बेरोजगारी की इंटर्नशिप और शर्तें

बेरोजगारी की इंटर्नशिप का पहला यथार्थ तब सामने आएगा, जब 500 कंपनियों के नाम सार्वजनिक किए जाएंगे। वे कंपनियां किन क्षेत्रों में परचम लहरा रही हैं और अच्छी तरह स्थापित हैं, यह खुलासा भी देश के सामने आना चाहिए। इंटर्नशिप के लिए युवाओं का चयन किस तरह होता है,
बजट का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक प्रस्ताव है-युवाओं की इंटर्नशिप। यह एक व्यापक वोट बैंक भी साबित हो सकता है। यह ऐसा प्रशिक्षण भी साबित हो सकता है, जिससे बेरोजगारी कम होने लगे, लिहाजा रोजगार बढ़ता जाए। इस परियोजना के तहत भारत सरकार 500 बड़ी कंपनियों को छांटेगी। पांच साल के दौरान 4.10 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वायदा किया गया है। कंपनियां हर साल 20 लाख युवाओं का कौशल विकसित करेंगी। इस तरह 5 साल के दौरान कुल एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप के जरिए हुनरमंद किया जाएगा। इंटर्नशिप के दौरान कंपनियां 5000 रुपए प्रति माह का भत्ता देंगी और एकमुश्त 6000 रुपए भी देंगी। बजट में इस कार्यक्रम के लिए 2 लाख करोड़ रुपए का आवंटन रखा गया है। बेरोजगारी से लडऩे और निरंतर रोजगार-सृजन की यह महत्वपूर्ण परियोजना बताई जा रही है। बेरोजगारी सबसे अहम समस्या और चुनौती है, यह आम चुनाव के जनादेश से स्पष्ट हो चुका है। भाजपा को इस बार अकेले ही स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ है। केंद्र में गठबंधन सरकार जारी है। बहरहाल इंटर्नशिप की पात्रता आयु 21-24 साल है। कई और शर्तें लगाई गई हैं, जो व्यावहारिक नहीं हैं। उनके कारण बेरोजगारी उन्मूलन का लक्ष्य अधूरा ही रह सकता है। यह भी गौरतलब होगा। इंटर्नशिप का पहला चरण दो साल का है। यह भी सवाल है कि क्या युवाओं की निरंतरता बनी रहेगी? दूसरा यथार्थ तब सामने आएगा, जब युवा किसी रोजगार का अनुभव तो हासिल कर लेंगे, लेकिन क्या वही कंपनियां उन्हें नौकरी देंगी? सरकार के सामने यह गंभीर चुनौती रही है कि श्रम-गहन क्षेत्रों में निजी निवेश बढ़ नहीं पा रहा है।
दरअसल कंपनियों की ऐसे क्षेत्रों में निवेश की दिलचस्पी ही कम है, लिहाजा नए श्रम की भीड़ बढ़ाने के मद्देनजर कंपनियां नए, हुनरमंद युवाओं को नौकरी क्यों देंगी? कुछ अपवाद हो सकते हैं। बजट में दावा किया गया है कि 2 करोड़ को पहली नौकरी पर सरकार सीधी मदद देगी और युवा के आनंद को साझा करेगी। इस योजना से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को जोड़ा गया है। बजट का फोकस गरीब, युवा, अन्नदाता, नारी यानी ‘ज्ञान’ पर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने आम चुनाव के दौरान इन चार वर्गों को ही चिह्नित किया था। उन्हें ही अपनी चार जातियां बताया था। बजट में युवाओं के रोजगार के लिए सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को 100 करोड़ रुपए तक का कर्ज देने की गारंटी सरकार ने दी है। एमएसएमई में अभी 11.10 करोड़ लोग जुड़े हैं। सरकार ने 2025 तक इनमें 5 करोड़ रोजगार जोडऩे का लक्ष्य रखा है। सवाल फिर दोहरा रहे हैं कि ये रोजगार कारोबारी होंगे अथवा नौकरी के रूप में दिए जाएंगे! इनके अलावा, आधारभूत ढांचे पर बजट में 11.11 लाख करोड़ रुपए के आवंटन का प्रस्ताव है। सरकार का लक्ष्य है कि विभिन्न निर्माण-कार्य होंगे, तो रोजगार का विस्तार भी होगा। ऐसे इंटर्नशिप कार्यक्रम अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा सरीखे विकसित देशों में भी चलाए जा रहे हैं। दरअसल सरकार कोई भी हो, कल्याणकारी परियोजनाओं और सबसिडी मुहैया करा कर भी रोजगार नहीं दे सकती। बेरोजगारी की चुनौती से नहीं लड़ सकती। सरकार को एहसास हो रहा है कि बेरोजगारी को संबोधित करने के लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, लिहाजा इस अभियान में निजी क्षेत्र को जोड़ा जा रहा है। सरकार के आग्रह पर रोजगार और नौकरियां निजी क्षेत्र पैदा करेंगे। बदले में सरकार नियोक्ताओं को सबसिडी देगी। प्रधानमंत्री मोदी की 9 प्राथमिकताएं बजट के लिए तय की गई हैं। मसलन-मैन्यूफैक्चरिंग, सेवा क्षेत्र, रोजगार, कौशल विकास, शहरी विकास, ऊर्जा सुरक्षा, आधारभूत ढांचा, सामाजिक न्याय आदि। रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए इन सभी क्षेत्रों को अच्छा-खासा बजट आवंटित किया गया है। मुद्रा लोन की सीमा भी 10 लाख से बढ़ा कर 20 लाख रुपए कर दी गई है। उसका लक्ष्य भी युवा केंद्रित है। अब यह बजट लागू होने के बाद देखना होगा कि बेरोजगारी की इंटर्नशिप कितनी कारगर साबित होती है। हालांकि यह बात समझी जानी चाहिए कि सभी बेरोजगारों को सरकारी नौकरियां नहीं दी जा सकती। युवाओं के लिए निजी क्षेत्र में भी अवसर टटोलने होंगे। निजी क्षेत्र के बिना बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।



