राजनीति

पायलट के सामने तात्कालिक चुनौती पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी व मतभेद सुलझाना

पंजाब के पार्टी प्रभारी नियुक्त किए जाने के बाद कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से बातचीत की। हालांकि यह बैठक बंद कमरों में हुई लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि नेताओं ने 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के रोडमैप और प्रमुख रणनीति पर चर्चा की। जबकि कांग्रेस आलाकमान द्वारा पंजाब के लिए तैनात सह-प्रभारियों सहित कई ए.आई.सी.सी. सचिवों के फेरबदल की संभावना है। पंजाब कांग्रेस में वर्तमान में 3 ए.आई.सी.सी. सचिव-सूरज ठाकुर, रवींद्र दलवी और हिना कावड़े हैं, जो क्रमश: माझा, मालवा और दोआबा क्षेत्रों की देखरेख करते हैं। 

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों ए.आई.सी.सी. सचिवों की एक नई टीम नियुक्त करने के लिए पार्टी की कवायद के तहत उम्मीदवारों का साक्षात्कार ले रहे हैं। लगभग 150 संभावित उम्मीदवारों में से करीब 40 को शॉर्टलिस्ट किए जाने की खबर है। पुनर्गठित टीम में कई नए चेहरों को शामिल किए जाने की उम्मीद है क्योंकि राहुल आगामी चुनावी लड़ाइयों से पहले कांग्रेस संगठन को नया आकार देना चाहते हैं। पायलट के कद में इस वृद्धि को कई लोग नेतृत्व द्वारा उनके चुनाव रणनीति कौशल और सभी को साथ लेकर चलने की क्षमता पर जताए गए विश्वास के रूप में देख रहे हैं। पंजाब में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है लेकिन पायलट के सामने तात्कालिक चुनौती इसके नेताओं और गुटों के बीच मतभेदों को सुलझाना होगी।

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग़, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा सहित कई वरिष्ठ नेताओं का अपना-अपना राजनीतिक जनाधार और प्रभाव क्षेत्र है। हाल के महीनों में वरिष्ठ पंजाब कांग्रेस नेताओं के बीच मतभेद बार-बार सतह पर आए हैं। इसलिए पायलट की नियुक्ति को पार्टी नेतृत्व द्वारा आंतरिक गुटबाजी पर काबू पाने और चुनावों से पहले एक एकजुट संगठन के तौर पर पेश करने के कदम के रूप में देखा जा रहा है। इस बीच, सचिन पायलट ने स्पष्ट किया है कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी अभियान का नेतृत्व करेंगे, जबकि मुख्यमंत्री का चयन पार्टी द्वारा बहुमत हासिल करने के बाद ही किया जाएगा।

सपा का नई ‘दृश्य पहचान’ के साथ प्रयोग : 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ, सपा युवाओं और दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के उद्देश्य से एक नई ‘दृश्य पहचान’ के साथ प्रयोग करती दिख रही है। हाल ही में अखिलेश यादव को पार्टी के पारंपरिक लाल और हरे रंगों की बजाय एक नीले रंग का गमछा पहने देखा गया था। इस बदलाव ने राजनीतिक प्रमुखता हासिल कर ली है क्योंकि पार्टी की छात्र इकाई भी नीले रंग के थीम वाले रूप की ओर बढ़ रही है, जिसमें सदस्यों को लाल टोपी के साथ नीली टी-शर्ट और जींस पहनने के लिए कहा जा रहा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार को कहा कि यह रंग न केवल लोकतंत्र, संविधान और बहुजन आंदोलन का, बल्कि समाज में किसी भी प्रकार के अन्याय के खिलाफ विद्रोह का भी प्रतीक है। सपा प्रमुख ने छात्रों, विशेष रूप से जेन कौड और जेन अल्फा से जुडऩे के उद्देश्य से शिक्षण संस्थानों में 2 सप्ताह के ‘छात्र जागरूकता सप्ताह’ की भी घोषणा की। सपा की पारंपरिक लाल टोपी उसकी सबसे मजबूत दृश्य पहचानों में से एक रही है। जींस और टी-शर्ट के साथ-साथ नीले रंग का उभरना एक अतिरिक्त राजनीतिक शब्दावली बनाने के प्रयास का संकेत दे सकता है, जो आंबेडकरवादी मतदाताओं और युवा पीढ़ी दोनों से एक साथ बात करती है।

यू.पी. में कांग्रेस की सिरदर्दी : उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं और समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ सीट-बंटवारे की व्यवस्था को अंतिम रूप देना अभी बाकी है। ऐसे में कांग्रेस के सामने प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बीच मतभेद जैसी सिरदर्दी बनी हुई है। अजय राय वाराणसी के एक भूमिहार हैं और गौतम एक दलित नेता हैं, जो पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ थे। राय को अगस्त 2023 में प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, जबकि गौतम ने इस साल जून में ए.आई.सी.सी. प्रभारी के रूप में कार्यभार संभाला था। इस बीच, गौतम कथित तौर पर राज्य के नेतृत्व में बदलाव पर विचार कर रहे हैं और चाहते हैं कि पार्टी दलित और मुस्लिम मतदाताओं पर अधिक जोर दे, जबकि राय कथित तौर पर गौतम की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट हैं। कई लोगों ने गौतम पर प्रदेश अध्यक्ष की तरह काम करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। पार्टी के कार्यक्रमों में राय और गौतम द्वारा एक-दूसरे से बचने के कई उदाहरण सामने आए हैं। हालांकि दोनों नेताओं ने आपस में किसी भी तरह के टकराव से इंकार किया है। 

हल्द्वानी बना चुनावी जंग का केंद्र : उत्तराखंड के नैनीताल जिले का हल्द्वानी शहर कांग्रेस और भाजपा के बीच चुनावी जंग का केंद्र बनकर उभरा है। यह विवाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (जो दलित हैं) की रैली के बाद एक कट्टरपंथी ङ्क्षहदुत्व समूह द्वारा रामलीला मैदान का कथित तौर पर ‘पवित्रिकरण’ किए जाने को लेकर है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन बुधवार को पार्टी की विस्तारित राज्य कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए शहर पहुंचे, जहां उन्होंने कांग्रेस पर रामलीला मैदान की घटना को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया और बी.आर. आंबेडकर जैसे दलित प्रतिरूपों पर इसके ट्रैक रिकॉर्ड पर सवाल उठाए। 

दूसरी ओर, शहर के बुद्ध पार्क में बड़ी संख्या में कांग्रेसी एकत्र हुए और लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित भाजपा के बैठक स्थल की ओर बढऩे की कोशिश की तथा घोषणा की कि वे नबीन को उत्तराखंड में प्रवेश नहीं करने देना चाहते। हालांकि, उनका सामना पुलिस बैरिकेड्स से हुआ और उन्हें आधे रास्ते में ही रुकने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि, कांग्रेस और भाजपा के नेताओं का मानना है कि हल्द्वानी विवाद के निहितार्थ उत्तराखंड से आगे भी हो सकते हैं, विशेष रूप से पंजाब और उत्तर प्रदेश में, जहां भी अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने वाले हैं और एस.सी.-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की अधिक संख्या के कारण ये राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।-राहिल नोरा चोपड़ा 

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button