अब टेक्सटाइल का हब बनता भारत

देश के प्रमुख वस्त्र उत्पादन केंद्रों में आज भी कुशल कारीगरों और तकनीशियनों की पर्याप्त कमी महसूस की जा रही है। साथ ही, कपास का एक प्रमुख उत्पादक देश होने के बावजूद भारत की प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादकता वैश्विक औसत से काफी नीचे है…
इन दिनों टेक्सटाइल सेक्टर से संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह रेखांकित किया जा रहा है कि भारत दुनिया के प्रमुख देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और सरकार के द्वारा टेक्सटाइल क्षेत्र को दिए जा रहे बहुआयामी प्रोत्साहनों के दम पर टेक्सटाइल का नया ग्लोबल हब बनने की राह पर अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। यह उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष जुलाई माह में नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित भारत टेक्स 2026 ने न केवल वैश्विक टेक्सटाइल जगत में भारत के लिए एक स्वर्णिम इतिहास रचा है, बल्कि संपूर्ण विश्व को यह स्पष्ट और सशक्त संदेश भी दे दिया है कि भारत अब वैश्विक वस्त्र आपूर्ति श्रृंखला का एक विश्वसनीय, अनिवार्य और प्रमुख ग्लोबल हब बनने की दिशा में अग्रसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी ‘5-एफ’ दृष्टिकोण- फार्म (खेत), फाइबर (रेशा), फैक्टरी (कारखाना), फैशन और फॉरेन (विदेश) – को पूरी तरह जीवंत करने वाला यह आयोजन दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत टेक्सटाइल मेला बनकर उभरा है। नि:संदेह, इस वर्ष 2026 में देश का टेक्सटाइल सेक्टर लगभग 190 अरब अमरीकी डॉलर के बड़े आकार तक पहुंच चुका है, जिसका मुख्य राष्ट्रीय लक्ष्य विजन-2030 के तहत इसे बढ़ाकर 350 अरब डॉलर तक ले जाना है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में सरकार की नई टेक्सटाइल रणनीति और दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ संपन्न हो रहे मुक्त व्यापार समझौते अत्यंत प्रभावी और निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। भारत सरकार ने बेहद सुनियोजित रणनीति के तहत इन एफटीए समझौतों में टेक्सटाइल सेक्टर को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया के सबसे बड़े, संपन्न और विकसित बाजारों में शून्य आयात शुल्क प्रवेश (जीरो-ड्यूटी एक्सेस) का सुगम मार्ग निश्चित ही प्रशस्त हुआ है।
इस दिशा में सबसे ऐतिहासिक कदम भारत और ब्रिटेन के बीच 15 जुलाई से लागू हुआ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीटा) है। इस समझौते के अंतर्गत ब्रिटेन सरकार ने भारतीय टेक्सटाइल और परिधानों पर पूर्व में लगने वाले 12 प्रतिशत तक के उच्च आयात शुल्क को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। इस बड़ी और महत्वपूर्ण रियायत के बाद ब्रिटिश बाजार में भारतीय कपड़े और रेडीमेड गारमेंट्स हमारे पारंपरिक प्रतिस्पर्धी देशों, जैसे कि बांग्लादेश और वियतनाम की तुलना में अत्यधिक सस्ते, आकर्षक और वाणिज्यिक रूप से प्रतिस्पर्धी हो गए हैं। इस समझौते के लागू होने तथा भारतीय निर्यातकों की उन्नत पूर्व-तैयारी के चलते वर्तमान में ब्रिटेन के बाजारों से भारतीय टेक्सटाइल की मांग में तीव्र और ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की जा रही है। इसके अतिरिक्त, गत एक जून से भारत और ओमान के बीच लागू व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) के अंतर्गत ओमान ने भी भारत के टेक्सटाइल उत्पादों सहित 99 प्रतिशत से अधिक घरेलू उत्पादों पर आयात शुल्क को पूरी तरह से शून्य कर दिया है। संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन के साथ सफलतापूर्वक संचालित हो रहे व्यापारिक समझौतों ने पहले ही भारतीय टेक्सटाइल निर्यात को एक नई ऊंचाई और सुदृढ़ आधार प्रदान कर दिया है। इस वित्तीय वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अगस्त 2026 की अवधि के दौरान भारत का कुल कपड़ा निर्यात 14.9 अरब डॉलर के आंकड़े तक पहुंच गया है, जो गत वर्ष की समान अवधि की तुलना में सालाना आधार पर 10.3 प्रतिशत की ठोस वृद्धि को दर्शाता है। इस समयावधि के दौरान कॉटन टेक्सटाइल के क्षेत्र में 18.0 प्रतिशत, मानव निर्मित वस्त्रों के क्षेत्र में 13.6 प्रतिशत और हस्तशिल्प के क्षेत्र में 44 प्रतिशत की उल्लेखनीय संचयी वृद्धि दर्ज की गई है। वस्त्र निर्यातकों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बड़ी राहत और संबल प्रदान करते हुए सरकार ने आरओएससीटीएल योजना को 31 दिसंबर 2026 तक आगे बढ़ा दिया है, जिससे आगामी वैश्विक त्योहारी सीजन के बड़े ऑर्डर्स को समय पर पूरा करने में भारी मदद मिल रही है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार मुख्य कपड़ा उद्योग (यार्न और फैब्रिक) ने अगस्त 2026 के दौरान 13.1 प्रतिशत की मजबूत मासिक वृद्धि और चालू वित्त वर्ष में 11.9 प्रतिशत की शानदार संचयी वृद्धि दर्ज की है।
निश्चित रूप से गार्टेक्स और ‘भारत टेक्स 2026’ जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से देश में डेनिम लेजर फिनिशिंग और तकनीकी वस्त्रों (टेक्निकल टेक्सटाइल्स) के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और ऑटोमेशन आधारित स्मार्ट विनिर्माण को बहुत तेजी से अपनाया जा रहा है। यह बात महत्वपूर्ण है कि भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ टेक्सटाइल हब बनाने के लिए केंद्र सरकार ‘पीएम मित्र’ (मेगा एकीकृत टेक्सटाइल क्षेत्र और परिधान) योजना के अंतर्गत देश के 7 प्रमुख राज्यों में 7 विशाल और अत्याधुनिक टेक्सटाइल पार्क स्थापित करने की दिशा में युद्धस्तर पर कार्य कर रही है। देश के इन सभी 7 राज्यों (तमिलनाडु, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र) में 100 प्रतिशत भूमि का अधिग्रहण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है तथा आवश्यक पर्यावरण मंजूरियां भी प्राप्त हो चुकी हैं। इन सातों पार्कों के पूर्ण विकसित और कार्यात्मक हो जाने के बाद देश में लगभग 70000 करोड़ रुपए का कुल निवेश आकर्षित होगा और तकरीबन 21 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। वर्तमान समय में भी यह संपूर्ण क्षेत्र देश के 5.3 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही, कपड़ा मंत्रालय की ‘सामर्थ 2.0’ योजना के तहत देश के युवाओं को आधुनिक मशीनों पर कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए री-स्किलिंग और अपस्किलिंग का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में निरंतर प्रतिस्पर्धी बनाए रखने और घरेलू विनिर्माण को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए सरकार ने कपास के आयात पर लगने वाले सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) को अक्टूबर 2026 तक के लिए पूर्ण रूप से माफ कर दिया है। वैश्विक स्तर पर प्रचलित ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के कारण अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक कंपनियां आज भारत को एक सुरक्षित, विश्वसनीय और दीर्घकालिक विनिर्माण साझेदार के रूप में देख रही हैं।
इन्हीं बहुआयामी और दूरदर्शी सुधारों के परिणामस्वरूप प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसी आईसीआरए ने भारतीय टेक्सटाइल क्षेत्र के समग्र परिदृश्य को नकारात्मक से उन्नत करके स्थिर (स्टेबल) घोषित कर दिया है। इन तमाम अनुकूल परिस्थितियों, सरकारी पहलों और सकारात्मक आर्थिक संकेतकों के बावजूद, भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर के मार्ग में कुछ गंभीर और संरचनात्मक चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देना अनिवार्य है। यद्यपि पिछले वर्ष कच्चे वस्त्रों (सूत और कपड़े) के निर्यात में अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है, तथापि तैयार रेडीमेड कपड़ों के घरेलू उत्पादन व निर्यात में अपेक्षित गति नहीं आ पाई है जिससे कई स्तरों पर राजस्व वृद्धि सीमित बनी हुई है। देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को अभी भी अपेक्षाकृत महंगी ब्याज दरों पर ऋण प्राप्त हो रहा है। देश के प्रमुख वस्त्र उत्पादन केंद्रों में आज भी कुशल कारीगरों और तकनीशियनों की पर्याप्त कमी महसूस की जा रही है। साथ ही, कपास का एक प्रमुख उत्पादक देश होने के बावजूद भारत की प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादकता वैश्विक औसत से काफी नीचे है, जिससे कच्चे माल की गुणवत्ता और उपलब्धता प्रभावित होती है। यदि भारत को वैश्विक वस्त्र-परिधान बाजार में अपनी हिस्सेदारी को सुदृढ़ करना है तो कई उपाय करने होंगे।-डा. जयंती लाल भंडारी



