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दबाव में एफएसएसएआई : जन स्वास्थ्य की जीत

एफएसएसएआई ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद के साथ एक एमएओयू पर हस्ताक्षर किए और 15 फरवरी 2022 को भारतीय आबादी के बीच पैक्ड फूड के लिए अलग-अलग फ्रंट ऑफ पैक लेबल के बारे में उपभोक्ताओं की सोच पर एक स्टडी शुरू करवाई…

दो हफ्ते पहले भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई को हानिकारक पैक्ड फूड पर चेतावनी वाले लेबल लगाने में ढिलाई बरतने के लिए फटकार लगाई। यह फटकार ‘3 एस’ और ‘अवर हेल्थ सोसाइटी’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान लगाई गई थी, जिसमें ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैक्ड फूड पर पैकेट के सामने की तरफ (फ्रंट ऑफ पैक) चेतावनी वाले लेबल लगाना अनिवार्य करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि ज्यादा नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट (एचएसएसएफ) वाले पैक्ड फूड के लिए चेतावनी वाले लेबल अनिवार्य करने में एजेंसी की हिचकिचाहट से यह सवाल उठता है कि क्या वह कॉर्पोरेट घरानों के दबाव में काम कर रही है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिया कि वे दो हफ्ते के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करें और चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो कोर्ट को इस मामले में खास निर्देश जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। कोर्ट ने नागरिकों, खासकर बढ़ते बच्चों की सेहत को लेकर चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि सख्त चेतावनी वाले लेबल के कारण पारंपरिक भारतीय स्नैक्स (जैसे नमकीन) पर ज्यादा फैट या नमक की मात्रा की वजह से लाल चेतावनी का निशान लग सकता है। इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी चिंताओं की वजह से सरकार को लोगों में इस बात के प्रति जागरूकता बढ़ाने से पीछे नहीं हटना चाहिए कि वे क्या खा-पी रहे हैं। मीडिया की कुछ रिपोर्टों के अनुसार 28 अगस्त 2026 को एफएसएसएआई ने पैक्ड फूड और ड्रिंक्स पर पैकेट के सामने की तरफ चेतावनी वाले लेबल लगाने का प्रस्ताव रख दिया है। ज्यादा चीनी, फैट या नमक वाले आइटम के बारे में सख्त लेबल न होने को लेकर बढ़ते जन आक्रोश के बाद उसने अपना रुख बदला है। एफएसएसएआई का कोर्ट में एफओपीएल (पैकेट के सामने चेतावनी लेबल) के हिस्से के तौर पर चेतावनी वाले संकेतों पर सहमत होना यह दिखाता है कि नियामक संस्था सुप्रीम कोर्ट, मीडिया और जागरूक नागरिकों के दबाव के आगे झुक गई है।

चेतावनी वाले संकेत क्यों हैं जरूरी : हमारे देश में सेहतमंद और पौष्टिक खाना बनाने और खाने की पुरानी परंपरा रही है। हमारी पारंपरिक खाने की थाली में आमतौर पर प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों का सही संतुलन होता है। इसलिए, हमारी डाइट हमेशा से संतुलित रही है। हालांकि, हाल के दिनों में प्रोसेस्ड फूड का सेवन तेजी से बढ़ा है और बाजार अब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से भरा पड़ा है। अहम बात यह है कि बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा बनाए गए इन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ने बाजार का एक बड़ा हिस्सा हथिया लिया है। वैज्ञानिकों का साफ मानना है कि ये अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कैंसर जैसी कई गैर-संचारी बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा, कंपनियां ग्राहकों को लुभाने और बच्चों को अपने उत्पादों का आदी बनाने के लिए अत्यधिक चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट का इस्तेमाल करती हैं। हमारे देश में डाइट में चीनी, सोडियम और सैचुरेटेड फैट की ज्यादा मात्रा के कारण कैंसर, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी व लिवर की बीमारियां तेजी से आम होती जा रही हैं। लोगों में पोषण के बारे में जानकारी की कमी और फूड पैकेजिंग पर चेतावनी वाले लेबल न होने के कारण, लोग अनजाने में इन हानिकारक चीजों का सेवन कर रहे हैं। इससे इन बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, जिन्हें अक्सर लाइफ स्टाइल से जुड़ी बीमारियां कहा जाता है। अगर ऐसे हानिकारक फूड उत्पादों पर चेतावनी वाले लेबल लगे हों जो यह बताएं कि उनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा तय सीमा से ज्यादा है और वे सेहत के लिए हानिकारक हैं, तो ग्राहक संभावित दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक हो जाएंगे और खाना खरीदते समय सही फैसला ले पाएंगे। जहां इन उत्पादों को बनाने वाली कंपनियों की बिक्री कम हो सकती है, क्योंकि ग्राहक उनके अस्वास्थ्यकर उत्पादों को छोड़ देंगे, दूसरी ओर इसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार होगा।

इसलिए ग्राहकों को यह बताना बहुत जरूरी है कि वे जो पैक्ड फूड खा रहे हैं, वे उनकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकते हैं। दूसरे देशों में, चाहे वहां चेतावनी वाले लेबल लगाना अनिवार्य हो या न हो, कंपनियों को ग्राहकों की जागरूकता और रेगुलेटरी संस्थाओं की सतर्कता और निष्पक्षता के कारण दबाव का सामना करना पड़ता है। जहां पहले एफएसएसएआई ने चेतावनी वाले लेबल लागू करने का विरोध किया, वहीं स्वतंत्र मीडिया की रिपोर्टों से पता चलता है कि यही कंपनियां दूसरे देशों में अपने उत्पादों के कम हानिकारक प्रकार बेचती हैं। उदाहरण के लिए, समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, भारत में बिकने वाली फैंटा (एक सॉफ्ट ड्रिंक) में दूसरी जगहों पर बिकने वाले उसी उत्पाद की तुलना में तीन गुना ज्यादा चीनी होती है। हाल ही में यह भी पता चला है कि इंग्लैंड में ज्यादा नमक होने के कारण नेस्ले की मैगी को रेड सिग्नल के साथ बेचा जाता है, जबकि वही उत्पाद भारत में बिना किसी ऐसी चेतावनी के बेचा जा रहा है। यह साफ है कि जानकारी की कमी के कारण भारत में बच्चे ऐसे ड्रिंक्स पीकर और ऐसे अन्य उत्पादों का सेवन कर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है और एफएसएसएआई को फटकार लगाई है। कोर्ट ने सवाल किया है कि वह नागरिकों और खासकर बच्चों की सेहत को लेकर इतना लापरवाह कैसे हो सकता है। स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिसर्च से साफ पता चलता है कि देश और दुनिया भर में नुकसानदायक पैक्ड फूड के बढ़ते सेवन और गैर-संचारी रोगों के बढऩे के बीच सीधा संबंध है। गैर-संचारी रोग, जिनमें कैंसर, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी व दिल की बीमारियां शामिल हैं, पूरी दुनिया में महामारी की तरह फैल रहे हैं। आज भारत में हर चार में से एक व्यक्ति डायबिटीज से पीडि़त है और कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इन बीमारियों से बचने का एकमात्र तरीका नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट का बहुत ज्यादा सेवन न करना है। हालांकि, जब बड़ी और जानी-मानी कंपनियों के उत्पादों में ये नुकसानदायक चीजें ज्यादा मात्रा में होने के बावजूद बिना किसी चेतावनी के बेचे जाते हैं, तो इन महामारियों को रोकने का रास्ता बंद हो जाता है।

हेल्थ स्टार रेटिंग की कवायद : साफ दिख रही सच्चाइयों के प्रति पूरी तरह बेपरवाह होकर, एफएसएसएआई ने चिंतित नागरिकों, वैज्ञानिक समुदाय और विशेषज्ञों की समझदारी भरी बातों को नजरअंदाज करना जारी रखा। अस्वास्थ्यकर भोजन, खासकर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट से भरपूर भोजन पर चेतावनी के संकेत शुरू करने के बजाय एफएसएसएआई ने 4 अक्टूबर 2019 को ऑस्ट्रेलियाई हेल्थ स्टार रेटिंग मॉडल की जांच शुरू की। एफएसएसएआई ने सितंबर 2021 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें खास तौर पर 1.5 स्टार एचएसआर सिस्टम और इसके न्यूट्रिशनल एल्गोरिदम के बारे में बताया गया। एफएसएसएआई ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद के साथ एक एमएओयू पर हस्ताक्षर किए और 15 फरवरी 2022 को भारतीय आबादी के बीच पैक्ड फूड के लिए अलग-अलग फ्रंट ऑफ पैक लेबल के बारे में उपभोक्ताओं की सोच पर एक स्टडी शुरू करवाई। अब जब एफएसएसएआई ने जन दबाव में न्यायालय में चेतावनी संकेत लागू करने को अपना प्रस्ताव पेश कर दिया है, माना जा सकता है कि जन स्वास्थ्य पर सरकार जल्द ही सख्त रुख अपनाते हुए इसे जल्द लागू करेगी।

डा. अश्वनी महाजन

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