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राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांतों का दायरा व्यापक हो

प्रतिस्पर्धी सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं में समन्वय के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति, सैन्य-रुख और भू-राजनीतिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करना एक सार्थक एनएसडी तैयार करने की कुंजी है। रूढ़िवादी मानसिकता वाले सुरक्षा विशेषज्ञ प्रायः तर्क देते हैं कि भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में सुरक्षा मामलों पर आम सहमति पर पहुंचना आसान नहीं होगा और न ही सार्वजनिक रूप से एनएसडी की बारीकियों पर चर्चा करना वांछनीय होगा। शायद यही कारण है कि नीति-निर्माता एक व्यापक एनएसडी नहीं बना पाए हैं और यह बन्द कमरे का मामला बनकर रह गया, जिस पर सत्ताधारी दल की विचारधारा का एकाधिकार होता है। भारत में एनएसडी पर चर्चा में आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए।

सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह देश में राजनीतिक संतुलन बनाए रखने, आर्थिक हितों की रक्षा करने, क्षेत्रीय अखंडता की सुरक्षा सुनिश्चित करने, सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने और घरेलू सुरक्षा वातावरण को सुधारने के लिए दृढ़ संकल्प प्रदर्शित करे। इसके साथ ही, सरकार को प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित संकटों से नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाने चाहिए। सक्षम राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांतों (एनएसडी) का उद्देश्य देश और नागरिकों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है।

केसी पंत की अध्यक्षता वाली ‘टास्क फोर्स’ की सिफारिश पर, राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक शीर्ष सलाहकार निकाय के रूप में 1998 में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद’ (एनएससी) का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते थे। जिसमें वित्त, रक्षा, गृह और विदेश मंत्री शामिल थे। हालांकि, एनएससी ने आज तक एनएसडी का लिखित दस्तावेजीकरण नहीं किया है, जिससे हितधारक अपना अधिदेश प्राप्त कर सकें और सामरिक महत्त्व की रणनीति तैयार कर सकें। एनएसडी अभी तक मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा योजनाओं तक ही सीमित रही है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों और सैन्य रणनीतियों तथा कूटनीति पर अधिक ध्यान केन्द्रित रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्याम सरन द्वारा 2015 में तैयार राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के मसौदे में दीर्घकालिक योजना और निर्णय लेने के लिए पांच प्रमुख क्षेत्रों, जिनमें घरेलू सुरक्षा, बाहरी सुरक्षा, सैन्य तैयारी, आर्थिक सुरक्षा और पारिस्थितिक सुरक्षा शामिल है, की पहचान की गई थी। यह तथ्य है कि कूटनीतिक मामलों और आर्थिक तथा पर्यावरण से जुड़े सुरक्षा के मुद्दों पर एक व्यापक राष्ट्रीय सहमति बन गई है, लेकिन घरेलू सुरक्षा की चिंताएं राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी राजनीति के एजेंडे से ऊपर नहीं उठ पाई हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संवेदनशील रक्षा मामलों पर मतभेद आजकल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में खुले तौर पर उभरकर सामने आ रहे हैं।

प्रतिस्पर्धी सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं में समन्वय के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति, सैन्य-रुख और भू-राजनीतिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करना एक सार्थक एनएसडी तैयार करने की कुंजी है। रूढ़िवादी मानसिकता वाले सुरक्षा विशेषज्ञ प्रायः तर्क देते हैं कि भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में सुरक्षा मामलों पर आम सहमति पर पहुंचना आसान नहीं होगा और न ही सार्वजनिक रूप से एनएसडी की बारीकियों पर चर्चा करना वांछनीय होगा। शायद यही कारण है कि नीति-निर्माता एक व्यापक एनएसडी नहीं बना पाए हैं और यह बन्द कमरे का मामला बनकर रह गया, जिस पर सत्ताधारी दल की विचारधारा का एकाधिकार होता है। भारत में एनएसडी पर चर्चा में आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए। भूमि और समुद्री मार्गों से आने वाले अवैध प्रवासी भारत में शांति और स्थिरता के लिए एक बड़ा ख़तरा है। सुरक्षा बलों द्वारा प्रभावी अवरोधन के बिना रोहिंग्या और बांग्लादेशी अवैध प्रवासी बड़ी संख्या में तलहटी और निचले हिमालयी क्षेत्रों में बस गए हैं। इन क्षेत्रों की जनसांख्यिकी कुछ दशकों में ही बहुत बदल गई है, जिससे घरेलू शांति और सामाजिक संतुलन के लिए गम्भीर ख़तरे पैदा हो गए हैं। चिंता की बात यह है कि इन अवैध प्रवासियों का कोई व्यवस्थित जायजा नहीं लिया जाता है और सुरक्षा एजेंसियों को उनकी संख्या और बसने के स्थानों के बारे में भी ज्ञान नहीं है।

भारत फ्रांस और इंग्लैंड जैसे यूरोपीय देशों से आने वाले शुरुआती चेतावनी संकेतों को नज़रअंदाज नहीं कर सकता है, वहां जनसंख्या नियंत्रण नीति के अभाव में उनकी जनसांख्यिकी में जिस प्रकार का बदलाव आ रहा है, उसमें मूल निवासी अपनी ही मातृभूमि में जातीय और सांस्कृतिक अल्पसंख्यक बनने की पीड़ा झेल रहे हैं। जनसांख्यिकीय मोर्चे पर असहजता और लाचारी के ऐसे संकेत भारत के कुछ हिस्सों में पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। एक सुविचारित जनसंख्या नियंत्रण-नीति को अपनाकर जनसांख्यिकीय और सामाजिक-सांस्कृतिक यथास्थिति को बनाए रखना एनएसडी के समग्र परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक हो गया है।

पूरे देश में विशेषकर, उत्तर-पूर्व और उत्तरी और पश्चिमी भारत के सीमावर्ती राज्यों में, नशीली दवाओं का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है। उचित और पर्याप्त नीतिगत हस्तक्षेप की कमी के कारण नशीली दवाओं की लत में फंसे बेरोजगार युवाओं ने पहले ही बहुप्रचारित ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ को बेअसर कर दिया है। कट्टरपंथी और अलगाववादी तत्व, जो धर्म की स्वतंत्रता की आड़ में वित्तीय प्रलोभन के आधार पर धर्मांतरण और धर्म की गलत व्याख्या करके लोगों को गुमराह कर रहे हैं, सख्त प्रतिबंधों के पात्र हैं। भेदभावपूर्ण और अपमानजनक धार्मिक रीति-रिवाजों और विकृत शिक्षा का घरेलू सुरक्षा परिदृश्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उन्हें धर्म के अंदर से ही सुधारों को बढ़ावा देकर या उचित कानूनी अधिनियमों के माध्यम से बदलने की आवश्यकता है। भारत का लगभग आधा भू-भाग हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आता है, जबकि गर्मियों के महीनों में देश के कई हिस्सों में पर्याप्त पेयजल भी उपलब्ध नहीं होता है। जल-संचयन की कमी के कारण जल-स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं, और भूमिगत जलस्तर प्रतिवर्ष नीचे खिसक रहा है। पानी की कमी दुनियाभर में सभ्यता के अस्तित्व के लिए बड़ा ख़तरा बन चुकी है। जल-संसाधनों का प्रबंधन राष्ट्रीय सुरक्षा हितधारकों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

जन आंदोलनों को गति देने वाले सामाजिक उद्दीपक संक्रामक होते हैं, हम आरक्षण और बेरोजगारी के मुद्दों पर बांग्लादेश में चल रहे जन आंदोलन को नज़रअंदाज नहीं कर सकते। इसलिए, एनएसडी के कार्यक्षेत्र को व्यापक बनाने और परम्परागत विषयों के अतिरिक्त आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी इसमें समाहित करने की जरूरत है।-डॉ. केपी सिंह

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