व्यापार

ग्लोबल कंपनियां और भारतीय फर्में

उत्कृष्टता सुनिश्चित करने के नाम पर, भारतीय फर्मों, विशेष रूप से कंसल्टिंग क्षेत्र में, को जानबूझकर सरकारी खरीद अनुबंधों (प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट्स) के लिए प्रतिस्पर्धा से बाहर रखा जाता रहा है। उदाहरण के लिए कुछ करोड़ रुपए के अनुबंधों के लिए सरकारी टेंडरों में शर्तें होती हैं…

लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं, बल्कि भविष्य के लिए एक रोडमैप भी पेश किया और उन क्षेत्रों पर जोर दिया, जहां भारत को अपनी कोशिशें तेज करने की जरूरत है। इस संदर्भ में, उन्होंने भारतीय बैंकों और दवा कंपनियों से अपने-अपने क्षेत्रों में दुनिया की शीर्ष पांच कंपनियों में जगह बनाने का आह्वान किया। उन्होंने रेटिंग, कानून, अकाउंटिंग और कंसल्टिंग के क्षेत्रों में भारतीय फर्मों के खुद को स्थापित करने की जरूरत पर भी जोर दिया और कहा कि भारत के पास इन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए जरूरी टैलेंट और क्षमता दोनों मौजूद हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री ने रेटिंग, कंसल्टिंग, कानूनी और अकाउंटिंग क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों की जरूरत पर जोर दिया है। इससे पहले भी कई मौकों पर प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने ये बातें उठाई हैं। एक ओर अंतरराष्ट्रीय कंसल्टिंग फर्में भारतीय सरकार को सलाह देती हैं और राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करती हैं, लेकिन साथ ही वे बड़ी ग्लोबल कंपनियों की भी सलाहकार होती हैं।

नतीजतन, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भारतीय सरकार को सलाह देते समय वे मल्टीनेशनल कंपनियों के हितों को प्राथमिकता नहीं देंगी। ग्लोबल कंसल्टिंग फर्मों के साथ काम करते समय भविष्य की योजनाओं की गोपनीयता और संबंधित डेटा की सुरक्षा भी चिंता का विषय है। इसलिए योजनाओं और डेटा के लीक होने का जोखिम उठाए बिना भारत के भीतर सही नीतियां बनाने के लिए घरेलू कंसल्टिंग फर्में स्थापित करना बहुत जरूरी है। इस क्षेत्र में ईमानदार सेवाओं की वैश्विक मांग भी है। अगर भारतीय कंपनियां अपनी विशेषज्ञता बढ़ाती हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सेवाएं देती हैं, तो देश काफी विदेशी मुद्रा कमा सकता है। जाहिर है, इस क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के आने से न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि यह विदेशी मुद्रा कमाने का एक बड़ा माध्यम भी बन सकती हैं। साथ ही ग्लोबल साजिशों का शिकार होने से भी बचा जा सकेगा।

टैलेंट और काबिलियत की नहीं है कमी

यह समझना जरूरी है कि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर दुनिया की प्रमुख कंसल्टिंग, रेटिंग, अकाउंटिंग और लॉ फर्मों के साथ काम करते हैं, चाहे वे भारत में काम करती हों या दुनिया में कहीं और, और कई कंपनियों में तो वे उनके सीईओ के तौर पर भी काम कर रहे हैं। भारत के बेहतरीन संस्थानों से पढ़े-लिखे और अंतरराष्ट्रीय अनुभव रखने वाले हमारे प्रोफेशनल्स किसी से कम नहीं हैं। ठीक इसीलिए प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से कहा था कि इस मामले में देश में टैलेंट या काबिलियत की कोई कमी नहीं है।

कमी कहां और किस चीज की है?

तो, ऐसा क्यों है कि इन सेक्टरों में भारत की कोई बड़ी कंपनियां नहीं हैं? इसे समझने के लिए हमें अपने इतिहास को देखना होगा। आजादी के बाद, हमारी आर्थिक नीतियां समाजवादी विचारधारा की ओर झुकी हुई थीं। उस समय नीति-निर्माताओं का मानना था कि निजी क्षेत्र के पास जरूरी आर्थिक ताकत, टेक्नोलॉजी और जोखिम उठाने की क्षमता या सोच की कमी है। इसलिए आर्थिक विकास की जिम्मेदारी सरकार उठाएगी। ऐसे हालात में, आर्थिक नीति में निजी क्षेत्र को दूसरे दर्जे पर रखा गया। ऐसे माहौल में, कोई सोच भी कैसे सकता था कि कोई भारतीय लॉ फर्म, रेटिंग एजेंसी या कंसल्टिंग और अकाउंटिंग कंपनी ग्लोबल स्तर पर पहचान बनाएगी और दुनिया भर में अपना नाम कमाएगी। 1991 के बाद अपनाई गई भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण (एलपीजी) की नीतियों के तहत भी ग्लोबलाइजेशन का ही बोलबाला रहा। सोच यह थी कि देश ग्लोबल कंपनियों की मदद से आगे बढ़ सकता है- चाहे वह टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग या सेवा क्षेत्र हो। आत्मविश्वास की कमी के कारण भारतीय नीति-निर्माताओं ने घरेलू कंसल्टिंग, कानूनी, अकाउंटिंग और रेटिंग एजेंसियों को विकसित करने के बारे में कभी सोचा ही नहीं। इसके अलावा जरूरी प्रोफेशनल टैलेंट और काबिलियत होने के बावजूद, भारतीय प्रोफेशनल्स को बड़ी कंसल्टिंग कंपनियां बनाने में संघर्ष करना पड़ रहा है, क्योंकि घरेलू नियम और कानून अक्सर इसमें बाधा बनते हैं। वास्तविकता तो यह है कि आत्मविश्वास की कमी के कारण, भारतीय नीति-निर्माताओं ने कभी भी घरेलू कंसल्टिंग, कानूनी, अकाउंटिंग और रेटिंग एजेंसियां विकसित करने के विचार पर गंभीरता से विचार नहीं किया।

जब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार का ध्यान भारतीय कंसल्टिंग फर्मों की स्थापना के मुद्दे पर गया, तो यह महसूस किया गया कि इसके लिए महत्वपूर्ण नियामक बदलावों की आवश्यकता होगी। यह देखा गया कि मौजूदा नियम, विशेष रूप से वकीलों और वित्तीय पेशेवरों के लिए, उन्हें कॉर्पोरेट संरचनाएं अपनाने, बहु-विषयक (मल्टी डिसिप्लिनरी) प्रैक्टिस करने और विदेशी सहयोग करने में बाधा बन रहे हैं। हालांकि यह धारणा है कि केवल बहुराष्ट्रीय फर्मों के पास ही विभिन्न देशों में काम करने का अनुभव, अपनी खुद की रिसर्च और विशेष ज्ञान होता है। इसके लिए घरेलू पेशेवरों को शुरुआत करने के लिए उचित अवसर दिए जाने की सख्त जरूरत है। जिसके बिना इन क्षेत्रों में भारत की अपनी कंपनियों का उदय संभव नहीं। हमारी नौकरशाही भारतीय कंसल्टिंग, कानूनी और अकाउंटिंग फर्मों के विकास में सबसे बड़ी बाधा रही है। उत्कृष्टता सुनिश्चित करने के नाम पर, भारतीय फर्मों, विशेष रूप से कंसल्टिंग क्षेत्र में, को जानबूझकर सरकारी खरीद अनुबंधों (प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट्स) के लिए प्रतिस्पर्धा से बाहर रखा जाता रहा है। उदाहरण के लिए कुछ करोड़ रुपए के अनुबंधों के लिए सरकारी टेंडरों में अक्सर यह शर्त रखी जाती थी कि बोली लगाने वाली इकाई का टर्नओवर कई हजार करोड़ रुपए होना चाहिए। इसके अलावा सरकारी खरीद और सेवाओं के लिए कर्मचारियों की संख्या या योग्यता से संबंधित प्रतिबंधात्मक शर्तें अक्सर लगाई जाती थीं। वास्तव में, ऐसी प्रतिबंधात्मक शर्तें न केवल सेवाओं की खरीद में, बल्कि वस्तुओं की खरीद में भी आम बात रही हैं।

हाल ही में भारत सरकार के व्यय विभाग ने पिछले तीन वित्तीय वर्षों में जेम (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) पर केंद्र सरकार की खरीद इकाइयों द्वारा जारी कंसल्टेंसी खरीद टेंडरों का अध्ययन किया, जिसमें पाया गया कि (1) टर्नओवर की अत्यधिक उच्च आवश्यकताएं निर्धारित की जाती रही हैं, (2) प्रमुख कर्मचारियों की योग्यता और अनुभव की तुलना में कंसल्टिंग फर्म के अनुभव को अधिक महत्व दिया गया था और (3) बोली लगाने वाली कंपनियों के वेतनभोगी कर्मचारियों की न्यूनतम संख्या को पात्रता मानदंड के रूप में निर्धारित किया जाता रहा, जो काम को पूरा करने के लिए आवश्यक वास्तविक जनशक्ति से कहीं अधिक था। एक बार जब मौजूदा सरकार ने समस्या की स्पष्ट रूप से पहचान कर ली, तो समाधान भी स्पष्ट हो गया। ऐसी कार्यप्रणालियों से निपटने के लिए, भारत सरकार के तहत व्यय विभाग (डिपार्टमेंट आफ एक्सपेंडिचर) ने 22 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी की, जिसमें सरकारी विभागों के लिए एक एडवाइजरी शामिल है। उक्त अधिसूचना में जारी एडवाइजरी कंसल्टेंसी सेवाओं की सरकारी खरीद के लिए क्षमता-आधारित और प्रतिस्पर्धा-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश करती है। या यूं कहें कि अनिवार्य करती है। योग्यता के नियम खास काम से जुड़े होने चाहिए।

डा. अश्वनी महाजन

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