महिला आरक्षण में देरी का दोषी कौन?

कांग्रेस का यह तर्क कि सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण को परिसीमन को आगे बढ़ाने के लिए एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, जिससे कुछ खास इलाकों को फायदा हो सकता है, सही नहीं ठहरता…
नारी शक्ति वंदन विधेयक, जिसे महिला आरक्षण विधेयक भी कहते हैं, शायद पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शासन तंत्र संभालने के बाद पारित नहीं हो पाया। एक बार जब जीएसटी अधिनियम के संदर्भ में राज्यसभा में संख्या सरकार के पक्ष में नहीं थी, तो भी उसे पारित करवाने में सरकार सफल रही थी। प्रश्न यह है कि इस बार नारी शक्ति वंदन विधेयक क्यों पारित नहीं हो पाया। क्यों अंतिम समय में यह विधेयक गिर गया और सरकार को इससे संबद्ध अन्य दो विधेयक भी वापस लेने पड़े। इस बात को समझने के लिए हमें इस विधेयक को उसके एतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना पड़ेगा। वर्ष 2023 में ‘महिला आरक्षण कानून’ बना जिसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह कानून तो बन गया, लेकिन लागू नहीं हो पाया था। इसका कारण यह रहा कि इस कानून में यह कहा गया था कि यह कानून नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण) के बाद ही लागू किया जा सकेगा। सर्वविदित ही है कि जनगणना वर्ष 2021 में होनी थी, जो कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित हो गई और अब उस जनगणना की प्रक्रिया जारी है, जो वर्ष 2028 से पहले पूर्ण नहीं हो सकेगी। जहां तक परिसीमन की प्रक्रिया का सवाल है, वह जनगणना पूर्ण होने पर ही की जा सकेगी, क्योंकि संसदीय क्षेत्रों और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण जनगणना के बाद ही संभव हो सकता है। ऐसे में पूर्व में बने महिला आरक्षण कानून के आधार पर व्यावहारिक रूप से महिलाओं को आरक्षण इन सभी प्रक्रियाओं (जनगणना और परिसीमन) के बाद ही संभव है, और यह काम आने वाले 2029 के चुनावों तक संभव नहीं हो सकता था।
ऐसे में महिला आरक्षण कानून को जल्दी लागू करने की दृष्टि से सरकार एक नवीन महिला आरक्षण अधिनियम (नारी शक्ति वंदन विधेयक) लेकर आई, जिसमें यह प्रावधान था कि लोकसभा और विधानसभाओं के क्षेत्रों का परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर ही कर दिया जाए। यह विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो पाया और इस प्रकार महिला आरक्षण कानून के आधार पर निकट भविष्य में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए संभव नहीं होगा। इस विषय को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच बहुत कड़ा रोष है, और साथ ही साथ महिलाओं के मन में भी इस बात की टीस है। लेकिन संविधान के अनुसार जब तक महिला आरक्षण को लागू करने के संबंध में रुकावटों को संसद के द्वारा दूर नहीं किया जाता, महिलाओं के लिए विधायिका में आरक्षण का मार्ग जल्दी नहीं खुलेगा। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि क्या विपक्ष के पास कोई ठोस कारण है, जिसके आधार पर उन्होंने इस विधेयक के विरोध में वोट दिया, या यह विरोध मात्र राजनीति से प्रेरित है? विपक्षी दलों के इस संबंध में क्या तर्क हैं? क्या संसद से खारिज वर्तमान विधेयक में संशोधन अथवा स्पष्टीकरण कर महिला आरक्षण के मुद्दे पर कोई समाधान निकल सकता है? विपक्ष ने संसद और संसद के बाहर इस विधेयक के संबंध में कुछ तर्क सामने रखे हैं, इन तर्कों की प्रासंगिकता को भी समझने की जरूरत है। वर्तमान में जिन 230 लोकसभा सदस्यों ने विधेयक के खिलाफ वोट डाला है, उनमें से कांग्रेस, डीएमके, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस आदि शामिल हैं। विपक्षी सदस्यों खासतौर पर तमिलनाडु के महत्वपूर्ण राजनीतिक दल डीएमके का कहना है कि यदि जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटों का पुनर्वितरण होता है तो उन्हें लोकसभा में अनुपातिक रूप से कम प्रतिनिधित्व मिलेगा क्योंकि पिछले दशकों में तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्यों ने सफलतापूर्वक जनसंख्या पर नियंत्रण किया है, जबकि उत्तर के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में जनसंख्या वृद्धि तेजी से हुई है।
इस आपत्ति के निवारण हेतु सरकार ने संसद में 50 प्रतिशत फार्मूला सुझाया है, जिसके अनुसार दक्षिण के राज्यों को भी उनकी वर्तमान संख्या के अनुपात में 50 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें मिलेंगी। इस फार्मूले के आधार पर कर्नाटक को वर्तमान में 28 के स्थान पर 42, तमिलनाडु को 39 के स्थान पर 59, आंध्र प्रदेश को 25 के स्थान पर 38, तेलंगाना को 17 के स्थान पर 26 तथा केरल को 20 के स्थान पर 30 सीटें मिलेंगी। पूर्व में भी श्री एनके सिंह की अध्यक्षता में, पंद्रहवें वित्त आयोग ने वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करने हेतु, जनसंख्या से इतर अन्य मापदंडों को स्थान दिया था, जिससे जनसंख्या कम होने पर भी उन्हें केंद्र से पर्याप्त हिस्सा प्राप्त हो सका था। इसका अभिप्राय यह है कि केंद्र सरकार ने जब यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी राज्य को भी सीटों का नुकसान नहीं होगा, तो ऐसे में इस अधिनियम का विरोध इस आधार पर करना सर्वथा अनुचित है। इसके अतिरिक्त कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल यह कह रहे हैं कि वे वास्तव में महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं, लेकिन वर्तमान अधिनियम में महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना के साथ जोड़ा जाना सही नहीं है। कांग्रेस का तर्क है कि इस बिल में महिलाओं के लिए आरक्षण को देशव्यापी परिसीमन प्रक्रिया (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना) के साथ जोड़ दिया गया है, जिसका महिलाओं के सशक्तिकरण से कोई लेना-देना नहीं है। उनका तर्क है कि यह भारत के चुनावी नक्शे को बदलने का एक प्रयास है। लेकिन यह सही तर्क इसलिए नहीं है कि 2023 में पारित अधिनियम में भी आरक्षण को जनगणना और परिसीमन के साथ जोड़ा गया था। 17 अप्रैल 2026 को खारिज किए गए अधिनियम में तो इस संदर्भ में परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही गई थी, ताकि परिसीमन को जल्दी से पूर्ण करते हुए महिला आरक्षण को जल्द लागू किया जा सके। यह पहली बार नहीं है कि 1951 से शुरू होकर परिसीमन का काम किया गया हो। परिसीमन की प्रक्रिया एक नियमित काम रहा है। 1951 के बाद, यह 1961 में किया गया, फिर 1971 में। हालांकि, 1976 में एक संवैधानिक संशोधन के जरिए परिसीमन की प्रक्रिया को 2001 तक के लिए रोक दिया गया था। 2002 और 2008 के बीच सीमित परिसीमन किया गया था, जिसमें लोकसभा सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया था। यह संवैधानिक संशोधन 2026 में खत्म हो गया है और इसलिए अब नए परिसीमन का समय आ गया है।
इसलिए, कांग्रेस का यह तर्क कि महिलाओं के लिए आरक्षण को देशव्यापी परिसीमन (चुनाव क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करना) के काम से जोड़ा जा रहा है, सही नहीं है, क्योंकि यह एक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि कोई अपनी मर्जी से किया जाने वाला काम। यह एक जरूरी प्रक्रिया है, जिसके बिना महिलाओं के लिए आरक्षण और महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण मुमकिन नहीं है। कांग्रेस का यह तर्क कि सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण को परिसीमन को आगे बढ़ाने के लिए एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, जिससे कुछ खास इलाकों को राजनीतिक फायदा हो सकता है, सही नहीं ठहरता, क्योंकि अगर यह बिल खारिज भी हो जाता है, तो भी 2026 के बाद, जब जनगणना पूरी हो जाएगी, तभी परिसीमन किया जा सकेगा। मौजूदा कानून के तहत, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नया परिसीमन करना जरूरी है। 17 अप्रैल को बिल खारिज होने के बाद, सिर्फ 2011 की जनगणना के आधार पर केवल परिसीमन जल्दी करने का काम ही रुका है। मौजूदा बिल को खारिज करके, कांग्रेस ने चुनाव क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करने के काम को सिर्फ स्थगित ही किया है।-डा. अश्वनी महाजन



