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‘पूरा मुंबई खोद डाला, यहां कंस्ट्रक्शन बंद ही नहीं होता’, कॉमेडियन अभिजीत गांगुली ने भारी मन से छोड़ा शहर

Viral Post: स्टैंड-अप कॉमेडियन अभिजीत गांगुली ने 9 साल बाद मुंबई शहर को अलविदा कह दिया है. अब वो अपने परिवार समेत बेंगलुरु शिफ्ट हो गए हैं. 19 अक्टूबर को एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा- ‘मुझे नई लॉकेशन पर आए 1 हफ्ता हो गया है. जिस शहर को मैंने घर माना था, उसे छोड़ने का फैसला आसान नहीं था. लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि इस शहर में हमेशा कुछ न कुछ कंस्‍ट्रक्‍शन चलता ही रहेगा, क्योंकि इसी तरह ठेकेदारों और मंत्रियों की कमाई होती है. इसीलिए, हमेशा कोई न कोई नया प्रोजेक्ट या रेनोवेशन सामने आ जाएगा, जो आपकी जिंदगी मुश्किल बना देगा और अगर कुछ और न मिला, तो कुछ साल पहले ही बनी किसी चीज को तोड़कर उसकी जगह कुछ और बड़ा बना देंगे.’

‘सरकार गंभीर होती हो बसें बंद नहीं करती’

अभिजीत ने आगे कहा, ‘मैं समझता हूं कि आने-जाने की सुविधा के लिए इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर डेवलपमेंट की जरूरत है. लेकिन अगर सरकार इसे लेकर गंभीर होती, तो वह बसों की संख्या में इतनी भारी कटौती नहीं करती. बल्कि, इसे तो हमेशा बढ़ाया जाना चाहिए. विदेशों के किसी भी अच्छे शहर में एक मजबूत बस व्यवस्था होती है, जहां समाज के हर वर्ग के लोग बसों में सफर करते हैं. मगर, यहां स्थिति बिल्कुल उलट है

Viral Post: स्टैंड-अप कॉमेडियन अभिजीत गांगुली ने 9 साल बाद मुंबई शहर को अलविदा कह दिया है. अब वो अपने परिवार समेत बेंगलुरु शिफ्ट हो गए हैं. 19 अक्टूबर को एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा- ‘मुझे नई लॉकेशन पर आए 1 हफ्ता हो गया है. जिस शहर को मैंने घर माना था, उसे छोड़ने का फैसला आसान नहीं था. लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि इस शहर में हमेशा कुछ न कुछ कंस्‍ट्रक्‍शन चलता ही रहेगा, क्योंकि इसी तरह ठेकेदारों और मंत्रियों की कमाई होती है. इसीलिए, हमेशा कोई न कोई नया प्रोजेक्ट या रेनोवेशन सामने आ जाएगा, जो आपकी जिंदगी मुश्किल बना देगा और अगर कुछ और न मिला, तो कुछ साल पहले ही बनी किसी चीज को तोड़कर उसकी जगह कुछ और बड़ा बना देंगे.’

‘सरकार गंभीर होती हो बसें बंद नहीं करती’

अभिजीत ने आगे कहा, ‘मैं समझता हूं कि आने-जाने की सुविधा के लिए इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर डेवलपमेंट की जरूरत है. लेकिन अगर सरकार इसे लेकर गंभीर होती, तो वह बसों की संख्या में इतनी भारी कटौती नहीं करती. बल्कि, इसे तो हमेशा बढ़ाया जाना चाहिए. विदेशों के किसी भी अच्छे शहर में एक मजबूत बस व्यवस्था होती है, जहां समाज के हर वर्ग के लोग बसों में सफर करते हैं. मगर, यहां स्थिति बिल्कुल उलट है.

‘ऐसा लगा जैसे जिंदगी हार्ड मोड पर चली गई’

अभिजीत के मुताबिक, ‘मुंबई में रहना ऐसा लगता था जैसे जिंदगी हार्ड मोड पर चल रही हो. और अब जब बच्चा भी है, तो मुझे थोड़ी हरियाली और खुली जगह चाहिए थी. साथ ही, ऐसे स्कूल चाहिए थे जहां बच्चों के खेलने-कूदने के लिए काफी जगह हो. 9 साल पहले जब मैं दिल्ली से यहां आया था, तब मुझे यह शहर बहुत पसंद था. लेकिन कुछ साल पहले, खासकर लॉकडाउन के बाद, हालात बदल गए. मुझे लगता है कि मुंबई तब तक रहने के लिए अच्छी जगह थी, जब तक दिल्ली से आया है क्या? कहना एक ताना या बेइज्जती माना जाता था. अब देखते हैं आगे क्या होता है.’

‘मुंबई से बेहतर लगा बेंगलुरु’

अभिजीत ने माना कि मुंबई की तरह बेंगलुरु में भी कंस्ट्रक्शन की समस्या है. लेकिन उन्होंने कहा, ‘यहां अभी भी बहुत सारे पेड़ हैं. शहर का 50% हिस्सा मिलिट्री कैंटोनमेंट है, और वहां की हरियाली शहर को जिंदा रखती है. इसके अलावा, यहां स्कूल बेहतर हैं, घर अच्छे हैं और किराया भी कम है. सच कहूं तो, मुंबई के बाद यहां सब कुछ सस्ता ही लगता है. मुझे पता है कि यह कोयंबटूर जैसा तो नहीं है, लेकिन हाल ही में यहां आने-जाने और चीजों को परखने के बाद मुझे यह मुंबई से कहीं बेहतर लगा.’

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