी है। इसी परिप्रेक्ष्य में संजौली का सैलाब केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि आने वाले घटनाक्रम को आहूत कर रहा है। कुछ धार्मिक पहचान के शूल आंखों में खटक रहे हैं, तो नए मुद्दों के समीकरण प्रदेश की व्यापारिक गतिविधियों में भी देखे जा रहे हैं। मस्जिद एक पूजास्थल से आगे बढ़ कर अगर किसी शक्ति को प्रमाणित कर रही है या हर मंजिल पर चढ़ता सरिया प्रायोजित हो रहा है, तो परिवेश की चिंताओं को सुलगाने में एक तीर ही काफी है। संजौली का हुजूम पारंगत तथा प्रतिज्ञा के साथ सरकार से चुनौती भरी शिकायत कर रहा है और इसलिए प्रदर्शन के दूसरे दिन बाजार बंद का आयोजन बता चुका है कि मामले को सीधा देखा जा रहा है। ऐसे में प्रदेश सरकार को इस बवाल से बाहर निकलने के लिए कानून की लाठियां लंबी करनी पड़ेंगी, लेकिन भाषा की मर्यादा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे और पुष्ट करने होंगे।

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