युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व!

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के खिलाफ आवाज उठा दी है। जब-जब छात्र राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब यह सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? जो राजनीतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भत्र्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वह चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आह्वान पर कूदने वाले छात्र, जिन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूदने वाले छात्र। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताजा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है और सरकार आंदोलन का हल कैसे निकाले?
रोचक बात यह है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाए, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करें, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा लें। मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्ण विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।
अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाएंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तिहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्राय: ऐसे नौजवानों में सामाजिक सरोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाए रखा हो। जब तक मैं कॉलेज में पढ़ता था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बंटा था। मेरे पिता, जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ूं और नौकरी करूं, जबकि मेरी मां, जो कि संस्कृत की विद्वान थीं, वह छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रही थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गांवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया।
1974 के उस दौर में मैंने गांव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किए। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आई.सी.एस. रहे जे.सी. माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक शृंखला लिखी थी, जिसका मूल था कि ‘मैं आई.सी.एस. में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’।
कल का आई.सी.एस. ही आज का आई.ए.एस. है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आई.ए.एस. अधिकारियों से संपर्क में रहा हूं और मैं दावे से कह सकता हूं कि वही आई.ए.एस. अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोसिं्टग और प्रोमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं, पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है।
इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। चाहे वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्मे सी.जे.पी. के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो, उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का यह दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगाएं, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और यह राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे, तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।-विनीत नारायण



