संपादकीय

बजट में बेरोजगारी-महंगाई से मुक्ति मिले

हालांकि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रीय दावे हैं कि महंगाई की औसत दर 5 फीसदी से कम है, लिहाजा वह नियंत्रण में है, लेकिन 127 रुपए किलो टमाटर मिले और अधिकतर दालें 150 रुपए किलो से अधिक बिक रही हैं, तो इस स्थिति को क्या कहेंगे? क्या ये दाम सस्ती व्यवस्था के सूचक हैं? महंगाई के साथ जमाखोरी और कालाबाजारी कितनी है, शायद बजट में उनका उल्लेख न हो, लेकिन महंगाई एक राष्ट्रीय समस्या है, जिसे बजट में संबोधित किया जाना चाहिए।

 आज तीसरी मोदी सरकार का पहला संपूर्ण, राष्ट्रीय बजट संसद में पेश किया गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अब भी बजट बनाया है। बजट से देश को कई उम्मीदें और अपेक्षाएं हैं। बजट का फोकस क्या होगा, यह बजट को पढऩे के बाद ही स्पष्ट होगा। देश के युवा की अहम समस्या बेरोजगारी है। बेरोजगारी की राष्ट्रीय दर 9 फीसदी से अधिक हो गई है। हालांकि सरकारी आंकड़े कुछ और बयां करते हैं। करीब 80 करोड़ भारतीयों के हाथ में स्थायी रोजगार नहीं है अथवा वे बेरोजगार हैं। मनरेगा का कायाकल्प बहुत जरूरी है, हालांकि पिछले बजट में उसकी राशि घटा दी गई थी। बेरोजगारी से महंगाई और गरीबी जुड़ी हैं। हालांकि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रीय दावे हैं कि महंगाई की औसत दर 5 फीसदी से कम है, लिहाजा वह नियंत्रण में है, लेकिन 127 रुपए किलो टमाटर मिले और अधिकतर दालें 150 रुपए किलो से अधिक बिक रही हैं, तो इस स्थिति को क्या कहेंगे? क्या ये दाम सस्ती व्यवस्था के सूचक हैं? महंगाई के साथ जमाखोरी और कालाबाजारी कितनी है, शायद बजट में उनका उल्लेख न हो, लेकिन महंगाई एक राष्ट्रीय समस्या है, जिसे बजट में संबोधित किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पद को ग्रहण करने से पहले देश को आश्वस्त किया था कि महंगाई पर लगाम कसी जाएगी। औसतन किसान बहुत गरीब है, लिहाजा प्रधानमंत्री ने उनकी आमदनी दोगुनी करने का वायदा किया था। वह अभी तक तो नहीं हुई है, अलबत्ता कुछ प्रयास जरूर किए गए हैं। चर्चाएं जारी हैं कि किसान की सम्मान निधि को 6000 रुपए सालाना से बढ़ाया जा सकता है। भारत ने 48,389 करोड़ रुपए का बासमती चावल निर्यात किया है। गेहूं और अन्य उपजों की स्थिति डांवाडोल रहती है, क्योंकि सरकार की नीतियां बदलती रहती हैं। इतना निर्यात करने वाला किसान अब भी गरीब है, यह विरोधाभासी सवाल है।

इसके मायने हैं कि किसान से औने-पौने दाम पर उपज खरीदी जाती है और फिर सरकारी एजेंसियां उसे महंगे दामों पर बाहर देशों को बेचती हैं। यही घरेलू बाजार में होता है। ‘किसान कार्ड’ की सुविधाओं को बढ़ाया जा सकता है। कुछ सबसिडी भी घोषित की जा सकती है, लेकिन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी पर सरकार कोई ठोस घोषणा करेगी? सरकारी अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर की स्थिति क्या रहेगी? आधारभूत ढांचे और विनिर्माण क्षेत्रों की प्रगति के लिए कितना बजट तय किया जाएगा, यह भी महत्वपूर्ण संभावना है। लघु, सूक्ष्म, मध्यम उद्योगों के लिए सरकार कितना बजट आवंटित करेगी, यह इसलिए अहम है, क्योंकि ये उद्योग कोरोना महामारी के दौरान तालाबंदी की स्थिति में आ गए थे। चूंकि इन उद्योगों में रोजगार की व्यापक संभावनाएं हैं, लिहाजा सरकार इस क्षेत्र का जीर्णोद्धार करना चाहेगी! देश पर करीब 200 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इतना कर्ज क्यों लिया गया और अब भुगतान की स्थिति क्या है, क्या बजट में इसका खुलासा किया जाएगा। बजट की दृष्टि से राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा कितना है, बजट में इसका खुलासा तो किया जाता है, लेकिन ये अपेक्षित औसत में कब आएंगे, देश को इसकी जानकारी भी होनी चाहिए।

बेशक बजट शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, अंतरिक्ष, विशेष अभियानों आदि पर पर्याप्त दिया जाना चाहिए, ताकि हम भावी आपदाओं के लिए पूरी तरह तैयार रह सकें। बजट में औसत नागरिक को आयकर पर छूट पर्याप्त है, लेकिन देश में आर्थिक असमानता की खाई को भरा जाना चाहिए। इसके अलावा, शिक्षा, गृह, निजी ऋणों को बैंकों में अपेक्षाकृत सस्ता किया जाना चाहिए। इन पर ब्याज दरें अब भी काफी हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के विभिन्न आकलनों के मुताबिक, भारत की सालाना आर्थिक विकास दर 7-8 फीसदी है, जो विश्व में सर्वाधिक है। भारत दुनिया में सबसे तेज अर्थव्यवस्था वाला देश है। इसका उल्लेख बजट में भी होगा, लेकिन विकसित बनाम गरीब का इतना गहरा विरोधाभास भारत में क्यों है? हमें उम्मीद है कि बजट के लिए यह सवाल स्वीकार्य नहीं होगा। यह सुखद स्थिति है कि कच्चे तेल के आयात पर खर्च में काफी कमी आई है, क्योंकि हम रूस से तेल खरीद रहे हैं। फिर भी 144 करोड़ की आबादी के लिए बजट सुखद होना चाहिए। प्रतीक्षारत हैं।

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