वोट को लेकर जन-आंदोलन

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राष्ट्रीय जन-आंदोलन का माहौल बन गया है। कांग्रेस ने राज्यों की राजधानियों में विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया है। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक भी 29 सितंबर को तय हुई है। शायद कोई बड़ा निर्णय सामने आएगा! ‘राजनीतिक कॉकरोचों’ ने भी सीईसी का इस्तीफा मांगते हुए आंदोलन की धमकी दी है। विपक्ष के कई प्रमुख नेताओं ने सीईसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने और जेल में डालने की पुरजोर मांग की है। हालांकि दिसंबर, 2023 में चुनाव आयोग संबंधी कानून में संशोधन कर सीईसी, पूर्व सीईसी और चुनाव आयुक्तों को किसी भी तरह के केस और जेल भेजने की सजा से ‘कानूनी छूट’ दी गई थी। उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। यह संशोधन संसद में पारित किया गया था। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत सभी विपक्षी नेता इस संसदीय संशोधन को जानते होंगे! फिर भी नेता प्रतिपक्ष ने सीईसी को ‘गद्दार’ और ‘देशद्रोही’ करार दिया है। उनके इस्तीफे और ‘सरकारी गवाह’ बनने की मांग की है। नेता प्रतिपक्ष को यकीन है कि ऐसे ‘अपराधी’ को सजा जरूर मिलनी चाहिए। विपक्ष का कथित ‘इंडिया ब्लॉक’ संसद के दोनों सदनों में, सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ, ‘महाभियोग’ प्रस्ताव लाने पर भी विचार कर रहा है। इसी साल मार्च-अप्रैल में भी ‘महाभियोग’ का प्रस्ताव दिया गया था, जिसेे लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति ने खारिज कर दिया था। लेकिन आसार पुख्ता होते जा रहे हैं कि शहर, कस्बा, गांव और गली-गली के स्तर पर देश का आम नागरिक ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) का ही बहिष्कार कर दे! चूंकि उनके वोट काटे जा रहे हैं, लिहाजा संविधान में दिए मताधिकार का उल्लंघन किया जा रहा है। यदि संविधान का ही उल्लंघन होता रहा, तो लोकतंत्र किस काम का..? लोकतंत्र की बुनियाद ही आम मतदाता का वोट और जनादेश है। यदि वोट से संसद, विधानसभा, सरकारें नहीं चुनी जा सकतीं, तो वोट ही बेमानी किया जा रहा है। जन-आंदोलन इस मताधिकार को हासिल करने और एसआईआर की आड़ में ‘चुनावी साजिश’ को पराजित करने को लेकर उग्र और देशव्यापी होगा। अब यह लोकतंत्र-समर्थक लामबंदी की ही अग्नि-परीक्षा है कि वे आम नागरिक को कितना समझा पाते हैं कि ‘वोट चोरी’ के जरिए चुनाव जीते जा रहे हैं? राहुल गांधी और विपक्षी नेता अभी तक ‘वोट चोरी’ के आरोप लगा रहे थे, लिहाजा उन्हें ‘क्षुद्र राजनीति’ माना जा रहा था। अब चुनाव आयोग के ही दो संवैधानिक चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और सवालों से लगभग पुष्टि हो रही है कि ‘वोट चोरी’ ही नहीं, वोट देने का मौलिक अधिकार भी छीना जा रहा है। एक अभियान के तहत करीब 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम काट देना कोई सामान्य घटना नहीं है।
गोवा जैसे छोटे-से राज्य का उदाहरण सार्वजनिक हुआ है कि 97 मतदाताओं के नाम और ब्यौरे ‘सही’ पाए गए, लेकिन राज्य का मुख्य चुनाव अधिकारी 8 बार ई-मेल कर और फोन पर ब्रीफ करने के बावजूद उन 97 नामों को मतदाता-सूची में जुड़वा नहीं सका। इसका स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया है। उन मतदाताओं के संवैधानिक अधिकार छिन गए, वे वोट नहीं दे सकेंगे, ऐसे लोकतंत्र का क्या करेंगे हम? यह कैसी प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था है कि राज्य के सीईओ की भी आयोग के आईटी सिस्टम तक पहुंच नहीं है! यकीनन अब यह मुद्दा प्रधानमंत्री मोदी तक भी जाएगा। मुद्दा यह नहीं है कि सीईसी के पद पर ज्ञानेश का चयन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने किया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ‘असहमति’ को किनारे कर दिया गया। सरकारें ऐसे ही काम करती हैं और चयन प्रधानमंत्री के स्तर पर ही होता रहा है। इसमें साजिश क्या है? चूंकि अब चुनाव आयोग का भीतरी यथार्थ बेनकाब हुआ है, किसी ने भी उसका खंडन नहीं किया है, किसी ने भी सफाई नहीं दी है या अदालत में उसे चुनौती दी है, अंतत: सीईसी ज्ञानेश को ही ‘खलनायक’ माना जा रहा है। यदि देश भर में जन-आंदोलन फैलता है, तो प्रधानमंत्री कब तक सीईसी को बचा पाएंगे? यह भाजपा-कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई नहीं है, देश के आम नागरिक के मताधिकार का सवाल है और यह राष्ट्रीय सरोकार का मुद्दा बन सकता है। विपक्ष का गंभीर आरोप है कि केंद्र तथा कई राज्यों में सरकार निर्माण में चुनाव आयोग की भूमिका पक्षपातपूर्ण रही है। अगर यहां पर निष्पक्ष रूप से चुनाव करवाए जाते, तो निश्चय ही भाजपा की सरकारें न बनतीं। राहुल गांधी का मानना है कि इन जगहों पर दोबारा से निष्पक्ष चुनाव करवाए जाने चाहिएं। उनकी यह भी मागं है कि इस मसले को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकारी गवाह बनना चाहिए। कांग्रेस कई राज्यों में इस मसले को लेकर आंदोलन शुरू करने जा रही है। शायद केंद्र पर कुछ दबाव बने।



