संपादकीय

सीमित चुनावों के बड़े संकेत

विधान परिषद के चुनावों में कांग्रेस ‘बड़े शून्य’ के धब्बे से बच गई। बुधवार देर रात उसने नागपुर स्नातक सीट जीत कर सभी को चौंका दिया। नागपुर की जीत ‘प्रतीकात्मक’ है, क्योंकि यहां आरएसएस का मुख्यालय है और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी यहां से सांसद हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस भी नागपुर की एक सीट से विधायक हैं। क्या नागपुर में स्नातक युवाओं पर संघ परिवार का मानसिक और नैतिक प्रभाव कम हुआ है? उप्र में प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में शिक्षक और स्नातक सीटें समाजवादी पार्टी ने जीती हैं। इस सीट पर प्रधानमंत्री की सांसद के तौर पर जीत का अंतर भी काफी कम हुआ था, लिहाजा यह भाजपा की नई चिंता होनी चाहिए कि शिक्षक और स्नातक जैसा शिक्षित वर्ग क्या भाजपा से विमुख हो रहा है? छिटक रहा है? लखनऊ केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का चुनाव क्षेत्र है और गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह-गढ़ है। लखनऊ में भाजपा की पराजय हुई है और गोरखपुर में ‘दूसरी वरीयता’ के स्तर पर मात्र 307 मतों से जीत पाई है। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) भी भाजपा का गढ़ है। वहां से भी सपा ने जीत हासिल की है। उप्र में मार्च, 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। बेशक विधान परिषद के चुनाव ‘सीमित’ होते हैं, फिर भी हजारों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। यह भी जनादेश से कमतर नहीं माना जा सकता। कमोबेश इनके नतीजों से स्पष्ट संकेत मिलते हैं, लिहाजा दल सबक भी ले सकते हैं। उप्र में आम विधानसभा चुनाव से पहले ही समीकरण बदलते लग रहे हैं। यदि सपा-कांग्रेस ने वाकई गठबंधन में चुनाव लड़ा, तो नतीजे ‘अप्रत्याशित’ भी हो सकते हैं! अलबत्ता विधान परिषद की कुल 28 में से 16 सीटें भाजपा ने जीती हैं, लिहाजा संतोष किया जा सकता है। यह जीत भाजपा-एनडीए की साझा जीत है। उप्र में कुल 11 सीटों में से भाजपा के हिस्से 6 और सपा के हिस्से 5 सीटें आई हैं। भाजपा पिछले चुनाव की तरह ही है, लेकिन सपा ने 2 सीटों की बढ़त बनाई है, लिहाजा संकेत स्पष्ट हैं कि भाजपा के सामने चुनावी चुनौतियां हैं। जनादेश इतना आसान, सहज, सरल नहीं होगा। सबसे चौंकाऊ नतीजा यह रहा है कि कर्नाटक में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है।

सभी चारों सीटों पर भाजपा-जद (एस) का कब्जा हो गया है। कर्नाटक में कांग्रेस सत्तारूढ़ है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ‘चुनावी सियासत’ के चाणक्य माने जाते रहे हैं। बेंगलुुरु में पुट्टन्ना परिषद की शिक्षक वर्ग सीट से 5 बार निर्वाचित हो चुके हैं और परिषद के उपाध्यक्ष भी रहे हैं, लेकिन इस बार वह सीट जद-एस ने छीन ली है। शेष तीनों सीटों पर भाजपा विजयी रही है। यह 2028 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ‘बदलाव का संकेत’ है। महाराष्ट्र में भाजपा-महायुति दावा कर रहे थे कि वे पांचों सीटों पर ‘क्लीन स्वीप’ करेंगे, लेकिन ‘बुजुर्ग चाणक्य’ शरद पवार और कांग्रेस ने तीन सीट जीत कर तमाम समीकरण बदल दिए और सत्ता के दावे ध्वस्त कर दिए। भाजपा-शिवसेना (शिंदे) के हिस्से 1-1 सीट ही आई। बिहार में एनडीए ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन वे प्रशांत किशोर की ‘जनसुराज पार्टी’ की एक सीट पर जीत को रोक नहीं पाए। बहरहाल सबसे संवेदनशील राज्य उप्र रहा, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सनातन, श्रीराम, माफिया, बुलडोजर आदि के जरिए आक्रामक प्रचार करने में जुटे हैं। विपक्ष में सपा-कांग्रेस की सीटें अभी तय नहीं हो पाई हैं। तीसरे पक्ष के तौर पर ओवैसी मुसलमानों को लामबंद करके अपनी पार्टी का खाता खोलने में जुटे हैं। उप्र विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। यह चुनाव भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता की ही सरपरस्ती में हुआ है। जो परिणाम सामने हैं और जिस तरह विपक्ष ने जीत हासिल की है, उससे ‘वोट चोरी’ का जुमला अब छोड़ देना चाहिए। यदि मनमर्जी की मतदाता सूची बनाई जा सकती है, तो कर्नाटक सरकार भी कर सकती थी और कुछ सीटें जीत सकती थी, लेकिन ऐसा संभव नहीं होता। ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उछालने के बाद विपक्ष और खासकर कांग्रेस सभी चुनाव हारी है, लेकिन अप्रत्याशित जीत भी दर्ज की गई हैं।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button