‘मां-बाप’ को तो बख्श दें

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने एक जनसभा के मंच से लगभग चीखते हुए कहा-‘मोदी तो क्या, मोदी का बाप भी जाएगा।’ साफ है कि प्रधानमंत्री मोदी को गाली दी गई है। प्रधानमंत्री के ‘दिवंगत’ माता-पिता को अपशब्दों और उपहास का पात्र बनाया जाता रहा है। यह कौन-सी राजनीतिक मर्यादा और नैतिकता है? खडग़े और उनकी पार्टी प्रधानमंत्री मोदी की धुर विरोधी है और उन्हें सत्ता से बाहर करने पर आमादा और आंदोलित हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के मां-बाप का भी अपना सम्मान है। परिवार का सम्मान है। किसी को भी गाली देकर राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते। सत्ता पर किसी का भी पुश्तैनी अधिकार नहीं है। जो जनादेश है, उसी के मुताबिक सत्ता भी तय होती है। कांग्रेस को भी यह लोकतांत्रिक यथार्थ स्वीकार करना पड़ेगा। हमारी संस्कृति में ‘दिवंगत’ दुश्मन के लिए भी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। कमोबेश 85 वर्षीय खडग़े इस सांस्कृतिक मर्यादा और चरित्र को जानते होंगे! वह अत्यंत वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, ऐसे शख्स का मानसिक संतुलन कैसे बिगड़ सकता है? यदि वह एक आम कार्यकर्ता या व्यक्ति के कथन पर बौखला सकते हैं और देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के ‘बाप’ को गाली दे सकते हैं, तो उन्हें सभी पद त्याग कर ‘राजनीतिक संन्यास’ ले लेना चाहिए। कमोबेश वह सार्वजनिक जीवन के योग्य नहीं रहे। जनसभा में से एक व्यक्ति ने कहा था कि जब तक विद्रोह नहीं होगा, तब तक मोदी जाने वाले नहीं हैं। इस पर खडग़े उत्तेजित क्यों हो गए? प्रधानमंत्री के पिता को गाली क्यों दे दी? सीधा-सा सवाल है। खडग़े ने गुजरात चुनाव के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी को ‘100 सिर वाला रावण’ करार दिया था। चुनाव नतीजे देश के सामने हैं। यह लोकतंत्र की भाषा भी नहीं है। भारत ‘केला गणतंत्र’ देश नहीं है। लोकतंत्र में इस तरह न तो किसी को सत्ता के बाहर किया जा सकता है और न ही किसी गालीबाज को सत्ता हासिल हो सकती है। इस तरह कांग्रेस के बड़े नेता ही पार्टी की बर्बादी पर तुले हैं।
ऐसे ही बड़े नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को राक्षस, यमराज, भस्मासुर, सांप, बिच्छू, बंदर, अनपढ़, चायवाला आदि अपशब्दों से अपमानित करने की कोशिशें की थीं। उनकी गरीबी का मजाक उड़ाया था। मोदी को ‘मौत का सौदागर’ तक सोनिया गांधी ने कहा था। गुजरात में 1995 के बाद कांग्रेस विधानसभा और लोकसभा चुनावों में लगातार ‘पराजित पार्टी’ रही है। कांग्रेस प्रवक्ता एवं पैरोकार इन गालियों के संदर्भ में दलीलें देते रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी ‘जर्सी गाय’, ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’, ‘युवराज’ सरीखे अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। तो क्या कांग्रेस अब बदले की राजनीति करेगी और उसी के सहारे सत्ता हासिल करेगी? कांग्रेस ही इस सवाल का जवाब दे सकती है अथवा आत्मचिंतन कर सकती है, लेकिन हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि मोदी ने वे शब्द तब कहे थे, जब वह प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि संसदीय चुनाव के लिए ‘प्रधानमंत्री उम्मीदवार’ जरूर घोषित किए गए थे। हम मोदी के अपशब्दों की भी भत्र्सना करते हैं, उन्हें खारिज करते हैं। राजनीति में एक भी अपशब्द की गुंजाइश नहीं है। वह वैचारिक और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता है, कट्टर दुश्मनी नहीं है, क्योंकि सदन में साथ-साथ बैठ कर देश और राज्य के लिए काम करना है। मोदी द्वारा बोले गए शब्द भी लोकतंत्र पर धब्बों की तरह चिपक गए हैं। अब गौरतलब यह है कि कांग्रेस 1 नवंबर को दिल्ली के ‘रामलीला मैदान’ में रैली करने पर आमादा है। पार्टी 10 लाख लोगों की भीड़ की हुंकार भर रही है। मैदान की क्षमता 58-60,000 लोगों की है। वहां 1 लाख तक की भीड़ ठूंसी जा सकती है। अंदेशा यह है कि उस रैली में राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खडग़े ने किसी विशेष स्थल तक ‘मार्च’ करने का आह्वान किया, तो राजधानी अस्त-व्यस्त हो जाएगी। एक लाख का हुजूम भी सडक़ों पर बिखर गया, तो प्रधानमंत्री आवास-दफ्तर, चुनाव आयोग मुख्यालय, गृहमंत्री का आवास, मुख्य चुनाव आयुक्त का आवास, संसद भवन, सर्वोच्च अदालत सरीखे अति महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील स्थल भी ‘सुरक्षित’ नहीं माने जा सकते। उन स्थितियों में पुलिस, सुरक्षा बल भीड़ को नियंत्रित करेंगे या बल-प्रयोग भी किया जाएगा? लिहाजा कांग्रेस को भी जिम्मेदार दल होना चाहिए।



