देश में मोदी होना

प्रधानमंत्री मोदी को जन्मदिन की विलंबित बधाइयां..! हम उनके बेहतर स्वास्थ्य, सतत सक्रियता और दीर्घायु की दुआएं भी करते हैं। मोदी सवा 12 साल, अर्थात् 4500 से अधिक दिन, से भारत के निरंतर प्रधानमंत्री हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बाद प्रधानमंत्री मोदी ही हैं, जो लगातार तीन बार प्रधानमंत्री बने हैं। यह हमारे सशक्त और विवेकी लोकतंत्र तथा न्यायिक जनमत की ही ताकत है। 1984-85 के लोकसभा चुनाव में जिस भाजपा के मात्र दो सांसद जीत पाए थे, राष्ट्रीय नेता अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित होना पड़ा था, वह मई 2014 से निरंतर केंद्रीय सत्ता में है। लोकसभा में भाजपा के आज 240 सांसद हैं, 282 और 303 सांसद भी रह चुके हैं। राज्यसभा में 116 सांसद हैं और एनडीए के सांसदों को मिला कर पूर्ण बहुमत है। देश में पार्टी के कुल 1813 विधायक हैं। भाजपा-एनडीए की 22 राज्यों में सरकारें हैं और देश की करीब 78 फीसदी आबादी पर उनका शासन है। ये तथ्य आप भी जानते होंगे। हम तो प्रसंगवश प्रस्तुत कर रहे हैं, क्योंकि यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की चौतरफा स्वीकृति का दस्तावेजी यथार्थ है। बीते 12 साल का कालखंड प्रधानमंत्री मोदी का रहा है। उनके नेतृत्व में सभी पूर्वोत्तर राज्य ‘भाजपामय’ हैं, जो कभी कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों के गढ़ थे। ओडिशा जैसे ‘पटनायकवादी’ और गैर-भाजपा राज्य में आज भाजपा का मुख्यमंत्री है। वाममोर्चे और ममता बनर्जी के जनाधार वाला राज्य, जहां कई क्षेत्र मुस्लिम-बहुल हैं, लिहाजा भाजपा-विरोधी हैं, उस पश्चिम बंगाल में 202 सीटों का ऐतिहासिक, प्रचंड जनादेश आज भाजपा के पक्ष में है। बेशक दक्षिण भारत अभी ‘भाजपामय’ होना शेष है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ‘अपरंपरागत’ नेता हैं। भारत गुटनिरपेक्ष, समाजवादी राजनीति और कूटनीति के झंडेबरदार देशों में लंबे समय तक रहा। कमोबेश इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल तक इसी सोच और कूटनीति का प्रचार किया जाता रहा, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने बहुध्रुवीय, बहुगठबंधन राजनीति की सोच दी, लिहाजा कूटनीति भी बदली। आज भारत के यूरोप, पश्चिमी देशों के साथ राजनयिक संबंध हैं, तो रूस और चीन के साथ भी भारत कई संगठनों, शिखर सम्मेलनों का सदस्य है। मुस्लिम-अरब बहुल के देश भी भारत के ‘मित्र’ हैं। जी-20 में ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज के तौर पर अफ्रीकी देशों को शामिल करने के मेजबान प्रधानमंत्री मोदी के सफल प्रयास के मद्देनजर अफ्रीकी देश भारत को अपना ‘अंतरंग हमदर्द’ मानते हैं। शायद कूटनीति की व्यापकता और विविधता के कारण ही 37 देश अपने ‘सर्वोच्च सम्मान’ से प्रधानमंत्री मोदी और उनके जरिए भारत को विभूषित कर चुके हैं। यह भारतीय प्रधानमंत्री का ‘विश्व-कीर्तिमान’ है।
प्रधानमंत्री मोदी की अंतरराष्ट्रीय रेटिंग भी 68-71 फीसदी आंकी गई है, जो सर्वाधिक है। सभी विश्व नेताओं की औसत रेटिंग 50 फीसदी से कम है। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप तो ‘रसातल’ में हैं। प्रधानमंत्री मोदी ‘अपरंपरागत’ इसलिए हैं कि उन्होंने लालकिले से 15 अगस्त के संबोधन में ‘देवालय’ से पहले ‘शौचालय’ को अहम करार दिया था और फिर यह राष्ट्रीय योजना बनाई थी। ऐसा कहने और करने वाले मोदी एकमात्र प्रधानमंत्री हैं। आज देश में करीब 12 करोड़ ‘पारिवारिक शौचालय’ हैं। यह बयान खुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दे चुके हैं। अब शौचालय स्वच्छता के साथ-साथ सामाजिक, पारिवारिक और महिला की प्रतिष्ठा के प्रतीक बन चुके हैं। ‘जन-धन खाता’, ‘मुद्रा’ योजना, ‘उज्जवला’ योजना और 81 करोड़ से अधिक भारतीयों को ‘मुफ्त राशन’ आदि सभी परंपरागत लीक से हट कर योजनाएं हैं। बहरहाल प्रधानमंत्री के संदर्भ में एक राजनीतिक जुमला उछाला जाता रहा है-‘मोदी है तो मुमकिन है।’ हमारा विश्लेषण यह मानता है-‘मोदी होना आसान नहीं।’ प्रधानमंत्री मोदी भी इनसान हैं, लिहाजा उनमें भी मानवीय विरोधाभास और खामियां हैं। वह ‘अतिमानव’ नहीं हैं और न ही ऐसा चरित्र-चित्रण करना चाहिए। भाजपा के शीर्षस्थ नेता रहे लालकृष्ण आडवाणी कहा करते थे कि नरेंद्र मोदी सबसे अधिक ‘आलोचित’ नेता हैं। हमारा मानना है कि यह आलोचना नफरत की हद तक है। लोकतंत्र में यह स्वीकार्य नहीं है, लिहाजा बार-बार चुनावी जनादेश नफरतबाजों के खिलाफ जाता है। हमने भी देश में स्कूल, शिक्षा, अध्यापक, बेरोजगारी, गरीबी, अर्थव्यवस्था, आर्थिक असमानता आदि को लेकर प्रधानमंत्री से सवाल किए हैं। यही लोकतंत्र है, लिहाजा प्रधानमंत्री का लगातार विश्लेषण किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को युवाओं को रोजगार दिलाने में प्रभावी भूमिका निभानी होगी। यह भी सत्य है कि सभी युवाओं को सरकारी नौकरियां नहीं दी जा सकती। इसलिए निजी क्षेत्र को इस तरह विकसित करना होगा कि वहां युवाओं के लिए पर्याप्त संख्या में रोजगार पैदा हो। स्वरोजगार की दिशा में सरकार ने अनेक पग उठाए हैं, लेकिन बेरोजगारी की समस्या अभी पूरी तरह हल नहीं हो पाई है। इसलिए फोकस बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करने पर होना चाहिए।



