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डिजिटल मायाजाल और क्रिएटर भ्रम

जो मात्र 4 प्रतिशत चैनल इस यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम (वाईपीपी) में शामिल हो भी जाते हैं, उनमें से भी अधिसंख्य केवल 1500 से 15000 रुपए प्रति माह ही कमा पाते हैं, जो मूलभूत खर्चों के लिए भी अपर्याप्त है। हालांकि कुछ चैनलों की पूर्णकालिक आय 3 लाख रुपए प्रति माह अवश्य है, किंतु ऐसे चैनल बहुत कम हैं…

सोशल मीडिया मंचों से धनार्जन का झूठ देश-दुनिया के पूरे समाज में इस प्रकार फैला कि दुनिया के 8 अरब 30 करोड़ लोगों में से 5 अरब 9 करोड़ लोग अपने-अपने वीडियो बनाकर ऐसे मंचों पर प्रसारित कर रहे हैं। ऐसा करने की प्रक्रिया में मोबाइल फोन उपकरण बनाने वाली कंपनियां, मोबाइल फोन में लगने वाले छोटे-बड़े कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियां, फोन तथा कलपुर्जों का कच्चा माल उत्खनित, उत्पादित करने वाली कंपनियां, इंटरनेट संचार प्रणाली स्थापित-प्रसारित करने वाली कंपनियां, इन कंपनियों का विज्ञापन करने वाले सेलेब्रिटीज यानी नामी-गिरामी व्यक्ति और अंतत: ऐसी कंपनियों को धंधा करने की अनुमति देने वाली विभिन्न देशों की सरकारें तथा उनके बड़े पदों पर बैठे पदाधिकारी तो खूब धनार्जन कर रहे हैं, सुख-सुविधाओं में जीवन व्यतीत कर रहे हैं और दुनिया में उपलब्ध हर प्रकार का ऐश-ओ-आराम भोग रहे हैं, पर लगभग 5 अरब 9 करोड़ लोगों को झांसे, भ्रम और उम्मीद से बांधकर उन्हें वास्तविक जिंदगी में दु:ख-दुविधाओं में ही धकेल रहे हैं। ऐसे लोगों में से 5 अरब 1 करोड़ या 3 करोड़ लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं। यानी वीडियो बनाने व अपलोड करने में सक्षम फोन। कुल मोबाइल कनेक्शन/सब्सक्रिप्शन की संख्या 9 अरब से अधिक है, क्योंकि कई व्यक्तियों या व्यावसायिक संस्थानों के पास एक से अधिक सिम/मोबाइल कनेक्शन होते हैं। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर अपने-अपने वीडियो बनाकर डालने तथा फिर उनके वायरल होने की उम्मीद में इतने लोगों का अधिकांश समय मोबाइल फोन या कंप्यूटर की स्क्रीन्स पर आंखें टिकाए हुए व्यतीत हो रहा है। परिवार, समाज, गली, मोहल्ले में लोगों के बीच परस्पर संवाद, बातचीत, मेल-मिलाप और रामा-रूमी सब खत्म हो चुका है। लोगों को डिजिटल नशा देकर बुरी तरह भ्रमित कर दिया गया है। उन्हें अपनी प्राकृतिक पहचान भी नहीं रही।

उन्हें ये तक याद नहीं है कि उन्हें एक दिन इस दुनिया से चले जाना है। कोरोना ग्रस्त 2019 से लेकर 2022 तक इस दुष्प्रवृत्ति ने ऐसे पांव पसारे कि अब यह दुनिया के हर उस व्यक्ति के सिर पर एक चिकित्साहीन रोग बनकर बैठ चुकी है, जिसके पास स्मार्ट फोन और फोन पर इंटरनेट है। विश्व के देशों की सरकारों ने अपने-अपने नागरिकों को मोबाइल फोन रखने एवं उस पर इंटरनेट की सेवा लेने के लिए विवश कर दिया है। जो व्यक्ति मास्टर फोन और फोन द्वारा चलने वाली इंटरनेट सेवाओं का उपयोग करने का इच्छुक नहीं है या जो मास्टर फोन व इंटरनेट के आगमन से पहले की नागरिक सेवाओं और सुविधाओं का उपयोग करना चाहता है, उसके लिए अब क्या विकल्प बचा है? संभवत: कुछ भी नहीं। क्या वास्तव में डिजिटल दुनिया साधारण नागरिकों एवं मनुष्यों के भले के लिए आरंभ की गई है? क्या ऐसी दुनिया का विस्तार वास्तविक रूप में सामान्य जनों के लिए हो रहा है? डिजिटल व्यवसाय के आरंभ से लेकर अंत और निम्न से लेकर उच्च स्तर की स्थितियां देखने पर तो यही सत्य सम्मुख दिखाई दे रहा है कि दुनिया के देशों के ऐसे व्यावसायीकरण से एलन मस्क, अंबानी एवं अडाणी जैसे लोग ही अत्यधिक धनार्जन कर रहे हैं। ऐसे ही उद्योगपतियों की भांति अन्य कुछ हजार उद्योगपति, कुछ राजनेता, कुछ अधिकारी-पदाधिकारी, विभिन्न क्षेत्रों के कुछ प्रसिद्ध व्यक्ति ही डिजिटल कारोबार की प्रगति में विशाल लाभार्थी बनकर उभर रहे हैं। डिजिटलीकरण के पूरे चक्र में आम आदमी तो एक असहाय ग्राहक, खरीददार, उम्मीदवार और अंतत: एक शोषित की ही भूमिका में दिखाई देता है। इस परिस्थिति में सामान्य जन एक खरखराती, बजबजाती और निर्दयी व असंवेदनशील मशीन की तरह हो चुके हैं, जो अपने जैसे सुदूर दूसरे-तीसरे देशों में रह रहे मशीनी लोगों यानी मशीनी मुर्दों के बीच वायरल, फेमस होने की मशीनी इच्छा से भरे हुए हैं।

इक्कीसवीं सदी के इस दौर में जिस तकनीकी क्रांति को मानवीय स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम बताकर प्रचारित किया गया, वही आज मानवीय संवेदनाओं, आत्मीय रिश्तों और आत्म-विवेक के क्षरण का कारण बन रही है। स्मार्टफोन और सस्ते डेटा के कॉकटेल ने पूरी मानव आबादी को एक ऐसी अंतहीन और अदृश्य दौड़ में झोंक दिया है जहां हर व्यक्ति निर्माता और उपभोक्ता दोनों बनने के भ्रम में जी रहा है। इस भ्रम में लोग ये भी भूल चुके हैं कि यदि सभी कंटेट क्रिएटर्स बन जाएंगे तो उसका दर्शक और श्रोता कौन होगा! क्योंकि सभी लोग यहां-वहां से कट-कॉपी करके कुछ भी क्रिएट तो करना चाहते हैं, पर दर्शक नहीं बनना चाहते। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसने आम नागरिक को ही एक उत्पाद में बदल दिया है। क्रिएटर इकोनॉमी का जो सुनहरा सपना दुनिया भर के युवाओं को दिखाया जा रहा है, वह असल में टेक-दिग्गजों द्वारा बुना गया एक ऐसा आर्थिक चक्रव्यूह है जिसमें पूंजी का प्रवाह हमेशा ऊपर की ओर होता है। उपकरण बनाने वाली कंपनियां हर साल नए मॉडल पेश कर अरबों का राजस्व जुटाती हैं, टेलीकॉम ऑपरेटर डेटा प्लान बेचकर अपनी तिजोरियां भरते हैं और एल्गोरिदम नियंत्रित करने वाले प्लेटफॉम्र्स विज्ञापनों से मनमाना मुनाफा कमाते हैं। दूसरी ओर, इस पूरी व्यवस्था की नींव में खड़ा आम इनसान अपनी अमूल्य ऊर्जा, समय, निजता और मानसिक शांति को दांव पर लगाकर दिन-रात वीडियो बनाने में जुटा है। उसे लगता है कि एक दिन उसका कोई वीडियो वायरल होगा और उसकी किस्मत बदल जाएगी। परंतु इस डिजिटल जुए में जीत हमेशा प्लेटफॉम्र्स और पूंजीपतियों की होती है, जबकि आम क्रिएटर केवल उम्मीद के सहारे शोषण का शिकार बनता है।

क्रिएटर अर्थव्यवस्था का वास्तविक गणित जितना आकर्षक दिखता है, धरातल पर उसकी स्थिति उतनी ही भयावह और निराशाजनक है। गोल्डमैन सैच्स और प्यू रिसर्च जैसे वैश्विक संस्थानों के आंकड़ों के अनुसार, यूट्यूब पर करोड़ों सक्रिय चैनल मौजूद हैं, लेकिन मोनेटाइजेशन के मामले में स्थिति बेहद चिंताजनक है। प्लेटफॉर्म के कुल सक्रिय चैनलों में से केवल 4 से 4.3 प्रतिशत चैनल ही 1000 सब्सक्राइबर्स और 4000 घंटे के वॉच टाइम की बुनियादी शर्तों को पूरा कर पाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि 95.7 प्रतिशत से अधिक चैनल विज्ञापनों से एक रुपया भी कमाने की पात्रता हासिल नहीं कर पाते। जो मात्र 4 प्रतिशत चैनल इस यूट्यूब पार्टनर प्रोग्राम (वाईपीपी) में शामिल हो भी जाते हैं, उनमें से भी अधिसंख्य केवल 1500 से 15000 रुपए प्रति माह ही कमा पाते हैं, जो मूलभूत खर्चों के लिए भी अपर्याप्त है। हालांकि कुछ चैनलों की पूर्णकालिक आय 3 लाख रुपए प्रति माह अवश्य है, किंतु ऐसे चैनल कुल सक्रिय क्रिएटर्स का केवल 0.25 प्रतिशत से भी कम (अर्थात प्रति 1000 में सिर्फ 2 या 3) हैं। आय के संदर्भ में विभिन्न मंचों की तुलनापरक स्थिति भी उत्साहवद्र्धक नहीं है।

इंस्टाग्राम पर डायरेक्ट एड-रेवेन्यू मॉडल अत्यंत सीमित है, जहां 91 प्रतिशत क्रिएटर्स 1 से 10 हजार फॉलोअर्स वाले नैनो-इन्फ्लुएंसर्स हैं, जिन्हें कोई नियमित वित्तीय लाभ नहीं मिलता। केवल शीर्ष 5 से 8 प्रतिशत क्रिएटर्स ही ब्रांड स्पॉन्सरशिप, रील्स बोनस या एफिलिएट मार्केटिंग द्वारा धनार्जन कर पाते हैं। टिकटॉक पर भी क्रिएटर फंड का पे-आउट ढांचा प्रति 1000 व्यूज पर बेहद कम (0.40 से 1.00 डॉलर) है, जिससे 10 लाख व्यूज पर मात्र 400 से 1000 डॉलर ही मिल पाते हैं। यहां भी वित्तीय सफलता के लिए सीधे ब्रांड डील्स या लाइव स्ट्रीमिंग का सहारा लेना पड़ता है।

विकेश कुमार बडोला

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