दीपावली के अवसर पर इस बार एक दीप नशा-विरोधी जंग के नाम

दीपावली केवल दीपों की औपचारिक सजावट या एक दिन के उत्सव का नाम नहीं, बल्कि यह मानवीय चेतना में अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और निराशा पर आशा की शाश्वत विजय का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीक है। सदियों से भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में जहां भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटने की खुशी में घी के दीप जलाकर नगरवासियों ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी, वहीं सिख इतिहास में यह पर्व ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मानव स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस दिन लोग एक-दूसरे को उपहार देते हैं, शुभकामनाएं सांझी करते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाते हैं।
दीपों का बदलता स्वरूप और पर्यावरण चेतना : समय के साथ दीपावली मनाने के तरीकों और साधनों में बड़े सामाजिक एवं तकनीकी बदलाव आए हैं। एक समय था जब ग्रामीण कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के छोटे-छोटे दीए हर घर की दहलीज पर सरसों या तिल के तेल से रोशन होते थे। धीरे-धीरे मोमबत्तियों का दौर आया, फिर बिजली के रंग-बिरंगे छोटे बल्बों वाली लडिय़ों ने उनकी जगह ली और आज के तकनीकी युग में एल.ई.डी. लाइटों, लेजर शो तथा आधुनिक प्रोजैक्शन के माध्यम से घरों और विशाल इमारतों को रोशनी से जगमगाया जाता है।
अमावस्या का घना अंधकार और दीपक की चुनौती : उल्लेखनीय है कि दीपावली काॢतक मास की अमावस्या की घोर अंधेरी रात को मनाई जाती है। हमारे पूर्वजों ने इसी अंधेरी रात को चुनकर हमें यह शाश्वत संदेश दिया कि अंधकार से डरकर बैठने की बजाय उसके सामने मिट्टी का एक छोटा-सा दीपक जलाकर खड़े होना ही वास्तविक मानवीय साहस है। दीपक की छोटी लेकिन अडिग लौ यह साबित करती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा और व्यापक क्यों न हो, वह प्रकाश की एक छोटी-सी किरण का सामना नहीं कर सकता।
आज के पंजाब की त्रासदी-नशों की काली रात : लेकिन पंजाब की वर्तमान वास्तविकता हमारी आत्मा को झकझोर देती है। इस पवित्र धरती को आज नशों के काले अंधकार ने चारों ओर से घेर लिया है। सिंथैटिक ड्रग्स, कैमिकल नशों और दवाइयों के दुरुपयोग के जहरीले प्रभाव से पंजाब के हजारों घरों के चिराग दिन-दिहाड़े बुझ रहे हैं। गांवों की सड़कों और गलियों से जवान बेटों की अर्थियां उठ रही हैं और माताओं की गोद सूनी हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और पंज फाऊंडेशन के अध्ययन के अनुसार, एक दशक में 1,100 से अधिक दर्ज ओवरडोज से मौतें सामने आई हैं, जबकि जमीनी वास्तविकता में असमय मौत का शिकार हुए युवाओं की संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि नशों का दानव स्कूल जाने वाले बच्चों तक को अपनी चपेट में ले रहा है। इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक और भयावह पहलू यह है कि इस अंधकार का शिकार केवल वे युवा नहीं बन रहे, जो भटकाव या मजबूरी में नशे की दलदल में फंस गए हैं, बल्कि यह काला माफिया उन निडर लोगों के जीवन के दीप भी रक्तपात के जरिए बुझा रहा है, जो इस अंधकार को चुनौती देने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना मैदान में उतरते हैं।
इस संदर्भ में हाल ही में मानसा में हुई हिंसक घटना पूरे पंजाब की अंतरात्मा पर एक गहरा घाव है। 13 अक्तूबर, 2026 को मानसा में ‘नशा रोको, रोजगार दो’ अभियान के प्रमुख कार्यकत्र्ता परविंदर सिंह झोटा की मैडीकल स्टोरों पर अवैध रूप से बेचे जा रहे नशीले कैप्सूलों और गोलियों का फेसबुक लाइव के माध्यम से पर्दाफाश करते समय दिन-दिहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। परविंदर झोटा कोई निजी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, वह तो पंजाब के बुझते हुए चिरागों को बचाने के लिए नशा तस्करों और कालाबाजारियों के गठजोड़ के सामने एक प्रकाश स्तंभ बनकर खड़े थे। इसी प्रकार पंजाब के विभिन्न गांवों में जब भी गांव स्तर पर नशा विरोधी समितियों या जागरूक पंचायतों ने नशा तस्करों पर अंकुश लगाने का प्रयास किया, तो उन पर भी मुक्तसर और पटियाला जिलों की तरह जानलेवा हमले हुए और समाजसेवियों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी।
इस दीपावली एक दीप न्याय और संघर्ष के नाम : ऐसे गंभीर माहौल में क्या हमारी दीपावली केवल मिठाइयां खाने और पटाखे चलाने तक सीमित रह सकती है? जिन घरों के आंगन में चिताएं जल रही हों, वहां रंग-बिरंगी लाइटों का दिखावा हमें शोभा नहीं देता। इसलिए आइए, इस बार दीपावली मनाते हुए जहां हम आपसी खुशियां और प्रेम-प्यार की शुभकामनाएं सांझी करें, वहीं अपने घर की दहलीज पर एक विशेष दीप उन परिवारों के लिए भी जलाएं, जो नशों के काले अंधकार में अपने प्रियजनों को खो चुके हैं और उन युवाओं की आत्मिक शांति के लिए भी, जो असमय मृत्यु का शिकार हुए हैं। एक दीप परमिंदर सिंह झोटा जैसे उन सभी संघर्षशील योद्धाओं की पवित्र स्मृति में जलाएं, जिन्होंने पंजाब के भविष्य को बचाने के लिए अपना खून बहाया।
यह दीप केवल मिट्टी और तेल से जुड़ी एक रस्म नहीं होगा, बल्कि नशों के अंधकार के विरुद्ध पंजाबियों की अटूट एकजुटता, सामाजिक संघर्ष में डटे रहने के संकल्प और हर बुझते हुए चिराग को फिर से रोशन करने का दृढ़ प्रण होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने पहले ही 31 दिसम्बर, 2029 तक भारत को नशा मुक्त बनाने के साथ-साथ पंजाब को भी नशा मुक्त करने का संकल्प लिया है। यह दीप उस राष्ट्रीय मिशन और संकल्प का भी प्रतीक बनेगा।आइए, अंधकार को कोसने की बजाय नशा-मुक्त पंजाब का दीप जलाकर अमावस्या की काली रात को चुनौती दें। इस दीपावली संकल्प लें कि हम अपने पंजाब को नशा-मुक्त, अपराध-मुक्त और सुरक्षित बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे, क्योंकि पंजाब को केवल रोशनी से सजे घर नहीं, बल्कि खुशहाल परिवार, सुरक्षित युवा और नशे से मुक्त भविष्य चाहिए।-केवल सिंह ढिल्लों



