आलोचना से क्यों घबराता है समाज? लोकतंत्र और असहमति के बीच का रिश्ता समझाती है यह बहस

किसी भी लोकतांत्रिक समाज में आलोचना जरूरी है। आलोचना का समाज से गहरा और गतिशील संबंध है। यह केवल कमियां निकालना भर नहीं होकर मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है। किसी समाज, उसकी तात्कालिक परिस्थितियों और जीवन मूल्यों के मध्य संबंधों को आलोचना ही परिभाषित करती है। इस तरह वह समाज को सचेत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आलोचना समाज को एक स्वयंभू सत्ता नहीं मानकर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति जवाबदेह मानकर चलती है। इस जवाबदेही से नैतिक और सामाजिक मूल्य बनते हैं। आलोचना के बिना समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरे की स्थिति बनती है।
शिक्षा का प्रयोजन मनुष्य में प्रश्न पैदा करना होता है, प्रश्न केवल बाहरी व्यवस्थाओं, दर्शन और राजनीति के बारे में ही नहीं होते, स्वयं मनुष्य के बारे में भी होते हैं। मैं कौन हूं, इसी प्रश्न से सभी प्रश्न शुरू होते हैं। दूसरों और सभ्यता के बारे में सभी सवाल दरअसल मनुष्य की वास्तविक स्थिति की पहचान से जुड़े होते हैं। जहां एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में सहिष्णुता का विकास आवश्यक है, वहीं एक शिक्षित समाज का मूल्यांकन उसकी आलोचना को पचाने की क्षमता से होना चाहिए। कबीरदास निंदक के स्वभाव को निर्मल करने वाला बता गए हैं। निंदा यहां आलोचना के अर्थों में है, जिससे मनुष्य का स्वभाव सम रहता है।
साहित्य अपनी संस्कृति और समाज से ही संस्कार ग्रहण करता है। क्या एक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के रूप में हमारे भीतर रचनात्मक आलोचना के लिए जगह निरंतर कम नहीं होती गई है? आभासी समाज ने औपचारिक तारीफ के लिए जैसा माहौल बनाया है, क्या उसी अनुपात में हम आत्मालोचन के प्रति असहिष्णु नहीं होते गए हैं? व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के लिए आत्म-मूल्यांकन सबसे बुनियादी आवश्यकता रहा है। आलोचना इस मूल्यांकन के लिए आधार का काम करती रही है। आलोचना की सार्थकता समाज को निरंतर प्रश्नों के लिए तैयार रहने में है। जब कोई समाज अपनी व्यवस्था को अंतिम मान लेता है, तो वह मानवीय सत्ता पर स्वयंभू सत्ता बनने की कोशिश करता है।
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रचनात्मक आलोचना हमें बताती है कि कोई सत्य अंतिम नहीं होता और कोई व्यवस्था मनुष्य से बड़ी नहीं हो सकती है। आलोचना इस बुनियादी चीज को केंद्र बनाकर चलती है कि मानव प्राथमिक है और मानव में निरंतर सुधार किया जा सकता है और उसकी क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है। आलोचना हमारी दृष्टि को ही विस्तृत नहीं करती, वह हर आवाज को सुने जाने लायक बनाकर मानवीय गरिमा की भी रक्षा करती है। शत्रुता और वैचारिक टकराव के अंतर की समझ हममें होनी चाहिए। मजबूत व्यक्ति और समाज आलोचनाओं से तपकर ही निकलते हैं। इसीलिए समाज में बड़प्पन की एक पहचान दूसरे को बराबरी का दर्जा देना भी रहा है।
किसी बातचीत को वक्ता और श्रोता मिलकर मुकम्मल बनाते हैं, अन्यथा वह भाषण मात्र होकर रह जाती है। किसी समाज के बौद्धिक, मानसिक और भौतिक विकास के लिए उसकी सामूहिक चेतना में आलोचना की स्वीकार्यता जरूरी है। आलोचना ही समाज को जड़ होने से बचाती है। इतिहास गवाह है कि समाज के सभी सुधार उसकी खामियों पर की गई टिप्पणियों से ही शुरू हुए हैं।
स्वस्थ आलोचना राजनीति और प्रशासन को ही नहीं, किसी समाज की शक्तियों के दुरुपयोग को भी सीमित करती है। कला ने सदैव मनुष्य को केंद्र में रखते हुए व्यवस्थाओं के अमानवीयकरण को निशाना बनाया है। इसलिए वह हर युग में सामाजिक आलोचना के लिए बड़ा हथियार रही है। जब हम अपनी दृष्टि में दूसरे की दृष्टि भी मिलाते हैं, तो सदैव कुछ अधिक देखने-समझने में समर्थ होते हैं। मगर क्या हम इन मायनों में एक लोकतांत्रिक समाज बन पाए हैं? बोलने की आजादी को हम केवल अपने बोलने तक सीमित करते हैं, दूसरे के बोलने को नहीं। मनुष्य निरपेक्ष प्राणी नहीं है, कोई भी स्वतंत्रता दूसरे को स्वतंत्र किए बिना स्वयं बंदिश बन जाती है। स्वतंत्रता के अर्थ में दूसरे की स्वतंत्रता अनिवार्य रूप से निहित है। उसके बिना स्वतंत्रता का हर दावा झूठा होता है।
पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि आलोचना को लगातार शत्रुता की तरह परिभाषित किया जाने लगा है। किसी के कुछ भी कहने को व्यक्तिगत प्रश्न बनाकर छोड़ दिया जाता है। संबंध व्यक्ति से हो, परिवार से या राजनीति और कानून से। किसी के साथ कुछ घटता है, तो उस पर सहानुभूतिपूर्वक सोचे बिना, पक्ष-प्रतिपक्ष को जाने बिना तुरंत आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। हर मुद्दे को किसी और खेमे का बताकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब भी कोई संकट आता है, तब उसके बारे में संवाद करके कोई हल खोजने के बजाय निरर्थक बहस शुरू हो जाती है। ये बहस किसी समाधान की इच्छा में नहीं चलती है। ये मुद्दों से ध्यान हटाने भर के लिए होती हैं। ऐसे प्रयत्न सत्ता और शासन सदैव से करते रहे हैं, लेकिन किसी समाज के लिए यह एक विकृत मानसिकता बन जाती है। जब किसी समाज में असहमति की जगह नहीं रहती तो सहमति एक मूल्य या जीवन-दर्शन नहीं रहकर विवशता बनकर रह जाती है।
दरअसल, कोई भी प्रश्न व्यक्तिगत नहीं होता। वह किसी व्यक्ति के माध्यम से आकार लेता है, इसलिए शुरुआत में वह व्यक्तिगत लगता है। मगर हर व्यक्तिगत प्रश्न आखिर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्न ही होता है। जब कोई समाज व्यक्तिगत आलोचना के बजाय अपनी भूमिका को मूल्यांकित करने लगता है, तभी वह सच्चे अर्थों में समाज कहलाता है। समाज अगर एक ही प्रकार के मूल्यों को मानने वाले लोगों से बना समुदाय है, तो समाज के लिए जरूरी है कि व्यक्ति की समस्याओं और संकटों का अपने स्तर पर समाधान करने की कोशिश करे। यह तभी संभव होगा जब समाज में संवाद और आलोचना के लिए जगह बनेगी। सार्वजनिक संवाद की संभावना के सिकुड़ने पर धीरे-धीरे संस्कृति और परंपरा जीवंत रहने के बजाय रीति-रिवाज का रूप ले लेते हैं। किसी समाज में आलोचना की गुंजाइश खत्म होने पर वह समाज बौद्धिक रूप से जर्जर होने लगता है। आलोचना का जीवंत रहना समाज के स्वास्थ्य और उसकी संस्कृति की जीवंतता की बुनियादी शर्त है।



