लेख

हमारी पहचान का आधार है हिंदी

14 सितंबर आते ही देश में हिंदी दिवस मनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सरकारी कार्यालयों में भाषण, निबंध, कविता पाठ और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। हिंदी के महत्व पर लंबे-लंबे व्याख्यान दिए जाते हैं। लेकिन हिंदी दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल एक दिन हिंदी का गुणगान करना नहीं, बल्कि यह विचार करना है कि वर्ष के शेष 364 दिन हम हिंदी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। हिंदी को सम्मान केवल समारोहों और मंचों तक सीमित रखने के बजाय उसे ज्ञान, विज्ञान, प्रशासन, तकनीक और रोजगार की भाषा के रूप में मजबूत करना समय की आवश्यकता है। भारत भाषाई विविधता वाला देश है। यहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियां लोगों की पहचान और संस्कृति का हिस्सा हैं। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी ताकत है। ऐसे में हिंदी की भूमिका किसी अन्य भारतीय भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच संवाद के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखी जानी चाहिए। हिंदी जितनी व्यापक रूप से समझी और बोली जाती है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी उसके सामने है कि वह दूसरी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़े। हिंदी दिवस का इतिहास भी महत्वपूर्ण है।

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा के संबंध में व्यवस्था की गई है। यह निर्णय स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक और सांस्कृतिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। आज हिंदी का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप्लीकेशन और इंटरनेट ने हिंदी के विस्तार को नई गति दी है। पहले जहां इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी का वर्चस्व दिखाई देता था, वहीं अब हिंदी में बड़ी मात्रा में सामग्री उपलब्ध है। समाचार, शिक्षा, मनोरंजन, साहित्य और सामान्य ज्ञान से लेकर तकनीकी जानकारी तक हिंदी में सामग्री तेजी से बढ़ रही है। यह हिंदी के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। फिर भी एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने है- क्या हिंदी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनने की दिशा में पर्याप्त तेजी से आगे बढ़ रही है? आज भी उच्च शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, प्रबंधन और विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई देती है। ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए यह स्थिति कई बार चुनौती बन जाती है। प्रतिभा भाषा की मोहताज नहीं होती, लेकिन भाषा की बाधा प्रतिभा के विकास को अवश्य प्रभावित कर सकती है। इसलिए आवश्यकता हिंदी बनाम अंग्रेजी की लड़ाई खड़ी करने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें विद्यार्थी अपनी मातृभाषा या भारतीय भाषाओं में मजबूत आधार प्राप्त कर सकें और साथ ही अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं का ज्ञान भी हासिल करें।-डा. मनोज डोगरा

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button