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तकनीकी हमलों से क्रुद्ध हिमालय

1992 में योजना आयोग ने डा. एसजेड कासिम की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने हिमालय में विकास के लिए कुछ दिशा निर्देश तय किए थे, जिनमें हिमालय में करणीय और नहीं करने योग्य गतिविधियों के सुझाव दिए गए थे। और इसके लिए व्यवस्थागत सुझाव भी दिए गए थे, किन्तु बात आगे नहीं बढ़ पाई। उसके बाद कितने ही नए अनुभव संचित हो चुके हैं जिन पर आधारित सावधानियां और दिशाएं तय की जा सकती हैं। हमें आशा करनी चाहिए कि जब जागे तभी सवेरा वाली कहावत पर विश्वास करते हुए पर्यावरण मित्र विकास की दिशा में आगे बढऩे का प्रयास शुरू करेंगे…

औद्योगिक क्रांति के बाद जिस तकनीकी दंभ का प्रादुर्भाव हुआ है, उसके आलोक में वैज्ञानिकता के नाम पर प्रकृति से आधुनिक मानव युद्धरत है। ऊर्जा की अत्यधिक भूख ने ऊर्जा उत्पादन के ऐसे तरीकों पर निर्भरता बढ़ा दी है, जो वैश्विक तापमान में वृद्धि करके जलवायु परिवर्तन का कारण बन रहे हैं। पिछली डेढ़ सदी में वैश्विक स्तर पर तापमान डेढ़ डिग्री तक बढ़ चुका है। अभी भी हम लगभग उसी रास्ते पर दौड़ रहे हैं। हिमालय का क्रोध केवल भारतवर्ष के कारण नहीं है, यह तो सारी दुनिया, विशेषकर विकसित देशों का किया धरा है, किन्तु बाकी सभी देश भी तो उन्हीं विकसित देशों की विकास पद्धति का ही अनुकरण कर रहे हैं और जलवायु परिवर्तन में योगदान करके प्रकृति के संतुलन को नष्ट करने में लगे हुए हैं। प्रकृति बार बार चेतावनी देती है, किन्तु हम समझने वाले नहीं हैं, क्योंकि हम इस गलतफहमी हैं कि हम कुछ भी करके सुरक्षित निकल लेंगे। न तो हम पश्चिम के बर्फीले तूफानों से समझ रहे हैं, न ही रेगिस्तानी बर्फबारी से समझ रहे हैं। ध्रुवीय प्रदेशों से लेकर हिमालय तक ग्लेशियरों के पिघलने से हो रही तबाही से, मासूम जिंदगियों का काल कलवित हो जाना हमारे हृदय में न तो दया का भाव पैदा कर पा रहा है, न ही अपने लालच के चलते प्रकृति को पहुंचाए जा रहे नुकसान के बारे में पुनर्विचार करने की ओर मुड़ रहा है। गेंद एक दूसरे के पाले में धकेला जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों से अमरीका जैसे भारी प्रदूषणकारी देश बाहर निकल चुके हैं। चीन और भारत हिमालय में बड़े से बड़े बांधों के निर्माण में डटे हुए हैं, जिससे होने वाली तोडफ़ोड़ और मीथेन उत्सर्जन से हिमालय में वैश्विक तापमान में वृद्धि की औसत से, ज्यादा वृद्धि हुई है। नतीजा हम ही भुगत रहे हैं। कभी पारछु की बाढ़ में सतलुज पणढल में तो कभी थुनाह्ग जंजैहली में। कभी धराली में तो कभी केदारनाथ में। हम जानते तो सब कुछ हैं, पर समझेंगे नहीं क्योंकि हम वैज्ञानिक युग के अहंकारपूर्ण शक्तिशाली देश हैं। प्रकृति की ताकत के आगे बार-बार शर्मिंदा होने के बाद भी हम प्राकृतिक आपदा कह कर मामले को टाल देते हैं, जबकि हमें इन्हें मानव निर्मित प्राकृतिक आपदा कहना चाहिए ताकि हमें अपने गैरजिम्मेदार कारनामों की याद आती रहे जिससे शायद जागने में मदद मिले। वर्तमान नेपाल त्रासदी ने जिस तरह हजारों बेशकीमती जाने काल-कलवित की हैं वह वैश्विक चेतना को झकझोरने वाली घटना है। भारत की स्थिति भी इस विषय में अच्छी नहीं है। हिमाचल से लेकर अरुणाचल तक कई जोखिमपूर्ण ग्लेशियर झीलें विद्यमान हैं। हिमाचल में लाहुल घाटी की घेपांग घाट ग्लेशियर झील सहित 48 ऐसी झीलें हैं। उत्तराखंड में 13, लद्दाख में 35, सिक्किम में 40, अरुणाचल में 28 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। सिक्किम भी 2023 में दक्षिणी ल्होनाक ग्लेशियर झील के फटने से भारी त्रासदी झेल चुका है। वर्तमान विकास गतिविधियां हिमालय में जान-माल के लिए खतरा बढ़ा रही हैं। जब जिन्दा ही नहीं रहेंगे तो उस विकास का क्या करेंगे? एक ओर बड़े बड़े देश युद्धों में उलझे हुए हैं। युद्ध भी जितना वायु प्रदूषण फैला रहे हैं वह भी जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारण बन रहे हैं। आतंकवाद और युद्ध दोनों से ही बचने की जरूरत है। बातचीत से समस्याएं हल हो सकती हैं। युद्ध के बाद भी तो बातचीत ही करनी पड़ती है। सांप्रदायिक घृणा जनित आतंकवाद से भी तौबा की जानी चाहिए। कोई संप्रदाय मृत्यु उपरांत नरक में जाता है या स्वर्ग में, इस बात की चिंता किसी को करने की क्या जरूरत है। जो जाएगा वह खुद देख लेगा। फिजूल की आत्मप्रशंसा जनित झगड़ों से ऊपर उठना जरूरी हो गया है, क्योंकि वर्तमान युद्ध और जलवायु परिवर्तन के खतरे भीषण विध्वंसकारक होते जा रहे हैं। भारतवर्ष में पर्यावरणीय आंदोलन 1980 के दशक से ही वैकल्पिक विकास नीति विशेषकर हिमालय क्षेत्रों के लिए बनाने की बात कर रहे हैं।

चिपको आन्दोलन से लेकर हिमालय नीति अभियान, हिमालय क्षेत्र में पर्वत विशिष्ट परिशितिकीय दृष्टि से निरापद विकास नीति के लिए आवाज उठा रहे हैं। 1992 में योजना आयोग ने डा. एसजेड कासिम की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने हिमालय में विकास के लिए कुछ दिशा निर्देश तय किए थे, जिनमें हिमालय में करणीय और नहीं करने योग्य गतिविधियों के सुझाव दिए गए थे। और इसके लिए व्यवस्थागत सुझाव भी दिए गए थे, किन्तु बात आगे नहीं बढ़ पाई। उसके बाद कितने ही नए अनुभव संचित हो चुके हैं जिन पर आधारित सावधानियां और दिशाएं तय की जा सकती हैं। हमें आशा करनी चाहिए कि जब जागे तभी सवेरा वाली कहावत पर विश्वास करते हुए पर्यावरण मित्र विकास की दिशा में आगे बढऩे का प्रयास शुरू करेंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ से मिल कर चीन और अमरीका जैसे अत्यधिक हरित प्रभाव गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशों को भी पर्यावरण मित्र विकास की दिशा में गंभीर सहयोग करने के लिए प्रेरित किया जाना वांछित है। राष्ट्रपति ट्रम्प के आने के बाद अमरीका का जलवायु परिवर्तन रोकने वाली वैश्विक संधियों से बाहर हो जाना चिंता योग्य है। स्वयं सही विकास नीति बना कर वैश्विक स्तर पर दबाव समूह को सशक्त करने की दिशा में भारत महती योगदान कर सकता है।

कुलभूषण उपमन्यु

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